
Ranchi : झारखंड में जनवरी के तीसरे सप्ताह तक ही गांव की सरकार नजर आयेगी. इसके बाद उनका अस्तित्व स्वतः भंग हो जायेगा. पंचायती राज विभाग ने इस संबंध में सभी डीसी, जिला पंचायती राज पदाधिकारियों को लेटर जारी कर दिया है. यहां तक कि पंचायतों का वित्तीय अधिकार 5 लाख से घटाकर 2.5 लाख तक सीमित कर दिया है. अब अलग-अलग दलों के प्रतिनिधियों ने पंचायतों का अधिकार बनाये रखने की वकालत शुरू कर दी है. भाजपा, कांग्रेस, आजसू पार्टी के बड़े नेता पंचायतों का अधिकार और वित्तीय शक्ति बनाये रखने की मांग सरकार से करने लगे हैं. वैसे माना जा रहा है कि सभी दलों को अंदाजा हो रहा है कि पंचायती व्यवस्था के चलते गांव, कस्बों में चेतना बढ़ी है. पंचायती राज के कारण गांवों के विकास कार्यक्रमों में तेजी भी आयी है.

पंचायत चुनाव होने तक बरकरार रहे अधिकार- बाबूलाल
भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी ने पंचायतों का अधिकार बनाये रखने की मांग उठायी है. कहा है कि पंचायत चुनाव होने तक राज्य में पंचायत प्रतिनिधियों का पावर बनाये रखना चाहिये. कोरोना संकट या जिस कारण से भी पंचायत चुनाव इस साल नहीं हो सके हों, उसके चलते पंचायती व्यवस्था का भंग होना नुकसानदायक है. पंचायत चुनाव के मसले पर सरकार को सिर्फ आदेश जारी करना है. संविधान में किसी तरह के संशोधन या प्रावधान का सवाल ही नहीं उठता. पंचायत चुनाव नहीं कराने के मसले पर सरकार द्वारा सभी डीसी को जारी आदेश पत्र वापस लेना चाहिये. वे जब सीएम थे औऱ पंचायत चुनाव में बाधा थी तो ग्राम सभा को अधिकार दिया गया था.
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अरबों का होगा नुकसान : सुदेश महतो
आजसू पार्टी प्रमुख और विधायक सुदेश महतो ने सीएम से अनुरोध किया है कि चुनाव होने तक पंचायती व्यवस्था को राज्य में बनाये रखा जाये. वर्तमान परिस्थितियों के बीच ब्यूरोक्रेट्स के हाथों में पंचायतों की शक्तियां थमाने से राज्य पीछे चला जायेगा. पंचायती राज व्यवस्था के संचालन के लिये सरकार किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची है. ना ही इसके लिये कोई तैयारी की गयी है. ऐसे में 64 हजार 700 पंचायत प्रतिनिधियों (त्रिस्तरीय) के विदा हो जाने से भारी नुकसान होगा. पंचायती व्यवस्था नहीं रहने से 15वें वित्त के पैसे का उपयोग गांव के विकास कार्यों के लिये नहीं हो सकेगा. केंद्रीय स्तर से मिलने वाले अरबों रुपये का नुकसान भी उठाना पड़ेगा.
बनायी जाये प्रशासकीय समिति : दीपिका पांडेय सिंह
महागामा विधायक दीपिका पांडेय सिंह ने सीएम को लेटर लिखकर कहा है कि पंचायतों के पुनर्गठन होने तक प्रशासकीय समिति बनायी जाये. इससे पंचायतों में चल रही विकास योजनाएं प्रभावित नहीं होंगी. समिति गठन की दिशा में पहल की जाये. मांडर विधायक बंधु तिर्की के अनुसार कानूनी दांव पेंच औऱ अदालती लड़ाई के बाद 2010 में पहली बार पंचायत चुनाव राज्य में कराये गये. अगला चुनाव होने तक वर्तमान पंचायत प्रतिनिधियों की वित्तीय शक्ति यथावत बनाये रखी जाये. पदाधिकारियों के भरोसे पंचायतों को छोड़ना समझदारी नहीं.
वैकल्पिक व्यवस्था में जुटी सरकारः मंत्री
मंत्री आलमगीर आलम मानते हैं कि झाखंड में पंचायतों के चुनाव अगले 6 महीने से पहले संभव नहीं हैं. ऐसी स्थिति में राज्य सरकार पंचायती राज व्यवस्था को वैकल्पिक तौर पर संचालित करने के लिए रास्ता निकालने में जुट गयी है. जब तक पंचायतों के चुनाव नहीं होते, तब तक पंचायती राज व्यवस्था के लिए प्रत्येक पंचायत में समूह या समिति के गठन पर विचार किया जा रहा है. इन समूहों में पंचायती राज व्यवस्था के तहत कार्य कर चुके जनप्रतिनिधियों को भी शामिल किया जा सकता है.
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