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आदिवासी बने मॉब लिंचिंग का शिकार, पुलिस मामले को दबाने का प्रयास कर रही हैः झारखंड जनाधिकार महासभा

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Ranchi: जुरमू में जबदस्त गुस्से और मातम का महौल है. पूरे गांव में डर का साया पसरा हुआ है. युवाओं, महिलाओं और बच्चों में डर का यह आलम यह है कि वह एक दूसरे से भी बात नहीं कर रहे हैं. जुरमू गांव जहां मॉब लिंचिंग का शिकार आदिवासी को बनाया गया, वह झारखंड-छत्तीसगढ़ की सीमा पर बसा है. यह घटना ठीक वैसी ही प्रतीत होती है जैसी गढ़वा में गौ रक्षा के नाम पर भीड़ के द्वारा पीट-पीट कर रमेश मिंज की हत्या कर दी गयी थी. गुमला के डुमरी ब्लॉक के जुरमू गांव में घटना 10 अप्रैल को हुई. आदिवासी समुदाय के लोगों की प्रतिबंधित पशु के नाम पर भीड़ द्वारा पीट पीट कर अधमरा कर दिया गया है. पीड़ितों की उपचार से पहले ही मौत हो गई. अब भी गांव में दहशत का माहौल है. घटना के कई दिन बीत जाने के बाद भी चुनावी माहौल में किसी राजनेता ने पीड़ितों की सुध नहीं ली. झारखंड में मॉब लिंचिंग के शिकार 11 व्यक्ति हुए जिनमें नौ मुसलमान और दो आदिवासी हैं. मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ आदिवासियों को भी प्रतिबंधित मांस के नाम पर भीड़ ने हिंसा का शिकार बनाया. जुरमू में हुई घटना को लेकर झारखंड जनाधिकार महासभा की ओर से  तथ्यान्वेषण किया गया, जिसमें कई सामाजिक कार्यकर्ता और सदस्य संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे, जांच 14-15 अप्रैल को की गयी थी.

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क्या है जांच रिपोर्ट में

10 अप्रैल 2019 को, गुमला के डुमरी ब्लॉक के जुरमू गांव के रहनेवाले 50 वर्षीय आदिवासी प्रकाश लकड़ा को पड़ोसी जैरागी गांव के एक खास समुदाय के लोगों की भीड़ ने पीट-पीट कर मार दिया. जुरमू के तीन अन्य पीड़ित – पीटर केरकेट्टा, बेलारियस मिंज और जेनेरियस मिंज – भीड़ द्वारा पिटाई के कारण गंभीर रूप से घायल हो गए. जांच दल को पता चला कि ये चार लोग अपने गांव के अन्य पुरुषों और बच्चों के साथ, गांव के पास बहने वाली नदी के किनारे पर एक मृत प्रतिबंधित पशु का मांस काट रहे थे. इस क्षेत्र के आदिवासी और अन्य समुदाय (जैसे घासी और लोहरा) पारंपरिक रूप से प्रतिबंधित पशु खाते हैं. जुरमू गांव के कुछ लोगों को मृत प्रतिबंधित पशु के मालिक ने उसका मांस काटने और खाल निकालने के लिए कहा था. जब वो ऐसा कर रहे थे, उनपर जैरागी गांव के लगभग 35 – 40 लोगों की भीड़ ने हमला किया. भीड़ का नेतृत्व संदीप साहू, संतोष साहू, संजय साहू और उनके बेटे कर रहे थे. अन्य आदिवासी भागने में सफल रहे, लेकिन प्रकाश, पीटर, बेलरियस और जेनेरियस को भीड़ ने पकड़ लिया और लाठियों से पीटा. जिस जगह से हिंसा शुरू हुई थी, उससे करीब एक किलोमीटर दूर जैरागी चौक तक भीड़ द्वारा उन्हें पीटते हुए ले जाया गया. भीड़ द्वारा एक धर्म विशेष का नारा लगाया जा रहा था और पीड़ितों से भी ज़बरदस्ती नारे लगवाए जा रहे थे. पीड़ित नारा नहीं लगा रहे थे, तो उन्हें और पीटा जा रहा था.

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चार लोगों को भीड़ ने तीन घंटे तक पीटा

लगभग तीन घंटों तक पीटने के बाद आधी रात को पीड़ितों को अपराधियों ने डुमरी पुलिस थाने के सामने छोड़ दिया. अपराधियों ने थाना पुलिस से मुलाकात की और वहां से चले गए. पीड़ितों को तुरंत अस्पताल पहुंचाने के बजाए, पुलिस ने लगभग चार घंटे तक उन्हें ठंड में खुले आसमान के नीचे इंतजार करवाया. जब तक उन्हें स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, तब तक प्रकाश ने दम तोड़ दिया था. केंद्र के डॉक्टर ने पुष्टि की कि प्रकाश को स्वास्थ्य केंद्र में मृत लाया गया था और केंद्र पहुंचने से एक घंटे पहले ही उसकी मृत्यु हो गई थी. उन्होंने जांच दल से यह भी साझा किया कि थाना प्रभारी अमित कुमार द्वारा उन पर दबाव डाला जा रहा था कि वे केंद्र की पंजी में यह दर्ज करें कि प्रकाश जीवित था जब उसे स्वास्थ्य केंद्र लाया गया था. डॉक्टर ने यह करने से इनकार किया और यह दर्ज किया कि प्रकाश को मृत लाया गया था.

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पुलिस ने 20-25 अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध प्रतिबंधित पशु की हत्या की प्राथमिकी दर्ज की

स्थानीय पुलिस की कार्रवाई कई सवाल खड़े करती है. हालांकि पीड़ित बार-बार कहते रहे कि वे मृत पशु का मांस काट रहे थे, पुलिस ने उनके और गांव के 20-25 अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध गौ हत्या के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कर दी. अमित कुमार के अनुसार, प्राथमिकी थाना चौकीदार की गवाही के आधार पर दर्ज की गई है, जिसे 11 अप्रैल की सुबह घटनास्थल पर भेजा गया था. पीड़ितों द्वारा नामित सात आरोपियों में से केवल दो को ही 15 अप्रैल तक गिरफ्तार किया गया था.

क्या कहते हैं जुरमू के ग्रामीण

जुरमू के आदिवासियों के अनुसार, अन्य समुदायों के लोग नियमित रूप से उन्हें मृत पशु को ले जाने के लिए कहते हैं. इस घटना से पहले गांव के विभिन्न समुदायों के बीच पशुमांस को खाने पर कभी विवाद नहीं हुआ.

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झारखंड जनाधिकार महासभा की जांच दल का मांग

जांच दल ने रांची में प्रेस कांफ्रेस कर जांच रिपोर्ट जारी की और सरकार से कार्यवाई की मांग की.

1)  जुरमू के आदिवासियों के खिलाफ दर्ज गौहत्या की फर्ज़ी प्राथमिकी को निरस्त करें.

2) भीड़ द्वारा की गयी हिंसा में शामिल सभी अपराधियों को गिरफ्तार करें एवं उनपर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज की जाये.

 3) स्थानीय पुलिस के खिलाफ पीड़ितों के लिए चिकित्सा उपचार में देरी और गोहत्या का झूठा मुकदमा दायर करने के लिए कार्रवाई करें.

 4) मृतक के परिवार को 15 लाख रुपये और घायल पीड़ितों को 10 लाख रुपय का अंतरिम मुआवज़ा दे.

5) लिंचिंग पर सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले का पूर्ण अनुपालन करें.

 6) गोवंशीय पशु हत्या प्रतिषेध अधिनियम, 2005 को निरस्त करें क्योंकि यह लोगों की आजीविका पर और उनकी पसंद का भोजन खाने के अधिकार पर सीधा हमला है.

 7) लोगों के पसंद का भोजन करने के अधिकार का संरक्षण करें.

प्रेस कांफ्रेस को अफजल अनीस, भारत भूषण चौधरी, सरोज हेम्ब्रोम, शादाब अंसारी, तारामणी साहू, ज़िआउलाह और स्टेन स्वामी ने संबोधित किया.

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