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जानिए, बकोरिया कांड, CID जांच, #CBI जांच, पूर्व DGP डीके पांडेय और ज्वाइंट डायरेक्टर अजय भटनागर में क्या है रिश्ता

Surjit Singh

Ranchi: बकोरिया कांड एक बार फिर से चर्चा में है. उसके साथ ही दागदार हो चुकी राष्ट्रीय जांच एजेंसी सीबीआइ और उसके ज्वाइंट डाइरेक्टर अजय भटनागर भी चर्चा में हैं. ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि झारखंड में 12 निर्दोष लोगों की कथित पुलिस मुठभेड़ में हत्या (बकोरिया कांड), CBI, सीबीआइ के ज्वाइंट डायरेक्टर अजय भटनागर, झारखंड सीआइडी और पूर्व डीजीपी डीके पांडेय के बीच आखिर रिश्ता क्या है. क्यों अब अजय भटनागर पर सवाल उठ रहे हैं.

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डीजीपी ने कहा था- मारे गये सभी लोग नक्सली हैं

8 जून 2015 की रात. सीआरपीएफ व पुलिस ने पलामू के सतबरवा थाना क्षेत्र के बकोरिया में कथित रूप से एक मुठभेड़ में एक नक्सली समेत 12 लोगों को मार गिराया. पुलिस ने दावा किया कि मारे गये सभी लोग नक्सली हैं. सुबह में तत्कालीन डीजीपी डीके पांडेय, स्पेशल ब्रांच के तत्कालीन एडीजी अनुराग गुप्ता (अब एडीजी सीआइडी), तत्कालीन एडीजी अभियान एसएन प्रधान (अब एनडीआरएफ के महानिदेशक) समेत अन्य अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे. डीजीपी व श्री प्रधान ने घटनास्थल पर बयान दिया कि मारे गये सभी लोग नक्सली थे. और मुठभेड़ में मारे गये.

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पुलिस की इस सफलता के बाद तत्कालीन डीजीपी ने जवानों को नकद रुपये देकर सम्मानित किया. मुख्यमंत्री रघुवर दास और तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह तक ने पुलिस की इस सफलता पर सबको बधाई दी. यहां तक कि मुठभेड़ में शामिल जवानों को दिल्ली ले जाया गया. जहां तत्कालीन गृह मंत्री ने जवानों से मुलाकात कर बधाई दी.

घटना के वक्त अजय भटनागर झारखंड में ही पदस्थापित थे

जिस वक्त यह घटना हुई, उस वक्त सीबीआइ के ज्वाइंट डायरेक्टर अजय भटनागर झारखंड में ही थे. वह एडीजी मुख्यालय के पद पर थे और तत्कालीन डीजीपी डीके पांडेय के करीब माने जाते थे. उस वक्त सीआइडी के एडीजी के पद पर रेजी डुंगडुंग थे. रांची जोन की आइजी सुमन गुप्ता थीं. पलामू रेंज के डीआइजी हेमंत टोप्पो थे. पलामू के एसपी कन्हैया मयूर पटेल (अभी हजारीबाग के एसपी) थे. लातेहार के एसपी अजय लिंडा थे. और पलामू सदर थाना प्रभारी के पद पर इंस्पेक्टर हरीश पाठक पदस्थापित थे.

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अफसरों के पदस्थापन की चर्चा इसलिए, क्योंकि कथित मुठभेड़ की घटना के बाद सबकी जिंदगी और सर्विस पर असर पड़ा. कुछ पर कम तो कुछ पर ज्यादा. कुछ पर तत्काल पड़ा, तो कुछ पर अब पड़ रहा है.

अजय भटनागर की भूमिका

एडीजी मुख्यालय के पद पर पदस्थापित रहते हुए किसी मुठभेड़ की घटना में अजय भटनागर की कोई भूमिका नहीं हो सकती. है भी नहीं. इस घटना से उनके रिश्ते जुड़ते हैं एडीजी सीआइडी के पद की वजह से. चूंकि घटना पुलिस मुठभेड़ की थी. इसलिए यह तय था कि घटना की जांच सीआइडी करेगी. और सीआइडी के एडीजी रेजी डुंगडुंग थे. उनसे केस की जांच में किसी तरह की गड़बड़ी की उम्मीद नहीं की जा सकती. इसलिए उन्हें तत्काल सीआइडी एडीजी के पद से हटा दिया गया. और सीआइडी एडीजी पद का प्रभार अजय भटनागर को सौंप दिया गया.

अजय भटनागर छह महीने तक एडीजी सीआइडी पद पर रहे, पर कोई कार्रवाई नहीं की

अजय भटनागर करीब छह माह एडीजी सीआइडी के पद पर पदस्थापित रहे. इस दौरान मुठभेड़ में मारे गये लोगों के परिजनों ने हर जगह आवेदन देकर मुठभेड़ को गलत बताया और न्याय की मांग की. एडीजी सीआइडी होने के नाते अजय भटनागर की यह जिम्मेदारी बनती थी कि वह शिकायतों की जांच करायें. साथ ही बकोरिया कांड की जांच निष्पक्ष तरीके से हो, यह सुनिश्चित करें. लेकिन आश्चर्यजनक ढंग से उन्होंने इस केस में कुछ भी नहीं किया.

लेकिन क्या सिर्फ शिकायत की जांच नहीं करना या किसी मामले की जांच को सुस्त कर देना कोई बड़ा अपराध है. नहीं. यह तो सामान्य सी बात है. लेकिन बकोरिया केस में यह सिद्धांत लागू नहीं होता. क्यों. क्योंकि इस केस में सीधे-सीधे झारखंड के डीजीपी डीके पांडेय पर इंवॉल्व होने के आरोप हैं. बकोरिया कांड की जांच में तेजी लाने की वजह से आइपीएस एमवी राव (अभी डीजी होमगार्ड) को सीआइडी एडीजी के पद से हटा दिया गया था. जिसके बाद उन्होंने सरकार को एक पत्र लिखा. जिसमें श्री राव ने कहा कि डीजीपी डीके पांडेय चाहते थे कि बकोरिया कांड की जांच नहीं की जाये या कमजोर तरीके से हो. उनकी बात नहीं मानने के कारण ही उनका तबादला दिल्ली स्थित झारखंड भवन में कर दिया गया. इससे यही समझ बनती है कि डीजीपी से करीबी होने की वजह से अजय भटनागर ने बकोरिया कांड की जांच ही शुरू नहीं की.

पुलिस की थ्योरी से विपरीत विचार रखनेवालों का हुआ तबादला

बकोरिया कांड में तत्कालीन डीजीपी डीके पांडेय का इंवॉल्वमेंट होने का संदेह होने के और भी कारण हैं. उस वक्त जो भी अफसर पुलिस की थ्योरी से विपरीत विचार रखते थे, उन्हें तत्काल पद से हटा दिया जाता था. एडीजी सीआइडी रेजी डुंगडुंग, रांची जोन की आइजी सुमन गुप्ता और पलामू रेंज के डीआइजी हेमंत टोप्पो को. सभी को काम के लिहाज से कम महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थापित कर दिया गया. कुछ दिन बाद लातेहार के एसपी अजय लिंडा को भी हटा दिया गया. क्योंकि घटना स्थल पलामू और लातेहार जिला के सीमा पर है. पलामू सदर थाना प्रभारी हरीश पाठक ने गलत केस नहीं करने की बात कही, तो उन्हें भी सस्पेंड कर दिया गया. वह अब तक विभागीय प्रताड़ना के शिकार बन रहे हैं.

झारखंड पुलिस में एडीजी मुख्यालय व एडीजी सीआइडी के पद पर काम करने के बाद अजय भटनागर सेंट्रल डेप्युटेशन पर चले गये. उन्हें सीआरपीएफ में पोस्टिंग मिली. जिसके बाद वह सीबीआइ पहुंचे.

जिन अफसरों ने अनुसंधान में की “मदद”, उन्हें जिला का एसपी बना दिया गया…

इधर, सीआइडी में आइपीएस अजय कुमार सिंह को एडीजी के पद पर पदस्थापित किया गया. फिर एडीजी प्रशांत सिंह को. इस दौरान जिन-जिन अफसरों ने केस के अनुसंधान में वह सब किया, जो तत्कालीन डीजीपी डीके पांडेय चाहते थे, सबको इनाम मिला. जो-जो आइपीएस इस केस से जुड़े और कुछ मदद की, सबको जिला में पोस्टिंग मिली. जिन-जिन कनीय अफसरों ने कहे अनुसार अनुसंधान किया, उन्हें भी कोयला-लोहा वाला जिला मिला. जिसने विरोध किया, उन्हें शंटिंग पद मिला. इन अफसरों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक के निर्देशों का पालन नहीं किया.

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एमपी राव आये तो जांच में तेजी आयी

प्रशांत सिंह के बाद एमवी राव की पोस्टिंग एडीजी सीआइडी के पद पर हुई. इस दौरान बकोरिया कांड की सीबीआइ जांच के लिए हाइकोर्ट में भी सुनवाई शुरू हो चुकी थी. एमवी राव ने पद संभालते ही मामले की जांच तेज कर दी. इसे लेकर डीजीपी डीके पांडेय और एमवी राव के बीच विवाद भी हुआ. डीजीपी केस को कमजोर करने और जांच को सुस्त करने के लिए दवाब बना रहे थे और एमवी राव ऐसा करने से इंकार कर रहे थे. डीजीपी के कार्यालय में दोनों शीर्ष अफसरों के बीच हॉट-टॉक हुआ. वह भी 8-10 अफसरों की मौजूदगी में. लिहाजा यह खबर मीडिया में भी आ गयी.

इसके बाद एडीजी सीआइडी एमवी राव का तबादला दिल्ली में एक ऐसे पद पर कर दिया गया, जो स्वीकृत ही नहीं है. जहां न तो कोई काम था और न ही कोई सुविधा. उन्हें झारखंड से दूर कर दिया गया. इतना ही नहीं उनके झारखंड आने-जाने तक पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गयी. डीजीपी डीके पांडेय ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके सरकार से यह आदेश तक जारी करवा दिया कि श्री राव बिना मंजूरी झारखंड नहीं आ सकते. अगर आते हैं तो उन्हें खुद के खर्च पर आना होगा. एक बार वक्त की कमी के कारण श्री राव अदालत के काम से बिना पूर्व मंजूरी के झारखंड आये और गुमला कोर्ट में गवाही दी. तब आइजी नवीन कुमार सिंह ने एक पत्र लिख कर उनके आने-जाने का खर्च देने से इंकार कर दिया. पत्र में लिखा कि सरकार के आदेश में झारखंड आने-जाने की घटनोत्तर स्वीकृति देने जैसी कोई बात नहीं लिखी है.

आप समझ सकते हैं. बकोरिया कांड में तत्कालीन डीजीपी डीके पांडेय की मर्जी के खिलाफ जाने का परिणाम क्या-क्या हो सकता है. सिस्टम किसी को भी कहीं भी फिक्स कर सकता है. और किया भी. जो-जो रास्ते में आये, उन्हें ठोकरें मिलीं.

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राज्य पुलिस को शर्मशार करनेवाली हाइकोर्ट की वह टिप्पणी…

इसी दौरान सीआइडी ने कोर्ट में बकोरिया कांड की फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी. जिसमें मुठभेड़ को सही बताया गया और फर्जी मुठभेड़ के आरोपों को बेबुनियाद बताया गया. उस वक्त अजय कुमार सिंह सीआइडी के एडीजी थे. अजय कुमार अभी स्पेशल ब्रांच में एडीजी हैं. सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट ने पाया कि सीआइडी ने बकोरिया कांड की जांच सही तरीके से नहीं की. इसलिए मामले की सीबीआइ जांच जरूरी है.

हाइकोर्ट ने अपने आदेश में जो लिखा, उसे पढ़ कर कोई भी सकते में आ सकता है. हाइकोर्ट के जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय ने कहा थाः मामले को लेकर सीआइडी की जांच सही दिशा में नहीं जा रही है. इससे लोगों का जांच एजेंसियों से भरोसा उठ रहा है. इसलिए बकोरिया फर्जी एनकाउंटर मामले की जांच अब सीबीआइ करेगी.

हाइकोर्ट की यह टिप्पणी क्या संदेह पैदा करती है. यही कि सीआइडी के उन तमाम एडीजी, जो जांच के दौरान पदस्थापित रहे, तमाम आइजी-डीआइजी व एसपी समेत अन्य अफसरों ने अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया.

सीआइडी एडीजी के रूप में काम करने की वजह से बकोरिया कांड से जुड़ा अजय भटनागर का रिश्ता

हाइकोर्ट के आदेश पर अब सीबीआइ मामले की जांच कर रही है. बकोरिया कांड, घटना और घटना की जांच से जुड़े सभी अधिकारी (तत्कालीन डीजीपी डीके पांडेय को छोड़ कर) महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थापित हैं. सरकार ने उन सबसे पूछा भी नहीं कि क्यों सही जांच नहीं की गयी. अजय भटनागर का रिश्ता भी सीआइडी एडीजी के रूप में काम करने की वजह से बकोरिया कांड से जुड़ता है. वह सीबीआइ में महत्वपूर्ण पद पर हैं.

यह बात तकनीकी तौर पर व कानूनी तौर पर सही हो सकता है कि सीबीआइ में बहुत सारी शाखाएं हैं. एक शाखा को दूसरे शाखा के काम से मतलब नहीं होता. इसलिए अजय भटनागर जांच में कोई अड़चन या प्रभाव डाल सकते हैं, इसकी उम्मीद कम है. पर, हम यह भी नहीं भूल सकते कि पिछले साल सीबीआइ में क्या-क्या और कैसे-कैसे हुआ. अफसरों ने कैसे देश की सबसे सम्मानित जांच एजेंसी की छवि को नुकसान पहुंचाया. एक तथ्य यह भी है कि भले ही सभी शाखाओं के काम अलग-अलग हों, पर सभी के प्रमुख तो आइपीएस ही होते हैं. और आपस में लंच-डिनर तो साथ-साथ होते ही हैं. वैसे बकोरिया कांड के अनुसंधान की बात करें तो सीबीआइ में एक और आइपीएस हैं, जिन पर आनेवाले दिनों में अजय भटनागर जैसे ही आरोप लग सकते हैं.

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