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चिंतन शिविर में कांग्रेसियों की झलकी अपने अस्तित्व को बचाए रखने की चिंता

Gyan Ranjan

Ranchi: देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस पिछले एक दशक से राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में तेजी से हाशिये पर जा रही है. काफी समय के बाद कांग्रेस ने छतीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश में सत्ता का स्वाद अपने बूते चखा था. कालांतर में मध्यप्रदेश आपसी खिचखिच के कारण हाथ से निकल गया. इसके बाद झारखंड में गठबंधन के सहारे कांग्रेस सत्ता में है. झारखंड में कांग्रेस के समर्थन से चल रही सरकार के दो वर्ष पूरे हो गए. लेकिन झारखंड में कांग्रेस के लिए आसार अच्छे नहीं दिखते. सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस नेताओं के मन में चल रही बातें इसी तरफ इशारे कर रही है. जैनियों के पवित्र तीर्थ स्थल पारसनाथ में तीन दिनों तक चले चिंतन मंथन शिविर से निकली बातें दूर तक जा सकती है. इस चिंतन शिविर में कांग्रेसियों के सत्ता में रहने के बावजूद दुःख दर्द खुलकर सामने आया.

साफ़ तौर पर देखा जाय तो चिंतिन शिविर में कांग्रेसी अपने अस्तित्व को बचाए रखने को लेकर चिंतित दिखे. राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता का यह बयान कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कांग्रेस के वोट बैंक को झामुमो में शिफ्ट कराना चाहते हैं.

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राजनीतिक गलियारे में स्वास्थ्य मंत्री का यह बयान हलचल मचाये हुए है. अपनी बात को पुष्ट करने के लिए उन्होंने एक मशहूर गीत का भी सहारा लिया – माझी जब नाव डुबोए उसे कौन बचाए.

शिविर में कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए हेमंत सरकार में शामिल मंत्रियों के पेंच कसे. यहां तक कह डाला कि कार्यकर्ता इस बात का निर्धारण करेंगे कि वे मंत्री के पद पर रहेंगे या नहीं.

जाहिर है कि कांग्रेस की यह आशंका ऐसे ही नहीं है. कांग्रेस के कद्दावर नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय का इशारा भी कुछ इसी ओर था. उन्होंने नेतृत्व से कहा कि वह इसका आकलन करे कि गठबंधन सरकार में पार्टी का एजेंडा धरातल पर कितना उतर रहा है.

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कांग्रेस को मलाल, गठबंधन सरकार में नहीं मिल रही अहमियत

लंबे अरसे के बाद झारखंड में कांग्रेस सत्ता में है. विधायकों की संख्या भी 18 है. भले ही दो विधायक बाद में झाविमो छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए हैं. सरकार गठन के बाद पहली बार संगठन को लेकर कांग्रेस झारखंड में रेस हुई है. कांग्रेस को इस बात का मलाल है कि गठबंधन सरकार ने उसे अहमियत नहीं मिलती. सरकार एकतरफा फैसले ले रही है. इसका घाटा भविष्य में उठाना पड़ सकता है, लिहाजा चिंतन शिविर के माध्यम से कांग्रेस ने अपने राजनीतिक दोस्त झारखंड मुक्ति मोर्चा को यह संदेश देने की कोशिश की है कि अब रिश्ता एकतरफा नहीं चलेगा.

यानी सत्ता से जुड़े विषयों और नीतिगत फैसलों में पार्टी की राय लेनी होगी. इससे पहले भी कांग्रेस के विधायक समय-समय पर अपनी पीड़ा से शीर्ष नेतृत्व को अवगत कराते रहे हैं.

विधायकों के गुस्से का अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि विधानसभा के शीतकालीन सत्र में जब सत्तारूढ़ दल के विधायकों की संयुक्त बैठक बुलाई गई तो कांग्रेस के विधायक नहीं पहुंचे. सारी तैयारी धरी रह गई है. इसका दोहराव भी हुआ. 25 फरवरी से आरंभ हो रहे बजट सत्र के पहले कांग्रेस विधायक दल ने अपनी अलग बैठक कर ली.

राहुल गांधी ने भी साफ़ कर दिया है कि पहले संगठन तब सरकार. जिस तरह से राहुल गांधी ने साफ़ शब्दों में कहा कि कार्यकर्ता ही मंत्री बनाते हैं, यह एक तरह से संगठन और सरकार दोनों के लिए बड़ा इशारा है.

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कहीं यह आरपीएन का साइड इफ़ेक्ट तो नहीं

सवाल यह उठ रहा है कि पिछले एक वर्ष से कांग्रेस के विधायक लगातार अपनी ही सरकार के निर्णयों के खिलाफ बुलंदी के साथ आवाज उठा रहे थे. सदन के भीतर हो या पार्टी की बैठकों में हमेशा कांग्रेस विधायकों का दर्द सामने आ रहा था. लेकिन जब से पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह भाजपा में शामिल हुए हैं, तब से झारखंड को लेकर कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व रेस है. फौरी तौर पर देखा जाय तो यह स्थिति पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री आरपीएन सिंह के भाजपा में शामिल होने से पैदा हुई है.

वे कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी होने के नाते काफी प्रभावी थे और पिछले विधानसभा में उनकी रणनीति इस मामले में भी कारगर हुई कि उन्होंने हाशिये पर गई कांग्रेस को उबारने में सफलता हासिल की.

2014 के विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा से तालमेल नहीं होने का खामियाजा भाजपा विरोधी गठबंधन को उठाना पड़ा था. इस रणनीतिक भूल को 2019 में सुधारने में उनकी अहम भूमिका थी.

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हालांकि सुरक्षित राजनीतिक भविष्य की तलाश में उन्होंने भाजपा की राह पकड़ी तो इसी बहाने कांग्रेस को आत्मचिंतन का मौका मिला. पहली बार लगातार रांची में तीन दिनों तक नए प्रभारी ने नेताओं, कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की.

पार्टी के सभी विधायकों, पूर्व विधायकों, सांसदों, पूर्व सांसदों सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दिल्ली में राहुल गांधी के साथ बैठक कराई गयी.

दिल्ली से लौटते ही प्रदेश नेतृत्व चिंतन शिविर की तैयारी में जुट गया और पारसनाथ में तीन दिनों तक चिंतन शिविर चला. चिंतन शिविर में खुलकर सबों ने दर्द साझा किया.

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कहीं सत्ता की चाबी अपने पास तो नहीं रखना चाहती कांग्रेस

पिछले दो वर्षों से यह देखा जा रहा है कि कांग्रेस के लाख चाहने के बाद भी सरकार के नीतिगत निर्णयों में उसकी नहीं चल रही है. हाल के दिनों में सरकार के ताजा निर्णयों से कांग्रेस सकते में है. राष्ट्रीय राजनीति में पिछड़ने के कारण कांग्रेस कभी नहीं चाहेगी कि झारखंड में सत्ता की चाबी उसके हाथ से निकले. इसके लिए आवश्यक है कि वह महत्वाकांक्षी नेताओं पर अंकुश लगाए और बड़े पैमाने पर दल के भीतर होने वाली गुटबाजी को भी समाप्त करे.

चिंतन शिविर के अंतिम दिन कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी स्पष्ट संदेश दिया है कि कार्यकर्ता उनके लिए सबसे ऊपर हैं. हालांकि यह सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन धरातल पर उतारना टेढ़ी खीर. कांग्रेस के लिए कार्यकर्ताओं में जोश भरना इसलिए भी आवश्यक है कि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी अप्रासंगिक होने की स्थिति में है.

देश के प्रमुख राज्यों में कांग्रेस की स्थिति चिंताजनक है. चुनावों में भी कांग्रेस अनमने ढ़ंग से खड़ी दिखती है. ऐसी स्थिति में उन नेताओं में भगदड़ स्वाभाविक है, जिन्हें राजनीतिक क्षेत्र में आगे जाना है.

झारखंड में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता अपना जनाधार और विधायकों को बचाए रखने की है. वर्तमान परिवदृश्य में आने वाले दिन पार्टी के लिए चुनौतियां और बढ़ाने वाली होंगी.

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सत्ता से दूर रहने की स्थिति में नहीं है कांग्रेस

झारखंड में पिछले चुनाव में कांग्रेस मजबूत हुई है. अलग राज्य बनने के बाद पहली बार 16 विधायक जीत कर आये हैं. हेमंत सरकार में मजबूत साझेदार है. अलग राज्य बनने के बाद कांग्रेस सरकार में रही है. सबसे पहले मधु कोड़ा सरकार में कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था. इसके बाद हेमंत सोरेन के नेतृत्व में चली 13 महीने की सरकार में भी कांग्रेस शामिल थी. लेकिन पहली बार चुनाव के बाद इस बार कांग्रेस को सरकार में रहने का मौका मिला है.

लगातार विपक्ष में रहने के कारण संगठनिक तौर पर कांग्रेस कभी मजबूत नहीं रहा. स्थिति यह है कि पिछले पांच वर्षों से कांग्रेस के प्रदेश कार्यसमिति का गठन अन्हीं हुआ है. जबकि इस अवधि में पार्टी के तीन-तीन प्रदेश अध्यक्ष बदले गए.

अभी पार्टी सत्ता में है और इसी के सहारे संगठन को मजबूत करने की कवायद चल रही है. देखा जाय तो झारखंड में कांग्रेस इस स्थिति में नहीं है कि वह सत्ता से दूर रहे. स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता भले ही इस्तीफा देने की बात कह रहे हों, लेकिन सच्चाई यह है कि बन्ना का यह बयान सिर्फ दिखावे का है.

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