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अब हाईब्रिड सिस्टम के कुचक्र में फंसने जा रहा है सरकारी शराब का कारोबार

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Ranchi: खबर है कि झारखंड सरकार का उत्पाद विभाग फिर शराब के कारोबार को लेकर एक प्रयोग करने जा रहा है. नये साल की शुरुआत से सरकार राज्यभर में हाईब्रिड सिस्टम से शराब बेचने का काम करेगी. हाईब्रिड सिस्टम का मतलब है कि राज्य के 70 फीसदी शराब दुकानों का संचालन प्राइवेट शराब कारोबारी करेंगे. बाकी 30 फीसदी दुकानों का संचालन सरकार करेगी, ठीक वैसे ही जैसा कि अभी कर रही है. इससे पहले शराब को लेकर सरकार का प्रयोग गलत साबित हो चुका है. सरकार ने शराब के पूरे कारोबार को छत्तीसगढ़ की तर्ज पर अपने हाथों में ले लिया था. लेकिन सरकार को इस कदम से राजस्व काफी नुकसान हुआ. घाटे के बाद उत्पाद विभाग की परेशानी बढ़ी. अब सरकार के दवाब के बाद फिर से हाईब्रिड सिस्टम वाला प्रयोग होने जा रहा है.

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हाईब्रिड सिस्टम झारखंड में होगा कितना कारगर

उत्पाद विभाग में राजस्व में इजाफा कैसे हो? इसे देखने और जानने के लिए कुछ चुनिंदा अधिकारियों को देश के चुनिंदा राज्यों में भेजा गया था. इसी क्रम में अधिकारी दिल्ली भी गए थे. दिल्ली में शराब के कारोबार को सरकार हाईब्रिड सिस्टम की तर्ज पर चलाती है. वहां के करीब 30 फीसदी दुकानों का संचालन सरकार करती है और बाकी दुकानों को लाइसेंस जारी कर शराब कारोबारियों को दे दिया जाता है.

हाईब्रिड सिस्टम झारखंड में लागू होता है तो क्या वो कारगर होगा? अब ऐसे ही सवाल उठने लगे हैं. क्योंकि दिल्ली एक शहरी इलाका है. उसके हर इलाके में शराब की बिक्री करीब-करीब एक जैसी है. ग्रामीण क्षेत्र ना होने का शराब के कारोबार को काफी फायदा होता है. लेकिन झारखंड में शहरी से ज्यादा ग्रामीण इलाका है. पुराने कुछ शराब कारोबारियों का कहना है कि उत्पाद विभाग हर कीमत पर शहरी क्षेत्र अपने पास रखना चाहेगा, जहां शराब की खपत हो. ऐसे में शराब कारोबारी ग्रामीण इलाकों में शराब दुकान लेने में अपनी रुचि ही नहीं दिखायेंगे. ऐसी स्थिति में फिर से एक बार उत्पाद का प्रयोग गलत साबित हो सकता है.

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सरकार का पहला प्रयोग क्यों हुआ फेल

इससे पहले एक अगस्त 2017 से सरकार पूरे राज्य में शराब को बेचने का काम खुद कर रही है. सरकार का दावा था कि इस प्रयोग से राजस्व बढ़ेगा. लेकिन इसका उल्टा हुआ. शराब को मुंह की खानी पड़ी. तय लक्ष्य के आस-पास भी कारोबार नहीं पहुंच पाया. जबकि शराब पर ड्यूटी बढ़ा दी गयी. शराब की कीमत को भी सरकार ने पहले के मुताबिक काफी बढ़ा दिया. चालू वित्तीय वर्ष में निर्धारित 1500 करोड़ रुपये राजस्व के विरुद्ध एक हजार करोड़ रुपये की भी वसूली नहीं हो सकी है. जबकि ना तो शराब की खपत कम हुई और ना ही प्राइवेट प्लेयर का कोई रोल पूरे कारोबार में है. ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि आखिर सरकार को कारोबार में फायदा क्यों नहीं हुआ.

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क्या तीस फीसदी दुकानों को हाथ में रखने से होगा फायदा

इससे पहले सरकार ने दो प्राइवेट कंपनियों से ह्यूमन रिसोर्स आउटसोर्स कराया. दोनों के साथ एक साल का करार 31 जुलाई को खत्म हो चुका है. अब एक्सटेंशन देकर सरकार उन कंपनियों के साथ काम कर रही है. शराब कारोबार जब पूरी तरह से सरकार के हाथों में है, तो सरकार को घाटा हो रहा है. ऐसे में हाईब्रिड सिस्टम के शुरू होते ही तीस फीसदी कारोबार सरकार के हाथों में रहेगा. अभी जब सरकार शराब खुद बेचकर राजस्व वसूली नहीं कर पा रही है, तो कैसे सरकार तीस फीसदी दुकानों से मुनाफा कमा सकती है.

मिल चुकी है सरकार की तरफ से हरी झंडी

आगामी एक दिसंबर से राज्य में शराब बेचने की व्यवस्था में परिवर्तन हो सकता है. मुख्यमंत्री रघुवर दास ने उत्पाद विभाग को सरकारी शराब दुकानों की जगह हाइब्रिड सिस्टम से खुदरा शराब बेचने की व्यवस्था लागू करने पर मौखिक सहमति प्रदान कर दी है. हाइब्रिड सिस्टम में शराब की कुल दुकानों की निर्धारित फीसदी का संचालन मॉडल शॉप के रूप में बिवरेज कॉरपोरेशन करेगा. शेष दुकानों का संचालन लाइसेंस के माध्यम से कराया जायेगा. लाइसेंस देने के लिए उत्पाद विभाग फिर से लॉटरी करायेगा. उत्पाद विभाग द्वारा संबंधित प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है. प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी के बाद सरकारी शराब की दुकानों पर ताला लग जायेगा.

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