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कवि और कविता पर आज बाजारवाद हावी, इसलिए मंच में हुआ बदलाव

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एक वक्त था जब कवि और कविताओं की अपनी एक अलग रौनक थी. लेकिन बाजारवाद के चकाचौंध में उस रौनक की रोशनी गुम सी गयी है. कभी कवि की एक पंक्ति से एक जमाने का हाल बयां होता था. लेकिन आज पूरी कविता किसी माजरे के लिए फीकी पड़ती दिखती है. आखिर ऐसा क्यों. इस फर्क के पीछे की आखिर वजह क्या है. न्यूज विंग की छाया / राहुल गुरु को बता रहे हैं मशहूर कवि डॉ. विष्णु सक्सेना.

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सवाल : मेडिकल साइंस से कविता की ओर कैसे आना हुआ?

जवाब : जिंदगी बहुत कुछ सिखाती है. जिंदगी में कई मोड़ आते हैं. मेरा कहना है कि हम जिंदगी में वही करते हैं, जो हमारे अभिभावक कहते हैं. लेकिन ऊपरवाला कुछ और चाहता है. मेरे पिताजी चाहते थे डॉक्टर बनूं तो मैं इस ओर चला आया. बतौर मेडिकल ऑफिसर काम भी किया. लेकिन कविता के बीज अंदर थे ही. पिताजी की इच्छा से डॉक्टर अब ऊपरवाले ने चाहा कवि बनूं. असल में कविता मेरे अंदर थी. मेरे पिता अच्छी कविता लिखते थे. दादाजी को कविता के प्रति लगाव था लेकिन उन्होंने स्वांत: सुखाय के लिए कविता की. मैंने इसे जनजन तक पहुंचाया. कविता की ओर शादी के बाद पूरी तरह से आया. मैं जहां मेडिकल ऑफिसर के रूप में कार्यरत था, वहां की स्थिति कुछ ऐसी थी कि मैं अपने काम के साथ न्याय नहीं कर पा रहा था. दूसरी ओर कविता भी करना था. ऐसे में शादी के बाद इस ओर पूरी तरह से आया.

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सवाल : मंच पर आये कितने साल हुए. तब से लेकर अब तक मंच कितना बदला है?

जवाब : मैं 38 साल से कविता के मंच पर हूं. साल 1982 में पहली बार मंच पर गया था. तब से लेकर अब तक कविता के कई रंग देखे हैं. मंच के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. तब के मुकाबले अब कविता का मंच काफी बदला है. पहले मंच पर जो रेस्पेक्ट था, अब वो नहीं है. ऐसा कवियों के बीच भी आपस में देखने को मिल रहा है. अब कविता में बाजार हावी हो गया है. और जहां बाजार हावी होता है वहां रेस्पेक्ट धीरे-धीरे कम होती जाती है. कविता में भी पैसा आया. जहां पैसा आता है वहां दुर्गुण भी साथ आता है. पैसा पिशाच है. यह तो रही मंच की बात. अब कविता की बात करें तो इसमें भी गिरावट आयी है. निश्चत रूप से जब कविता गिरी तो कवियों में भी गिरावट आयी.

सवाल : किन वजहों से कवि और कविता में गिरावट आयी है?

जवाब : इस इलेक्ट्रोनिक मीडिया जगत ने कवि और उनकी कविता दोनों को बर्बाद किया है. पहले कवि पढ़ता था. साहित्य पढ़ता था. मैग्जीन पढ़ता था. फिर देखता था कि रसखान ने कैसे लिखा है. तुलसी ने कैसे लिखा है. ये बातें उन्हें सिखाती थीं. अब ऐसा नहीं है. अब पढ़ना-पढ़ाना बंद हो गया है. अब तो यूट्यूब खोला और प्रतिष्ठित कवियों की शैली चुरायी और काम शुरू. कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि जिस कवि की शैली ले रहे हैं, उसने कितनी मेहनत की होगी. स्पष्ट कहें तो मौलिकता की कमी हो गयी है.

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सवाल : आपने श्रृंगार को कविता का मूल बनाया. ऐसा क्यों?

जवाब : जब मैंने मंच पर आना शुरू किया था, तब गीत मंच के एक कोने में पड़ा था. गोपाल दास नीरज जैसे कवि अपनी पारी खेल चुके थे. तब मंच पर हास्य रस और वीर रस हावी था. तब काका हाथरसी, बाल कवि बैरागी, हरिओम पवांर जैसे कवि मंच पर हावी थे. ऐसे में अगर आप वीर रस या हास्य रस की ओर जाते तो पहचान खो देते. ऐसे में मैंने कोने में पड़े गीत को चुना और इसी ओर बह चला. ऐसे में लोगों के बीच गीत के रूप में प्रेम आया. लोगों ने हाथों हाथ लिया. इसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

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सवाल : अब कविता गिटार और कोरस के साथ मंच से निकल रही है. यूं कहे तो कविता टारगेट ग्रुप देख कर पढ़ी जा रही है. क्या कहतें हैं आप?

जवाब : कविता एक पारंपरिक चीज है. इसमें किसी तरह का कोई लेप लगा कर किसी समूह विशेष के लिए लिखा या पढ़ा जा रहा है तो यह गलत है. एक तरह से हम जहर बांट रहे हैं. हम नयी पीढ़ी को बता रहे हैं कि कविता तो यही है. जबकि कविता कुछ और है. कायदे से अब कवि सम्मेलन कम साज सम्मेलन ज्यादा हो रहे हैं. दूसरी बात यह भी है कि कविता को अलग-अलग स्वरूप में लोगों के बीच लाया जा रहा है. अगर लोग कविताएं इस तरह से सुन रहे हैं तो उसमें क्या कहा जा सकता है. सबकी अपनी-अपनी दुकान है. मैं अपनी बात कहूं तो मैं अपने तरीके से संतुष्ट हूं.

सवाल : ओपन माइक कल्चर ने युवा कवियों पर कितना सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव डाला है?

जवाब : निश्चित रूप से ओपन माइक ने युवाओं को अवसर दिया है. नयी प्रतिभाएं सामने आ रही हैं. यह बहुत अच्छा कल्चर है. पहले गोष्ठियां हुआ करती थीं, उसी का नया वर्जन ओपन माइक कल्चर है. कायदे के ओपन माइक एक छोटा अखाड़ा है, जहां से निकल कर बड़े अखाड़े में जाना है.

सवाल : नये कवियों को क्या कहना चाहेंगे?

जवाब : कविता की आज तक कोई यूनिवर्सिटी नहीं खुली. हीरे तराशे तो जा सकते हैं, बनाये नहीं जा सकते हैं. यह गॉड गिफ्टेड होता है. किसी व्यक्ति को कवि नहीं बनाया जा सकता है. उसके अंदर प्रतिभा है तो उसे तराशा जा सकता है. निश्चित रूप से लेखनी को व्यवसाय बना सकते हैं. अच्छा पढ़िए, अच्छा लिखिये. निश्चित रूप से आपको पहचान मिलेगी. वैसे युवा जो कविता के क्षेत्र में आना चाहते हैं, वे अच्छा पढ़ें यानी अच्छे कवियों को पढ़े. अच्छा सुनें और फिर उनकी शैली का लाभ उठायें.

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