Opinion

विकास भाषणों में ही नहीं, यथार्थ में दिखे

Lalit Garg

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक नया भारत उभर रहा है, जिसके पास 125 करोड़ भारतीयों की ताकत और क्षमता है. यह भारत विकास का पक्षधर है, भ्रष्टाचार के खिलाफ है. वर्तमान सरकार का दावा है कि अब दिल्ली से सरकारी योजनाओं के जरिए भेजा गया एक-एक रुपया आम लोगों तक पहुंचता है. जबकि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने स्वीकार किया था कि दिल्ली से एक रुपया निकलता है तो 15 पैसा ही लोगों तक पहुंचता है. क्या यह माना लिया जाए कि केंद्र सरकार की सरकारी योजनाएं और उनसे संबंधित विभाग पूरी तरह भ्रष्टाचार से मुक्त हो गए हैं? देश में विकास केवल नेताओं के भाषणों में ही ना हो, बल्कि जमीन पर उतरा हुआ भी दिखाई दे.

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प्रधानमंत्री की माने तो साल 2022 में जब हम आजादी के 75 साल पूरा करेंगे तब तक हम ऐसा भारत बना लेंगे जिसका स्वप्न गांधी, नेहरु, सरदार पटेल और डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर ने देखा था. लेकिन यह सब सुहावना स्वप्न जैसा लगता है, यथार्थ से दूर. क्योंकि हम अपने व्यापार को, अपने रोजगार को, अपने युवा सपनों को अंधकार में धकेल कर कैसे प्रगति की आशा कर सकते हैं ? क्योंकि जिस तरह अंग्रेजों ने भारतीयों को वैज्ञानिक तरक्की से दूर रखा और यहां के लोगों को आपसी सामुदायिक व धार्मिक झगड़ों में उलझाये रखा, आज भी राजनीतिक स्वार्थों के चलते यही सब हो रहा है. आजादी के 70 वर्षों के बाद भी हम अपने आचरण, चरित्र, नैतिकता और काबिलियत को एक स्तर तक भी नहीं उठा सके. काबिलियत और चरित्र वाले लोग बहुत हैं पर परिवारवाद, जातिवाद, भ्रष्टाचार, राजनीतिक स्वार्थ व कालाधन उन्हें आगे नहीं आने देता.

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हम तरक्की की बात करते हैं, लेकिन एक तरफ हमारे सामने करोड़ों बेरोजगारों को रोजगार देने की चुनौती है तो दूसरी तरफ धरती का सीना चीर कर अन्न उगाने वाले किसानों को सालभर तक के लिए जीवनयापन की समुचित सामग्री सुलभ कराने का प्रश्न है. वहीं तीसरी ओर अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ती खाई पाटने का सवाल भी है. आज मनुष्य का मानस वैज्ञानिक अवनति से, आचरण की अपरिपक्वता से, अनौचित्य को साग्रह ग्रहण करने की प्रवृत्ति से विचलित है.

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1756 में लार्ड क्लाइव ने बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी को स्थापित करने के लिये जमीन पर चादर बिछाई थी, धीरे-धीरे उस कंपनी पूरे देश पर कब्जा कर लिया. आज भी लगभग वैसी ही स्थितियां बन रही है. अमेजन, फ्लिीपकार्ड, वालमार्ट, ओला जैसी कंपनियां अपना जाल बिछा रही हैं. कैसे भारत का व्यापारी इन सबका सामना करेगा? बात विदेशी कंपनियों की ही नहीं है, बल्कि भारत के बड़े समूहों की भी है, जिन्होंने अधिकांश व्यापार पर आधिपत्य जमा रखा है और हर सरकार विदेश एवं भारतीय कंपनियों का हर तरह से सहयोग करती है. प्रश्न है कि इन स्थितियों में छोटे व्यापारी कैसे सफल हो पायेंगे? कैसे अमीरी गरीबी का फासला कम होगा? कैसे हम भारत के भाल पर अपनी ही पीढ़ी को स्वस्तिक रचते हुए देख पाएंगे? हम इन सभी सवालों को इतिहास के पर्दे पर उतारकर लोगों को उसमें झांकने का रास्ता दिखा कर हल नहीं कर सकते. ऐसा करके हम चुनौतियों से हारने का ही प्रमाण देंगे. जिसका अर्थ राष्ट्र में आम आदमी की पराजय के अलावा और कुछ नहीं हो सकता. हमें इतिहास से अगर कुछ सीखना है तो हम उस तरफ देखने से क्यों कतराते हैं जिसमें हमारे हौसलों के फलसफे छिपे हुए हैं. जिसमें हमारे लोगों की जीवन के खुशहाली छिपी है, जिसमें हमारी युवापीढ़ी के सपने तैर रहे हैं.

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देश में छोटे व्यापारियों, स्टार्टअप एवं युवा उद्यमियों के दर्द को समझने वाला कोई नहीं है, उनके आंसू पोंछने वाला भी कोई नहीं है. जिन हजार- दस हजार नये व्यापारियों को बैंकों से सरलता से व्यापारिक कर्ज मिलना चाहिए, वह कर्ज कोई अकेला माल्या, नीरव मोदी ही डकार जाता है. दरअसल, भ्रष्टाचार पर सत्तारूढ़ दल चाहे जितने गाल बजा ले किन्तु नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे घोटालेबाजों की हकीकत पर पर्दा नहीं डाल सकते. सरकारी बैंक प्रबंधन की मिलीभगत से हजारों करोड़ों डूबने पर जीरो भ्रष्टाचार का दावा उल्टा पड़ता नजर आता है. पनामा पेपर लीक दूसरा बड़ा उदाहरण है. पड़ोसी देश पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का नाम इसमें आने पर जेल जाना पड़ा. इसके विपरीत पनामा की सूची में शामिल एक भी भारतीय का बाल तक बांका नहीं हुआ. कैसे मान ले कि भारत भ्रष्टाचार मुक्त हो रहा है, भारत विकास कर रहा है.

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वास्तविक सच्चाई यही है कि देश में केंद्र और राज्यों का एक भी सरकारी विभाग ऐसा नहीं हैं, जहां भ्रष्टाचार की गंदगी नहीं पसरी हो. आए दिन कर्मचारी से लेकर अफसरों तक के काले कारनामों की खबरें छपती रहती हैं. भ्रष्टाचार देश की जड़ों को निर्बाध गति से खोखला कर रहा है. एक एजेंसी के संयुक्त सर्वे में भ्रष्टाचार की बहती गंगा का खुलासा चौंकाने वाली है. इस रिपोर्ट में बेरोजगारी के बाद भ्रष्टाचार को दूसरे नंबर पर बताया गया है. सरकार के इरादे भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कितने दृढ़ हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय लोकपाल बिल अभी तक विचाराधीन है. सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर कई बार लताड़ लगा चुका है. इसी तरह ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2017 कि रिपोर्ट के मुताबिक भारत विश्व के सर्वाधिक भ्रष्ट देशों में शुमार है. विश्व के 180 देशों में भारत का भ्रष्टाचार में 81वां स्थान है. इस रिपोर्ट को भी केंद्र और राज्यों के सत्तारूढ़ दलों ने खारिज कर दिया.

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आज राष्ट्र पंजों के बल खड़ा भ्रष्टाचार मुक्ति एवं आम आदमी के विकास की प्रतीक्षा कर रहा है. कब होगा वह सूर्योदय जिस दिन देश का युवा नौकरी लेने वाला नहीं बल्कि नौकरी देने वाला बनेगा. महिलाएं अकेली भी सुरक्षित महसूस करेंगी. खाने को शुद्ध सामग्री मिलगी. सामाजिक जीवन में विश्वास जगेगा. बैंकों का कर्ज जरूरतमंद को सहजता से मिलेगा. मूल्यों की राजनीति कहकर कीमत की राजनीति चलाने वाले राजनेता नकार दिये जायेंगे. एक आम आदमी यदि चाहे कि वह आत्मनिर्भर बन जाये, एक सफल व्यवसायी बन जाये या चुनाव लड़कर संसद अथवा विधानसभा में पहुंचकर देश की ईमानदारी से सेवा करे तो यह आज की तारीख में संभव ही नहीं है. सम्पूर्ण तालाब में जहर घुला है, यही कारण है कि कोई भी सरकार या पार्टी ऐसी नहीं है, जो देश का वास्तविक विकास होते हुए देखना चाहती हो.

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भारतीय जीवन से नैतिकता इतनी जल्दी भाग रही है कि उसे थामकर रोक पाना किसी एक व्यक्ति के लिए संभव नहीं है. सामूहिक जागृति लानी होगी. यह सबसे कठिन है पर यह सबसे आवश्यक भी है. ईश्वर में आस्था परिश्रम का विकल्प नहीं है. नैतिक उत्थान की चाह, संकल्पों का विकल्प नहीं है. एक स्वस्थ समाज का स्वप्न जागरण का विकल्प नहीं है. भ्रष्टाचार एवं आचरण हीनता कांच की तरह टूटती नहीं, उसे लोहे की तरह गलाना पड़ता है. विकास की उपलब्धियों से हम ताकतवर बन सकते हैं, महान नहीं. महान उस दिन बनेंगे जिस दिन हमारी नैतिकता एवं चरित्र की शिलाएं गलना बंद हो जायेगी और उसी दिन राष्ट्र को विकास की वास्तविक दिशाएं मिलेंगी. वोटों के द्वारा सत्ता हासिल करने का विकास माॅडल देश को वास्तविक तरक्की नहीं दे पायेगा.

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