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LITERATURE

कवि और कविता पर आज बाजारवाद हावी, इसलिए मंच में हुआ बदलाव

एक वक्त था जब कवि और कविताओं की अपनी एक अलग रौनक थी. लेकिन बाजारवाद के चकाचौंध में उस रौनक की रोशनी गुम सी गयी है. कभी कवि की एक पंक्ति से एक जमाने का हाल बयां होता था. लेकिन आज पूरी कविता किसी माजरे के लिए फीकी पड़ती दिखती है. आखिर ऐसा…

मानव की भाषिक क्षमता ही उसे अन्य प्राणियों से अलग करती है

Sudhanshu Shekharभाषा क्या है? इस प्रश्न के उत्तर की खोज करते हुए प्राय: सभी विद्वान मानव सभ्यता के आदिग्रंथ ऋग्वेद की ओर सर्वप्रथम देखते हैं, जहां वाक्तत्व के रूप में भाषा पर चर्चा प्राप्त होती है. ऋग्वेद के दशम मंडल में 125वां सूक्त…

गांधी का पुतला – असगर वजाहत – 10 छोटी कहानियां

॥ एक ॥गांधी के पुतले को यह समझकर गोली मारी गई थी कि पुतले को मारी जा रही है. लेकिन गोली गांधी को लगी.पुतले के पीछे से गांधी निकल आए.गोली मारने वालों ने कहा यह तो हमारे लिए बहुत खुशी की बात है कि गोली असली गांधी को लगी है. पर…

कुमार अम्बुज की कविता –  सरकारी मौत अंधविश्‍वास है

हिंदी के महत्वपूर्ण कवि कुमार अम्बुज की एक कविता प्रस्तुत है. ये कविता हमारे वर्तमान को परिभाषित संबोधित है. ये हर उस काल से आंखें मिलाती है, जब कवियों से कहा जाता है कि कुछ तो है तुम्हारे साथ गड़बड़. तुम सत्ता और व्यवस्था के लिए डाउटफुल…

शरद कोकास की कविता – रोहित वेमुला का आखिरी खत

रोहित वेमुला ने अपनी आत्महत्या से पूर्व जो ख़त लिखा था उसे पढ़ने के बाद जो तकलीफ़ मुझे हुई उसने इस कविता को जन्म दिया- शरद कोकास रोहित वेमुला का आखिरी खत“जब आप यह ख़त पढ़ रहे होंगेमैं इस दुनिया में नहीं होऊंगा”…

नज्म ‘हम देखेंगे’ की व्याख्या…सत्ता की चिंता धर्म नहीं,  जनता के जाग जाने का डर है

Vijay Shankar Singhपाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश, एक ही वतन और एक ही बदन के दो हिस्से थे, अब तीन हैं. 1947 का बंटवारा, एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक भूल, राजनीतिक महत्वाकांक्षा, पागलपन भरे दौर, और अंग्रेजों की साज़िश का दुष्परिणाम था. यह बंटवारा…

फैज अहमद फैज की वो मशहूर नज्म जिस पर विवाद छिड़ा हुआ है- हम देखेंगे

पाकिस्तानी शायर फ़ैज़ अहमद फैज की नज़्म 'हम देखेंगे' को पिछले दिनों आइआइटी कानपुर में छात्रों ने कैंपस में गाया था. इसके बाद इस नज्म पर विवाद छिड़ गया. आइआइटी कानपुर के डिप्टी डायरेक्टर मनिंद्र अग्रवाल को कुछ छात्रों ने शिकायत की. शिकायत…

नाटक ‘हमेशा देर कर देता हूं मैं’ का तीसरा शो, भटके कश्मीरी युवा के जद्दोजहद को आकार देने की कोशिश

मुंबई के वर्षोवा आरामबाग में एम्ब्रोज़िया थियेटर ग्रुप का नाटक ‘हमेशा देर कर देता हूं मैं’ का तीसरा शो 28 दिसंबर को होने जा रहा है. पहले दो शो को लोकप्रियता मिलने के बाद ग्रुप का यह तीसरा आयोजन है. मनोज वर्मा के कंसेप्ट और निर्देशन में…

सीमा मिश्रा की कविता – एक अजन्मी  बेटी का डर

एक अजन्मी  बेटी का डरहे मां डर लगता है मुझे,तुम्हारी उस दुनिया में आने सेमैंने सुना है तुम्हारी उस दुनिया मेंहैं, कुछ हिंसक दानव रूपी मानवपहले तो मैं थी बेताबलेकिन अब डर लगता है बाहर आने सेहे मां कैसे…

अजमल खां की कविता – लिख दो कि एक भारतीय हूं मैं

(फिलिस्तीन के महमूद दरवेश, कश्मीर के आगा साहिद अली और असम के मिया कवियों की कड़ी में)लिख दो कि एक भारतीय हूं मैंलिख दोकि एक भारतीय हूं मैंउसके नीचे लिखोकि मेरा नाम अजमल हैएक मुसलमान हूं मैंऔर भारतीय…