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वर्ष में दो बार क्यों मनाया जाता है श्रीहनुमान जन्मोत्सव?

प्रश्न तो स्वाभाविक है कि वर्ष में दो बार श्रीहनुमान जन्मोत्सव क्यों मनाया जाता है? वास्तविकता में जन्मोत्सव एक बार ही मनाया जाता है किंतु दूसरी बार श्रीहनुमान जन्मोत्सव को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है. बाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीबजरंगबली हनुमानजी का जन्म कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि मंगलवार को स्वाति नक्षत्र में हुआ था.

अब ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि चैत्री पूर्णिमा को श्रीहनुमान जन्मोत्सव क्यों मनाया जाता है? जैसा कि हम सब जानते हैं कि श्रीहनुमानजी को अष्ट सिद्धियां और नौ निधियां मिली हुई थीं, जिसके चलते वे बेहद ही बलशाली थे. इतने कि वह हवा में भी उड़ सकते थे. शास्त्रों में उल्लेख है कि एक बार भूख लगने पर अपनी इन्हीं शक्तियों के दम पर भगवान सूर्य को उन्होंने फल समझ कर निगल लिया था. इस कारण चारों तरफ अंधकार छा गया था. इस बात से देवराज इंद्र बेहद क्रोधित हुए और श्रीहनुमानजी को दंड देने के लिए उनपर वज्र का प्रहार किया. यह वज्र हनुमानजी की दाढ़ी में लगा जिससे वे बेहोश हो गये. पवनदेव ने जब अपने पुत्र को इस तरह से संकट में देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध आया और उन्होंने पूरे ब्रह्मांड की प्राणवायु को रोक दिया. इससे सब हैरान परेशान हो गये और हर तरफ हाहाकार मच गया. इसके बाद तब श्री्ब्रह्माजी पवनदेव के पास गये और श्रीहनुमान देव को जीवनदान दिया. यह दिन चैत्र मास की पूर्णिमा थी. चूंकि इस दिन श्रीबजरंगबली को नया जीवन मिला था ऐसे में यह दिन उनके जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा.

चैत्र पूर्णिमा गुरुवार 6 अप्रैल श्रीहनुमान जन्मोत्सव को पूजनादि प्रातः सूर्योदयोपरांत किसी भी समय किया जा सकता है, किंतु सर्वोत्तम मुहूर्त प्रातः 5:35 (पांच बजकर पैंतीस मिनट) से 7:08 बजे (सात बज कर आठ मिनट) तक है.

आचार्य ए के मिश्रा के फेसबुक वॉल से

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