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बकोरिया कांडः डीजीपी के कारण गृहमंत्री की हैसियत से मुख्यमंत्री रघुवर दास भी आ सकते हैं जांच के दायरे में

Surjit singh

आठ जून 2015 की रात, पलामू का बकोरिया कांड. एक नक्सली और 11 निर्दोष लोगों को कथित पुलिस मुठभेड़ में मार दिया गया. अब तक इस मामले की जांच राज्य पुलिस की सीआइडी कर रही थी. सीआइडी जांच पर लोगों का विश्वास डिगा है, यह बात हाईकोर्ट ने भी मानी है. इसलिए अब इस मामले की जांच सीबीआई करेगी. अगर जांच का दायरा बढ़ा तो राज्य के डीजीपी डीके पांडेय ही नहीं गृह मंत्री की हैसियत से राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास भी जांच के घेरे में आ सकते हैं.

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मुख्यमंत्री को सीधे तौर पर फर्जी मुठभेड़ के लिए जिम्मेदार तो नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन अगर जांच में बाधा उत्पन्न करने की भी जांच शुरु हुई, तो मुख्यमंत्री भी जांच के दायरे में आ जायेंगे. इस परिस्थिति में बकोरिया कांड की जांच में तेजी लाने वाले एडीजी एमवी राव का तबादला और एमवी राव की शिकायत पर डीजीपी डीके पांडेय के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करना मुख्यमंत्री के लिए परेशानी वाले हालात पैदा कर सकते हैं. बकोरिया कांड को लेकर हाई कोर्ट में जो भी एफिडेविट दायर किये गये, वह गृह विभाग से होकर गुजरा. एफिडेविट को गलत पाया गया है. इस कारण भी गृह मंत्री की हैसियत से मुख्यमंत्री जांच के दायरे में आ सकते हैं.

दरअसल, इस मामले में शुरु में तो राज्य पुलिस ने मुख्यमंत्री को अंधेरे में रखा. जिसके कारण मुख्यमंत्री की तरफ से घटना के बाद झारखंड पुलिस को बधाई संदेश दिया गया. फिर उन्हें अंधेरे में ही रख कर और गलत सूचनाएं देकर तीन सीनियर आइपीएस अफसरों का तबादला करा दिया गया. लेकिन जब मामले को लेकर मीडिया में खबरें आने लगी, एडीजी एमवी राव ने जांच में तेजी लायी, फिर जांच में गलत करने के लिए डीजीपी ने उन पर दवाब बनाया. मामला विधानसभा में भी उठा. तब मुख्यमंत्री को भी घटना की सच की जानकारी दे दी गयी थी. तबादले के बाद एमवी राव ने 01 जनवरी 20018 को लिखित रुप से सारी जानकारी गृह सचिव को दी. जिसकी प्रति राज्यपाल के प्रधान सचिव, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव और गृह मंत्रालय के सचिव को दी गयी. इसके बाद भी मामले की जांच सही दिशा में हो, इसकी कोशिशें नहीं की गयी.

ना तो मुख्यमंत्री के स्तर से इसके लिए पहल हुई, ना ही गृह विभाग की ओर से. इसका असर यह हुआ कि सीआइडी ने गलत दिशा में जांच की. सूचना यह भी है कि घटना से संबंधित कई लोगों का बयान भी बदला गया. इसमें एक आइजी रैंक के अफसर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. ऐसे में अगर सीबीआई जांच का दायरा बढ़ा, तो सभी की गर्दन फंसेंगी. क्योंकि जांच में बाधा उत्पन्न करना भी एक बड़ा अपराध ही माना जाता है. चारा घोटाला में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को सजा मिलना, इसका उदाहरण है.

यूं ही नहीं लोगों का विश्वास डिगा है राज्य पुलिस की जांच एजेंसी पर से…

बकोरिया कांड की सीबीआई जांच के आदेश देने क्रम में हाई कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की है. हाई कोर्ट ने माना है कि इस मामले में राज्य की जांच एजेंसी से लोगों का विश्वास डिगा है. तो क्या इसकी जिम्मेदारी सिर्फ जांच करने वाली एजेंसी सीआइडी की है. नहीं. राज्य के डीजीपी डीके पांडेय और गृह मंत्री की हैसियत से राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास भी इसके लिए कहीं ना कहीं जिम्मेदार हैं. डीजीपी डीके पांडेय तो शुरु से ही इस मामले में गलत ट्रैक पर थे. पर, मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी गृहमंत्री या मुख्यमंत्री की हैसियत से डीजीपी को कभी नहीं रोका. बल्कि डीजीपी का भरपूर साथ दिया.

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घटना के तुरंत बाद तत्कालीन एडीजी सीआइडी रेजी डुंगडुंग, रांची जोन के आइजी सुमन गुप्ता और पलामू प्रमंडल के तत्कालीन डीआइजी हेमंत टोप्पो का तबादला कर दिया गया. कुछ दिन बाद लातेहार के तत्कालीन एसपी अजय लिंडा को भी हटा दिया गया. जैसा की आरोप है, फर्जी सरेंडर का झूठा केस नहीं करने की वजह से दारोगा हरीश पाठक को भी प्रताड़ित किया गया. डीजीपी यहीं नहीं रुके. एडीजी अजय भटनागर को सीआइडी एडीजी का प्रभार दिलवा दिया. अजय भटनागर अभी सीबीआई में हैं. अजय भटनागर करीब एक साल तक एडीजी सीआइडी के प्रभार में रहें. उन्होंने इस मामले में कोई जांच नहीं की. जब अजय कुमार सिंह एडीजी सीआइडी बनें, तब भी कोई कार्रवाई नहीं की. ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे लोगों का विश्वास पुलिस पर बना रहे. जब एमवी राव एडीजी सीआइडी बनें, तब मामले की जांच में तेजी आयी. तब डीजीपी ने उनका भी तबादला करवा दिया. एडीजी एमवी राव ने इसकी जानकारी सरकार को भी लिखित रुप से दी थी.

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