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मौगैंबो और कनुप्रिया के बीच अमरीश पुरी

जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi :

मेरे हर बावले पन पर
कभी खिन्न होकर
कभी अनबोला ठान कर
कभी हंसकर
तुम जो प्यार से
अपनी बाहों में कस कर
बेसुध कर देते हो
उस सुख को मैं छोड़ू क्यों?
करूंगी बार-बार नादानी करूंगी
तुम्हारी मुंहलगी, जिद्दी
नादान मित्र ही तो हूं ना!

ये पंक्तियां हैं सुप्रसिद्ध साहित्यकार धर्मवीर भारती की काव्य कृति कनुप्रिया की. अमरीश पुरी की फिल्में तो दर्जनों देखी थीं लेकिन उनसे रूबरू होने का मौका एक बार ही मिला था. सन 2003 की बात है अमरीश पुरी रांची के सीएमपीडीआई (CMPDI ) के मयूरी प्रेक्षागृह में धर्मवीर भारती की पत्नी पुष्पा भारती के साथ आए थे.

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अमरीश पुरी को धर्मवीर भारती की कनुप्रिया का काव्य पाठ करना था. गजब का विरोधाभास था. मेरे सामने उस दिन के पहले तक अमरीश का एक ही पहलू सामने आया था वो था हिन्दी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय विलेन का. मैंने मन ही मन सोचा कहां मिस्टर इंडिया का क्रूर और शातिर मौगैंबो और कहां की कनुप्रिया की प्यारी राधा.

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राधा के मनोभावों की संवेदनशील प्रस्तुति

मयूरी प्रेक्षागृह खचाखच भरा था. हालांकि इसकी क्षमता कोई ज्यादा नहीं है फिर भी अमरीश पुरी के फिल्मी डायलॉग की जगह उनका काव्य पाठ सुनने इतने लोग पहुंचे तो मुझे सुखद आश्चर्य हुआ. अमरिश स्टेज पर आए उन्होंने लोगों से अपनी गंभीर आवाज में अनुरोध किया कि अपने मोबाइल फोन ऑफ कर दीजिए. कृपया पाठ के बीच में ताली ना बजाएं. अगर छोटे बच्चे साथ हैं तो उन्हें बाहर ले जाएं.

ऐसा लगा जैसे कोई व्यक्ति प्रार्थना करने या ध्यान करने के लिए उपयुक्त माहौल तैयार करने का लोगों से अनुरोध कर रहा है. उनके इस अनुरोध का प्रभाव पड़ा और पूरा हॉल शांत होकर उनके काव्य पाठ सुनने का सुनने को आतुर हो उठा. माइक लेकर अमरीश ने काव्य पाठ शुरू किया.

अमरीश पुरी की गंभीर और बुलंद आवाज और उसमें से मुखरित होता राधा का प्रेम, शिकायत और विरह वेदना. अजीब विरोधाभास था बॉलीवुड के सबसे लोकप्रिय विलेन एक तरफ तो दूसरी तरफ भारतीय सांस्कृतिक विरासत के सर्वाधिक चर्चित प्रेमिका कनुप्रिया राधा. इसे ही हम विरोधाभासों का समन्वय कह सकते हैं.

पूरे पाठ के दौरान अमरीश की दमदार, गंभीर गूंजती रही. ना कहीं वाह-वाह और ना तालियां.काव्य पाठ के दौरान अमरीश राधा की एक-एक भावना को आत्मसात कर उसे अपनी मंत्रमुग्ध करने वाली आवाज में अभिव्यक्त करते नजर आए.

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जैसे सम्मोहित कर दिया हो

काव्य पाठ के अंत में ऐसा लगा जैसे लोग किसी जादूगर के सम्मोहन से मुक्त हुए. सभी लोग खड़े हो गए और तालियां की गड़गड़ाहट से अपनी भावनाएं उजागर की. कई लोगों की आंखों में आंसू छलक आए थे. अमरीश ने भी चश्मा हटा कर आंसू पोछे.

सिनेमा का सफर

अमरीश की पहली फिल्म थी 1970 में आई प्रेम पुजारी. आखिरी फिल्म थी 2006 में आई कच्ची सड़क. उनका सबसे हिट रोल था मिस्टर इंडिया के लिए मोगैंबो का. जिसका डायलॉग आज भी फेमस है. उन्होंने ज्यादातर विलेन की भूमिकाएं ही निभाईं.

नकारात्मक भूमिकाओं को वो इस ढंग से निभाते थे कि एक वक्त ऐसा आया जब हिंदी फिल्मों में ‘बुरे आदमी’ के रूप में लोग उन्हें पहचानने लगे. हिंदी सिनेमा के इतिहास में मोगैंबो को उनका सबसे लोकप्रिय किरदार माना जाता है.

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एक फिल्म के लिए 1 करोड़ रुपये लेते थे

अमरीश पुरी असल जीवन में बहुत ही अनुशासन वाले व्यक्ति थे. उन्हें हर काम सही तरीके से करना पसंद था. चाहे फिल्में हो या निजी जीवन का कोई भी काम. अमरीश पुरी हिंदी फिल्मों के सबसे महंगे विलेन थे. उनकी फीस उस दौर के अभिनेताओं को भी हैरान करती थी. कहा जाता है कि एक फिल्म के लिए वह 1 करोड़ रुपये तक फीस ले लेते थे. लेकिन जहां मामला जान पहचान का होता था वहां अपनी फीस कम करने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं था. हालांकि ये आकंड़ा उन फिल्मों का है जिनका बजट ज्यादा होता था.

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एन.एन. सिप्पी की फिल्म छोड़ी

बताया जाता है एक बार एन.एन. सिप्पी की फिल्म उन्होंने साइन की लेकिन किसी वजह से 2-3 साल तक शूटिंग शुरू नहीं हो पाई. जब फिल्म शुरू हुई तो अमरीश पुरी ने उस समय के रेट के हिसाब से फीस मांग ली. लेकिन जब एन.एन. सिप्पी ने उन्हें इतनी फीस देने से इनकार किया तो उन्होंने फिल्म ही छोड़ दी.

इस बारे में अमरीश पुरी ने एक इंटरव्यू में कहा था- जब मैं अपने अभिनय से समझौता नहीं करता तो मुझे फीस कम क्यों लेनी चाहिए. निर्माता को अपने वितरकों से पैसा मिल रहा है क्योंकि मैं फिल्म में हूं. लोग मुझे एक्ट करते हुए देखने के लिए थियेटर में आते हैं. फिर क्या मैं ज्यादा फीस का हकदार नहीं हूं?

सिप्पी साहब ने अपनी फिल्म के लिए मुझे बहुत पहले से साइन किया था, इस वादे के साथ कि फिल्म पर एक साल में काम शुरू होगा. अब तीन साल हो गए हैं, और मेरी फीस बाजार के रेट के हिसाब से बढ़ गई है. अगर वह मुझे मेरे काम जितनी फीस नहीं दे सकते तो मैं उनकी फिल्म में काम नहीं कर सकता.

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बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड नहीं मिला

परदे पर विलेन बनकर भी हर किसी के दिलों में बसने वाले अमरीश पुरी को अपनी किसी भी फिल्म के लिए बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड नहीं मिला. कुछ एक फिल्मों के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवॉर्ड जरूर मिला.

एक्टिंग को प्रोफेशन मानकर गंभीर रहने वाले अमरीश पुरी ने भारतीय रंगमंच और सिनेमा को अपनी जिंदगी के 35 साल दिए और हिंदी सिनेमा में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है.

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जीवन यात्रा

अमरीश पुरी (Amrish Puri) का जन्म 22 जून, 1932 को पंजाब के नवांशहर में हुआ था. अमरीश पुरी चार भाई बहन थे. बड़े भाई मदन पुरी और चमन पुरी दोनों फिल्म अभिनेता थे. अमरीस जब वे कैरेक्टर रोल में आए तो उन्होंने अपने फैन्स की आंखें नम कर दीं. ‘दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे’ में अमरीश पुरी का डायलॉग ‘जा सिमरन जा’ तो ऐसा आइकॉनिक डायलॉग बना है कि आज भी सबकी जुबान पर रहता है.

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पहले स्क्रीन टेस्ट में फेल हो गए थे

अमरीश पुरी अपने पहले स्क्रीन टेस्ट में फेल हो गए थे, और उन्हें एम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन मिनिस्ट्री ऑफ लेबर ऐंड एंप्लॉयमेंट में नौकरी करने लगे. अमरीश पुरी ने नौकरी के साथ ही पृथ्वी थिएटर में नाटक करने शुरू कर दिए थे. वे रंगमंच की दुनिया का दिग्गज नाम बन गए और उन्हें 1979 में संगीत नाटक एकेडमी के पुरस्कार से भी नवाजा गया.

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‘हम पांच’ से पहचान मिली

रंगमंच की इस पहचान ने उन्हें पहले टीवी की दुनिया और फिर सिनेमा जगत में आगे बढ़ने का मौका दिया. लगभग 40 साल की उम्र में उनका फिल्मी करियर परवान चढ़ा. अमरीश पुरी को 1980 की सुपरहिट फिल्म ‘हम पांच’ से पहचान मिली जिसमें उन्हें विलेन का रोल निभाया था. 1982 में अमरीश ने सुभाष घई की ‘विधाता’ में विलेन का रोल निभाया था और यह काफी पॉपुलर भी हुआ था.

अमरीश पुरी का 12 जनवरी 2005 में कैंसर की वजह से निधन हो गया. उन्होंने लगभग 400 फिल्मों में काम किया था.

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