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LITERATURE

#LockDown के बीच सड़कों पर उमड़े मजदूरों के सैलाब की त्रासदी बयान करतीं कृष्ण कल्पित और लालदीप गोप…

लॉकडाउन में हजारों मजदूर जो सड़कों पर निकल आये हैं, उन्होंने देश की सियासत को अपने तरीके से नंगा किया है. भूख, मौत और मौसम की बेरुखी के बावजूद मजदूरों का ये काफिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है, आज नहीं तो कल इसके लिए जिम्मेदार ताकतों को जवाब…

रुख हवाओं का जिधर है, हम उधर के हैं…

Mithileshमित्रो! आप सबको पता है हम मध्यवर्ग हैं और हम भी इसी दुनिया के वाशिंदे हैं. हां, हां, आपने सही पहचाना हम खाये-अघाये पगुराते हुए मध्यवर्ग हैं. ज्यादातर मामलों में हमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश दुनिया में क्या कुछ हो-जा रहा…

विजयलक्ष्मी युवा मैथिली लेखन पुरस्कार से मिलेगा युवा प्रतिभा को सम्मान, 30 जून तक करें आवेदन

Ranchi : विश्वम्भर फाउंडेशन के द्वारा युवा लेखकों को सम्मानित किये जाने की योजना है. फाउंडेशन द्वारा विजयलक्ष्मी युवा मैथिली लेखन पुरस्कार दिया जाएगा. पहली बार मैथिली भाषा में शुरू हुई इस प्रोत्साहन योजना को आगे भी निरंतर किये जाने का विचार…

वर्तमान समय की कठोरता को उकेरती असित नाथ तिवारी की दो कविताएं

Asit Nath Tiwary प्रश्न  पालथी  मारे  बैठे  उत्तर सब  लाचार पड़ेआंखों में नकली खुशियां हैंआ आ कर मुस्कान थकी है,भीतर से मन  बुझा  बुझा हैचेहरों पर सेल्फी चिपकी है।असली खुशियों की राहों में सौ…

नाजिम हिकमत – तुर्की के वो कवि जिनकी रिहाई के लिए दुनियाभर में आंदोलन हुए

निरंकुश सत्ता का विरोध विश्व की महान साहित्यिक परंपराओं में से एक है. कुछ को हम जाने पाते हैं कुछ को नहीं. क्योंकि उनके अंत तक को सत्ता पक्ष सामने लाने में डरता है. इसी तरह के कवि रहे हैं तुर्की के महाकवि नाजिम हिकमत . जो कुल इकसठ साल सात…

ऐसे समय के लिए पहाड़ के जनकवि गिर्दा की कविता– अपनी औकात महसूस कीजिये

पहाड़ के बड़े जनकवि हुए हैं- गिर्दा. वे ऐसे ही समय के लिए आज से बहुत पहले उन्होंने लिखा है- अपनी औक़ात महसूस कीजिये. महसूस कीजिये कि इंसान कितना छोटा है, कितना निर्बल है. प्रकृति कितनी विशाल है, कितनी बलशाली है.ये जो भ्रम है इंसान को सब…

बांग्ला देश के कवि रफीक आजाद की कविता – बेहद भूखा हूं

बेहद भूखा पेट में, शरीर की पूरी परिधि मेंमहसूसता हूं हर पल, सब कुछ निगल जाने वाली एक भूखबिना बरसात के ज्यों चैत की फसलों वाले खेतों मेंजल उठती है भयानक आगठीक वैसी ही आग से जलता है पूरा शरीरमहज दो…

दंगों में अपमानित की जानेवाली बेटियों को समर्पित शरद कोकास की तीन कविताएं

बुरे वक्त में जन्मी बेटियांबेटियां जो कभी जन्मीं ही नहींवे मृत्यु के दुख से मुक्त रहींजन्म लिया जिन्होंने इस नश्वर संसार मेंउन्हें गुजरना पड़ा इस मरणांतक प्रक्रिया सेअस्तित्व में आने से लेकर…

हरमीस बोहेमियन की कविता – मैं एक ऐसे प्रधानमंत्री को जानता हूं

मैं एक ऐसे प्रधानमंत्री को जानता हूंहरमीस बोहेमियनमानव-सभ्यता के सबसे क्रूरतम हत्यारे की हंसीअय्याश आततायी की सौम्यताऔर धूर्ततम चोर के आंसूएक उचित और निश्चित मात्रा में मिलाने सेतैयार होती है उसकी…

कवि और कविता पर आज बाजारवाद हावी, इसलिए मंच में हुआ बदलाव

एक वक्त था जब कवि और कविताओं की अपनी एक अलग रौनक थी. लेकिन बाजारवाद के चकाचौंध में उस रौनक की रोशनी गुम सी गयी है. कभी कवि की एक पंक्ति से एक जमाने का हाल बयां होता था. लेकिन आज पूरी कविता किसी माजरे के लिए फीकी पड़ती दिखती है. आखिर ऐसा…