
Akshay/Ravi
Ranchi: जिला हो या शहर. विकास का खाका खींचने की जिम्मेदारी एक आईएएस की ही होती है. एक ऐसा जिला जो जिला होने से ज्यादा शहर होने के लिए जाना जाता हो. वहां बैलेंस गड़बड़ाने पर विकास के पहिए की रफ्तार धीमी पड़ जाती है और ऐसा होते देखा भी गया है. लेकिन इस भूल को सुधारने की बजाय झारखंड सरकार दोहराने का काम कर रही है.
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उदाहरण धनबाद था और अब रांची भी उसी फेहरिस्त में शामिल होने जा रहा है. धनबाद और रांची दोनों शहरों की देखरेख निगम के जिम्मे होती है. अगर शहर का जिला समाहरणालय और निगम का बैलेंस गड़बड़ाता है तो इसका सीधा असर विकास पर पड़ता है.
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2006 बैच के मनोज और 2011 बैच के महिमापत
2006 बैच के आईएएस अधिकारी मनोज कुमार आठ फरवरी 2018 तक रांची के उपायुक्त थे. उनका तबादला गिरिडीह कर दिया गया था. राय महिमापत रे जो कि 2011 बैच के आईएएस अधिकारी हैं उन्हें रांची का उपायुक्त बनाया गया. अब ठीक छह महीने के बाद मनोज कुमार को दोबारा रांची वापस बुला लिया जाता है. उन्हें रांची निगम का आयुक्त पद मिला है. अब यहां के डीसी राय महिमापत रे हैं जो मनोज कुमार से पांच साल जूनियर हैं. ऐसे में रांची शहर में किसी भी काम के लिए मनोज कुमार को रांची डीसी पर निर्भर रहना होगा. यही नहीं शहर की विकास की जो भी बैठकें होंगे उसकी अध्यता भी डीसी राय महिमापत रे करेंगे जो नगर निगम आयुक्त से काफी जूनियर हैं. ऐसे में हो सकता है कि रांची शहर के रोजमर्रा के कामों पर असर पड़े.
धनबाद में दिख चुका है असर
आज से पहले धनबाद के नगर आयुक्त राजीव रंजन थे. राजीव रंजन 2010 बैच के अधिकारी हैं. वहां के डीसी ए. डोडे 2011 बैच के आईएएस अधिकारी है. धनबाद में देखा गया है कि शहर के विकास के लिए होने वाली बैठकों में राजीव रंजन नहीं जाते थे. यह बात सभी को पता है कि राजीव रंजन को बैठकों की अध्यक्षा उनका जूनियर कर रहा है. यह खटकता था. इस बार भी चंद्रमोहन कश्यप को धनबाद निगम का आयुक्त बनाया गया है. चंद्रमोहन कश्यप 2007 बैच के अधिकारी हैं. ऐसे में वो वहां के डीसी से चार साल सीनियर हुए.
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