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बकोरिया कांड : हाईकोर्ट के आदेश का मूलपाठ

न्यूजविंग की तरफ से इसका मूल पाठ प्रकाशित किया जा रहा है.

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Ranchi: बकोरिया कांड में 22 अक्बूटर को झारखंड हाइकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए जांच का जिम्मा सीबीआइ को सौंपने का आदेश दिया. इस फैसले में हाइकोर्ट ने कई अहम बातें कही हैं. दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने इस मामले पर अपना फैसला सुनाया. हम पाठकों तक इस फैसले का मूलपाठ उललब्ध करा रहे हैं.

22.10.2018

कोरम : माननीय न्यायाधीश रंगन मुखोपाध्याय

याचिकाकर्ता की तरफ से : आरएस मजुमदार, वरीय अधिवक्ता

रिस्पांडेंट-राज्य की तरफ से : राजीव रंजन, वरीय अधिवक्ता

न्यायालय का फैसला सभी पार्टियों को सुना गया

2) रिट याचिका याचिकाकर्ता की तरफ से इन रियायतों के लिए दायर की गयी थी.

a.) सतबरवा (सदर) पुलिस थाना केस संख्या 349 ऑफ 2015 को स्थानांतरित करने के संबंध में, जो मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, पलामू के यहां लंबित है. उसे सीबीआइ के सुपुर्द करने के संबंध में जिस घटना में 12 व्यक्तियों को पुलिस इनकाउंटर में मारे जाने का दावा किया गया है.

b.)यदि माननीय न्यायालय सोचता है, कि सीबीआइ को मामला हैंड ओवर करने से ज्यादा बेहतर है कि सेवानिवृत जज की अध्यक्षता में विशेष जांच दल गठित की जाये. जिसमें सीबीआइ के अफसर, एनआइए के अफसर रहें. इनके द्वारा इस कठिन केस को सुलझाया जा सकता है. इस घटना में सिल्वर कलर के स्कॉरपियो में सवार पुलिस पार्टी की तरफ से, जो कोबरा बटालियन से संबंधित हैं, ने ड्राइवर को गाड़ी रोकने का इशारा किया था. गाड़ी नहीं रोके जाने पर बटालियन की तरफ से फायरिंग करने का आदेश दिया गया. इस पर पलामू के एसपी ने अपने बयान में कहा है कि फायरिंग और अतिरिक्त फोर्स भेजने का आग्रह किया गया था. पुलिस उप महानिरीक्षक पलामू, एसपी और सीआरपीएफ-134 के कमांडेंट साइट पर पहुंचे. इसमें कुछ घायलों के बारे में पता चला. उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया. चुंकि घायलों के शरीर में कोई गतिविधि नहीं थी. इसलिए सभी मृत घोषित कर दिये गये. इसके बाद अगली सुबह सर्किल ऑफिसर सतबरवा की उपस्थिति में सीजर लिस्ट (जब्ती सूची) तैयार की गयी.

  1. पूर्व के जवाब और फैक्ट्स पर आर्गुमेंट किये गये हैं. दोनों तरफ से कई शपथ पत्र और दस्तावेज न्यायालय में प्रस्तुत किये गये.
  2. सीआइडी ने अपने पहले हलफनामे में कहा है कि पहली रिपोर्ट सीओ, सतबरवा की तरफ से तैयार की गयी है. जिसमें मृत व्यक्तियों के स्वैब (हैंड वाश) भी लिये गये थे. घटना में मारे गये सभी व्यक्तियों के पोस्टमोर्टम रिपोर्ट का भी जिक्र किया गया है, जिसमें सदर अस्पताल डालटनगंज की टीम के द्वारा पोस्टमार्टम करने की बातें कही गयी हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नियमों का भी हवाला दिया गया है. सीआइडी ने हलफनामे में कहा है कि जो हथियार और गोला बारूद जब्त किये गये हैं, उन्हें सार्जेंट मेजर पुलिस लाइन, पलामू ने टेस्ट किये हैं. इसमें इनसास राइफल, कारबाइन और राइफल होने की पुष्टि की गयी है.
  3. जब्त हथियार में से एक को छोड़ सभी हथियार के फायरिंग पिन को कारगर बताया गया था.
  4. याचिकाकर्ता ने पूरक हलफनामे में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के भ्रमण की बातें कही हैं, जिनकी टीम ने फरवरी-मार्च 2017 में घटनास्थल पर जाकर जांच की थी. बकोरिया कांड को लेकर आयोग ने 5.5.2017 को जो जांच रिपोर्ट तैयार की थी, उसके कुछ कंटेंट इस तरह हैं.

ए) पुलिस महानदिेशक झारखंड को मामले से संबंधित जांच अधिकारी के खिलाफ उचित कार्रवाई करनी चाहिए, सीबी, सीआइडी ने पर्याप्त जांच नहीं की है.

बी) सतबरवा थाना कांड 349 ऑफ 2015 में डीजीपी झारखंड ने एसपी रैंक के अधिकारी से जांच नहीं करावायी.

  1. पूरक शपथ पत्र से यह पता चलता है कि सब इंस्पेक्टर हरीश पाठक और तत्कालीन डीआइजी पलामू रेंज हेमंत टोप्पो ने घटना से संबंधित कई तरह की टिप्पणियां दी हैं. इससे यह पता चलता है कि इनका बयान संबंधित पुलिस अधिकारियों को बचाने की दिशा में दिया गया था, जो घटना से जुड़ा हुआ नहीं है.
  2. याचिकाकर्ता ने कहा है कि सीआइडी ने जो हलफनामा दायर किया है, वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच रिपोर्ट से मेल खाता है. इसमें यह साबित होता है कि एक साजिश के तहत मर्डर किये गये. इस साजिश को राज्य पुलिस, सीआरपीएफ और जेजेएमपी की तरफ से रचा गया था. इस घटना के स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि व्यक्तियों को घटना की जगह के इतर दूसरे लोकेशन में मारा गया है. मारे गये लोगों के मृत शरीर को ट्रांसपोर्ट कर घटना स्थल तक लाया गया. मारे गये लोगों के कॉल डिटेल भी पुलिस ने कलेक्ट नहीं किये. ऐसा एसआइ हरीश पाठक और डीआइजी हेमंत टोप्पो के बयानों से भी पता चलता है.

12.याचिकाकर्ता की तरफ से एक दूसरा पूरक शपथ पत्र भी दायर किया गया है, जिसमें 14 दुर्दांत नक्सलियों के मोबाइल फोन के डीटेल और उनकी गतिविधियों का जिक्र किया गया है. सतबरवा ओपी के ऑफिसर इंचार्ज को इन नक्सलियों की गतिविधियों की मालुमात हुई. लातेहार से पलामू के राज्य उच्च पथ में नक्सल गतिविधियों को लेकर कोबरा बटालियन के साथ मिल कर एसपी को कार्रवाई करने को कहा गया. एसपी पलामू की तरफ से सतबरवा थाने को आवश्यक निर्देश भी मिले. दायर शपथ पत्र में कहा गया है कि कोबरा बटालियन की टीम ने घटना को लेकर सभी वाहनों की चेकिंग जिला बल के साथ मिल कर शुरू कर दी. इसी क्रम में सफेद रंग का स्कॉरपियो वाहन वहां से गुजरा, इस वाहन पर सवार लोगों ने पुलिस अधिकारियों की बातें नहीं सुनीं. इसे पुलिस ने संदिग्ध माना. स्कॉरपियो सवार लोगों की गतिविधियों पर नजर रखने के उद्देश्य से जवान सतर्क हो गये. पुलिस और कोबरा बटालियन को देखते हुए पलामू की तरफ जा रहे स्कॉरपियो के चालक ने बाद में अचानक गाड़ी की दिशा बदल दी. वाहन रोकने के बजाय स्कॉरपियो में सवार लोगों ने फायरिंग शुरू कर दी, जो एक घंटे तक जारी रही. कोबरा फोर्स ने भी जवाबी फायरिंग की और फायरिंग समाप्त होने के बाद सर्च किया गया, जिसमें 12 लोगों के शव बरामद हुए. 117 राउंड गोली चलायी गयी. इसके बाद कार्यपालक दंडाधिकारी की तरफ से मारे गये लोगों के स्वैब इकट्ठा किये गये. आयोग की टीम ने साइट विजिट कर अपनी जांच की थी. इसमें एसपी स्तर के अधिकारी और आइजी स्तर के अधिकारियों से पूछताछ की गयी. हलफनामे में फोरेंसिक जांच प्रयोगशाला द्वारा की गयी जांच का ब्योरा भी प्रति शपथ पत्र में दिया गया है. इसमें कहा गया है कि घटना को लेकर कई प्रत्यक्षदर्शियों और पुलिसकर्मियों से पूछताछ और क्रास एग्जामिनेशन किया गया. यह भी शपथ पत्र में कहा गया है कि मारे गये अनुराग जी से जुड़े कई मामले अब भी लंबित हैं. बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, स्पेशल एरिया कमेटी, विजिलेंस और रीजनल और जोनल कमेटी में भी इसका उल्लेख है कि याचिकाकर्ता के पुत्र उदय यादव को ट्रेटर की तरह दिखाया गया है. मृत स्कॉरपियो चालक से पता चलता है कि घटना वास्तविक में घटी है अथवा नहीं. नक्सली, पुलिस, सीआरपीएफ के दावे अलग-अलग हैं. यह मूल घटना को दिगभ्रमित करने जैसा प्रतीत होता है.

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  1. आरएस मजुमदार, लर्नेड वरीय काउंसेल जो याचिकाकर्ता के वकील हैं ने 12 मारे गये लोगों की सूची उपलब्ध करायी है. इसमें से पांच अल्पआयु वाले बालक (माइनर) थे, उन्होंने कहा है कि मारे गये 12 लोगों में से दो व्यक्ति ही नक्सल से संबंधित थे. शेष 10 व्यक्तियों के बारे में किसी तरह का कोई साक्ष्य नक्सलियों से संबंधित नहीं था. ये किसी तरह की नक्सली गतिविधियों में भी शामिल नहीं थे. घटनास्थल पर किसी तरह के खून के धब्बे नहीं पाये गये. इतना ही नहीं स्कॉरपियो से जो टावेल जब्त किया गया, उसमें भी खून के धब्बे नहीं थे. फोरेंसिक लैब में जो तौलिये भेजे गये, उसमें भी खून के धब्बे नहीं पाये गये. यह घटना के 18 महीने बाद भेजे गये थे. फोरेंसिक लैब की रिपोर्ट में कहा गया है कि तौलिये के आरएच फैक्चर को स्पेशिफिक नहीं किया गया था, आइओ द्वारा. स्कॉरपियो का चालक इजाज अमिद का रक्त सैंपल भी आइओ की तरफ से उपलब्ध नहीं कराया जा सका. आइओ की तरफ से विभिन्न रंगों के सैंपल में यह नहीं बताया जा सका कि जिस सीट पर ड्राइवर बैठा था, उस सीट के तौलिये में रक्त का थक्का था या नहीं. क्योंकि सीट पर लगे तौलिये में कोई रक्त का धब्बा नहीं था. घटना और क्राइम की वास्तविक तसवीरें भी उपलब्ध नहीं करायी गयी हैं. सभी व्यक्तियों के शव एक लाइन में दिखाये गये, इससे संदेह पैदा होता है. आइओ की तरफ से जो कॉल डिटेल रिपोर्ट कलेक्ट करने का दावा किया गया है. वह किसी सो कॉल्ड एक्सट्रीमिस्ट से जुड़ा ही नहीं है. क्योंकि सीडीआर इकट्ठा किया ही नहीं गया है. लर्नेड काउंसेल ने यह भी कहा है कि घटना के बाद स्कॉरपियो वाहन के अंदर से खून के धब्बे इकट्ठा ही नहीं किये गये. दायर हलफनामे में कहा गया है कि 117 राउंड के खाली खोखे बरामद किये गये. पर पुलिस की जब्ती सूची में इसे साबित ही नहीं किया जा सका है. यह घटना पूरी तरह आंखों में धूल झोंकने की तरह है. इसमें इस बात का भी हवाला दिया गया है कि पुलिस के वरीय अधिकारियों ने पूरे मामले में स्थानीय पुलिस को डार्क में रखा. घटना और आपरेशन की कोई जानकारी स्थानीय पुलिस को नहीं दी गयी. इस आधार पर याचिकाकर्ता के वरीय अधिवक्ता ने घटना की सीबीआइ जांच कराने का आग्रह किया. इसमें सीबीआइ को दिये गये मामले धरम पाल बनाम हरियाणा सरकार और अन्य, मनोहर लाल शर्मा बनाम प्रधान सचिव और अन्य, पूजा पाल बनाम केंद्र सरकार और अन्य और हेमा बनाम आइजी पुलिस मद्रास के मामलों का हवाला दिया गया.
  2. राजीव रंजन, वरीय अधिवक्ता, जो राज्य सरकार की तरफ से एपीयर हुए. उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने देश की प्रीमियर एजेंसी से जांच कराने की मांग की है. हालांकि मामले की जांच राज्य सरकार की तरफ से सीआइडी की तरफ से करायी गयी है. सीआइडी की तरफ से कई अवश्यंभावी कदम उठाये गये और मामले के स्वतंत्र गवाह, पुलिस अधिकारियों और सीआरपीएफ के कर्मियों से पूछताछ की गयी. इसमें पता चला है कि बकोरिया में नक्सलियों, पुलिस और सीआरपीएफ के जवानों के बीच गोलियां चलीं. इसमें 12 लोग मारे गये और दुर्दांत नक्सली अनुराग जी भी मारा गया. उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता की ओर से दायर मामले की कोई मेरिट नहीं है. इसलिए इस पर विचार करना मुनासिब नहीं है. मामले में स्पष्ट है कि घटना पुलिस और जेजेएमपी के एक्सट्रीमिस्टों के बीच हुई है. इन्वेस्टीगेशन ब्यूरो के इनपुट जो 25.5.2015 को दिये गये थे. उसका हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि अनुराग जी (नक्सली) के मूवमेंट की बातें पता चली थीं, जिसे कोबरा बटालियन को बताया गया. उन्होंने 27.5.2015 और 3.6.2015 के आइबी की सूचना का भी जिक्र किया गया है. जिसमें कोबरा बटालियन और सैप की तरफ से दो दस्तों का गठन करने की बातें कही गयी हैं. बटालियन में शामिल पुलिस के जवान बकोरिया गांव की तरफ घूम रहे थे, जहां यह घटना घटी. सरकारी पक्षधर की तरफ से 188 राउंड फायरिंग होने की बातें कही गयीं. केस डायरी में 8.6.2015 को यह खुलासा किया गया कि सुबह 12.15 बजे गोली चलने की आवाज सुनाई दी. यह नक्सल प्रभावित क्षेत्र था. इसलिए एक प्रत्यक्षदर्शी ने अपने को घर में कैद कर लिया. वह अपने घर के पास के क्रशर मशीन के पास गया, जहां उसे पता चला कि 10-12 शव वहां पड़े हुए हैं, जो नक्सलियों के हैं. इसमें अनुराग जी के मारे जाने की खबर भी मिली. प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि राम प्रसाद राम, जफरुद्दीन अंसारी, नंद किशोर राम और फैजल करीम भी मारे गये हैं. पोस्टमार्टेम रिपोर्ट में इसका उल्लेख है. फोरेंसिक लैब की रिपोर्ट के पैराग्राफ 244 में फायर आर्म्स का उल्लेख किया गया है. रिपोर्ट में हथियारों से चली गोली और मृत व्यक्तियों के स्वैब के अनुसार दाहिने हाथ की अंगुली से गोली चलने की पुष्टि भी की गयी है.
  3. इसके बाद सीआइडी ने जांच अपने कब्जे में ले लिया. 8.1.2016 को इस बात का उल्लेख किया गया कि स्कॉरपियो का निबंधन डब्ल्यूबी-60ई-2011 था. स्कॉरपियो वाहन में 48 बुलेट के निशान पाये गये. इसमें यह भी पता चला कि 7.62 एमएम कैलिबर, 5.56 एमएम कैलिबर और 303 राइफल से गोलियां चलायी गयीं. पुलिस के अधिकारियों से धारा 161 के तहत बयान भी दर्ज कराये गये. कोबरा बटालियन, डीआइजी हेमंत टोप्पो का भी बयान लिया गया. यह बयान 20.2.2015 से 16.6.2015 तक लिया गया.
  4. पूरे मामले को देखने और तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि मामले की जांच सीबीआइ ही कर सकती है.
  5. धर्म पाल बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा और अन्य (रिपोर्टेड इन एआइआर-2016 एससी 618)-(2016)

में कहा गया है कि-संवैधामिक स्तर पर न्यायालय जांच को आगे बढ़ाने के लिए या किसी अन्य जांच एजेंसी से जांच करा सकती है. इसे फेयर इनवेस्टीगेशन और फेयर ट्रायल भी माना जा सकता है. फेयर ट्रायल थोड़ा मुश्किल जरूर है, क्योंकि यह फेयर इनवेस्टीगेशन से जुड़ा है——-

किसी भी मामले की अगली जांच से संबंधित फैसला या पुर्नजांच का मामला संबंधित न्यायालय के प्रसंग में आता है. इसलिए जांच अथवा ट्रायल को शुरू करने के लिए किसी खास विटनेस पर निर्भरता जरूरी नहीं है. यहां यह बताते चलें कि समुद्र के पानी का स्वाद एक ही रहता है. यह नमकीन होता है. इसलिए न्याय का स्वाद भी एक ही है. इसलिए फैसले में किसी एक पक्ष को खुश कर, दूसरे पक्ष को नाराज करना ही जरूरी नहीं है. इसलिए एक गरीब को न्याय दिलाना महत्वपूर्ण है, जो संवैधानिक अधिकार के तहत उन्हें प्राप्त है.

पुलिस का एक महत्वपूर्ण दायित्व है सुरक्षा, वह भी किसी भी नागरिक के जीवन का, उसकी संपति का. ऐसे में किसी भी ऑफेंस की जांच करना पुलिस का दायित्व है, जो उसे परफार्म करना चाहिए. ऐसे में सत्य की खोज पर ही जांच आधारित होनी चाहिए, ताकि कांड करनेवाले आरोपी की पहचान हो सके. उसे बुक किया जा सके.

  1. पूजा पाल बनाम केंद्र सरकार और अन्य (2016), 3, एससीसी1-36 में भी याचिकाकर्ता के पति की हत्या में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला दिया है. पीड़िता के पति फूलपुर लोकसभा से सांसद थे. इसे सीबीआइ को हैंडओवर किया गया. इस मामले में जाहिरा हबिबुल्ला, एच शेख के मामले का भी जिक्र किया गया है. न्यायालय ने मामले को सीबीआइ को सुपुर्द करने का फैसला दिया था.

-इसमें यह प्रतीत होता है कि घटना में पुलिस शामिल है. जिस जगह पर 12 लोगों के शव पाये गये यह भी संदेहास्पद है. जिस तरह से शव पाये गये हैं, उससे पता चलता है कि वे स्कैटर्ड हैं. हालांकि पूरे मामले में राज्य सरकार की तरफ से जोरदार तर्क प्रस्तुत किया गया है. राज्य सरकार की पूरी कार्रवाई एक ही दिशा की तरफ बढ़ी है, यदि यह एक सीधी रेखा की तरह है, तो यह बिना रक्त के धब्बों के नमूने को एकत्रित किये बिना की गयी जांच है. जो अपर्याप्त है. इससे संदेह की स्थिति उत्पन्न होती है. घटना स्थल पर रक्त के धब्बे की निशानी भी होनी चाहिए, क्योंकि इसमें 12 लोग मारे गये थे.

तथ्यों से पता चलता है कि घटना कहीं और घटी है और शव कहीं अलग रखे गये हैं. इसे पूरी तरह संदिग्ध एनकाउंटर बताया जा रहा है, जो पुलिस और नक्सलियों के बीच घटी है. यह पूरी घटना और एनकाउंटर के बारे में हरीश चंद्र पाठक और डीआइजी हेमंत टोप्पो द्वारा बताया गया है. उनके बयान 161 के तहत दर्ज कराये गये हैं.

घटना में स्कॉरपियो के अंदर किसी भी टावेल (तौलिये) में रक्त के धब्बे नहीं पाये जाने की बातें कही गयी हैं, जो फोटोग्राफ उपलब्ध कराये गये हैं, उसमें भी खून के धब्बे नहीं हैं. फोरेंसिक लैब में जो तौलियों के सैंपल भेजे गये, उसमें भी ये धब्बे नहीं थे. फोरेंसिक लैब में काफी दिनों बाद यह बताया गया कि मारे गये लोगों के रक्त ग्रुप एबी थे. इससे संबंधित कोई डीएनए रिपोर्ट नहीं उपलब्ध करायी गयी. स्कॉरपियो के चालक इजाज अहमद का जो ब्लड लैब में भेजा गया, वह भी डीएनए रिपोर्ट से मेल नहीं खाता है. टीम की तरफ से स्कॉरपियो के सामने का शीशा पूरी तरह तोड़ा हुआ बताया गया. पर जो तसवीर शीशे की उपलब्ध करायी गयी है, वह बिल्कुल अलग है.

वाहन के निबंधन नंबर से पता चलता है कि ग्लास वाहन के फ्रंट, रीयर, पीछे की तरफ से लिये गये थे. इसमें दाहिने साइड की खिड़की का ग्लास पूरी तरह टूटा हुआ दिखाया गया, जबकि फ्रंट ह्वील डैमेज दिखाया गया. इसमें कई तहर के छिद्र दिखाये गये. जबकि तसवीरों में पता चलता है कि वाहन इंटैक्ट है. वाहन में गोलियों के खाली खोखे कहीं नहीं मिले और न ही किसी तरह का कोई छिद्र मिला. यह कहा गया कि वाहन के अंदर से फायरिंग की गयी. जो फोटोग्राफ उपलब्ध करायी गयी, उसमें किसी तरह का विवाद दिख ही नहीं रहा है.

  1. याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि कई विटनेस मामले में प्रस्तुत किये गये, इन्हें यह मालूम नहीं था कि वास्तविक घटना कभी हुई है अथवा नहीं. घटना के आइओ की तरफ से ऐसे विटनेसों से कभी सवाल ही नहीं पूछा गया. आइओ ने मामले में पर्याप्त एक्शन भी नहीं लिया. सीबीसीआइडी के जांच अधिकारियों ने कभी मामले की जांच ही ठीक से नहीं की. इससे पूरे प्रकरण में और सवाल उत्पन्न होते हैं, जिसका जवाब जांच से ही पता चल पायेगा. पूरे प्रकरण में वास्तविक घटना को छिपाने का मामला प्रतीत होता है, जिसकी वजह से ही परफेक्ट जांच की आवश्यकता मालूम पड़ती है.
  2. पुलिस की तरफ से की गयी जांच सही दिशा में नहीं जा रही है. सीआइडी को सुपुर्द किये गये मामले की आवश्यकता क्या थी. इसका उत्तर समझ में नहीं आ रहा है. सीआइडी राज्य सरकार की ही एक जांच एजेंसी है. ऐसे में सतबरवा (सदर) थाना कांड संख्या 349 ऑफ 2015, जिसमें 12 लोगों की मौत हुई है, जिन्हें नक्सली बताया गया है. इन्हें एनकाउंटर में मारे जाने की बातें कही गयी हैं. जैसा कि पुलिस का दावा है, इस जांच को पुलिस अपनी उपलब्धि बता रही है, जो जेजेएमपी के खिलाफ की गयी कार्रवाई से जुड़ी है. डीआइजी हेमंत टोप्पो और अन्य अधिकारियों की तरफ से इसे पुलिस के लिए एक स्टोरी पोर्टेट की गयी है. यह झारखंड सरकार का एक विवादित और अति प्रचारित मामला है. पुलिस का मनोबल ऐसी तथाकथित घटना से हिला है. पुलिस के मनोबल को बनाये रखने का जिम्मा स्टेट की एजेंसी का होना प्रतीत होता है.
  3. ऐसे में आम नागरिक जो नियम-कानूनों का पालन करते हैं, उनके कंफिडेंस को बनाये रखने की जवाबदेही सरकार की है. इन्हें न्याय दिलाना भी जरूरी है. इसलिए देश की प्रीमियर एजेंसी सीबीआइ को जांच का जिम्मा दिया जाना आवश्यक प्रतीत होता है.
  4. ऐसे में यह निर्देश दिया जाता है कि केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआइ) से सतबरवा थाना कांड संख्या 349 ऑफ 2015 दिया जाना चाहिए, ताकि मामले की त्वरित जांच हो सके और जांच की एक प्रति संबंधित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाये.
  5. यह रिट याचिका डिस्पोज की जाती है, ताकि उपरोक्त आदेश और निर्देशों का अनुपालन हो सके..

                                                                                                                           (जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय) 

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