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दर्द-ए-पारा शिक्षक : पति-पत्नी दोनों हैं पारा शिक्षक, मानदेय के अभाव में नहीं करा पा रहे बेटी का इलाज

उज्जवला योजना से गैस कनेक्शन नहीं मिला, छोटी गैस है, वो भी चार माह से पड़ा है खाली नहीं

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Ranchi : जिस परिवार में सिर्फ एक पारा शिक्षक हो, उस परिवार का गुजारा कैसे हो रहा है, ये तो हमने आपको अपनी कई स्टोरीज से बताया है. लेकिन कुछ परिवार ऐसे भी हैं, जहां पति-पत्नी दोनो ही पारा शिक्षक हैं.

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साथ ही पांच महीने से मानदेय नहीं मिला हो तो ऐसे में परिवार का गुजारा कैसे हो रहा होगा. वो भी ऐसी परिस्थिती में जब दंपत्ति की बेटी को दिमागी बीमारी हो. ऐसे ही एक पारा शिक्षक दंपत्ति हैं, मार्की टूटी और दोलका पाहन.

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दोनों पति-पत्नी नचलदाग गांव में पारा शिक्षक हैं. दोनों एक ही स्कूल में भी हैं. जिसका नाम अपग्रेडेड हाई स्कूल पाहन टोली नचलदाग है. मार्की इस स्कूल में बतौर प्रभारी भी हैं. न्यूज विंग जिस वक्त उनके घर पहुंची, उस वक्त मार्की के पति घर पर नहीं थे.

न्यूज विंग ने मार्की से बात की. इस दौरान मार्की ने बताया कि दोनों पति-पत्नी साल 2002 से पारा शिक्षक की नौकरी कर रहे हैं. इसके पहले मार्की महिला मंडल चलाती थी. वहीं इनके पति दोलका गांव में ही डिस्पेंसरी चलाते थे. सरकारी नौकरी के नाम पर दोनों ने पारा शिक्षक की नौकरी कर ली.

मार्की बताती हैं कि पारा शिक्षक की नौकरी के कारण ही हमने बसा बसाया काम खत्म कर लिया. सिर्फ इसलिए की कभी न कभी स्थिति में सुधार होगा. लेकिन अब लगता है कि पारा शिक्षक के रूप में रहना बहुत मुश्किल है.

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नहीं करा पाई थी ससुर का इलाज, मानदेय नहीं मिला था  

पारिवारिक स्थिति का जिक्र करते हुए मार्की ने कहा कि, मानदेय से ही घर चलता है. थोड़ी बहुत खेती वे लोग करते हैं, लेकिन अब इतना वक्त और पैसा भी नहीं है कि, बड़े स्तर पर वे खेती कर सकें. क्योंकि बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ अन्य काम भी ब्लॉक स्तर के करने होते हैं.

साथ ही कहा कि, मार्च में ससुर सड़क दुर्घटना में घायल हो गये थे. हम जिस इलाके में रहते हैं, वहां आवागमन की सुविधा ठीक नहीं है. ऐसे में ससुर को गांव के ही डॉक्टरों को दिखाया गया. लेकिन आर्थिक हालात ऐसे नहीं थे कि रांची लाकर इलाज कराया जा सके.वहीं जब तक आसपास के लोगों के कोई मदद मिलती उसके चलते ही ससुर चल बसे. मार्की ने नम आंखों से कहा कि अगर से होते तो आज ससुर को बचा लेती.

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बेटी को है दिमागी बीमारी, नहीं हो पा रहा इलाज

बातों-बातों में मार्की ने बताया कि मेरी बेटी को दिमागी बीमारी है. जो भी मानदेय मिलता है, वो कभी उधार तो कभी दवाई में चला जाता है. उन्होंने बताया कि बेटी को बीमारी ऐसी है कि कोई डॉक्टर बता नहीं पा रहा है कि उसे क्या हुआ है. कभी डॉक्टर तो कभी ओझा को दिखाते हैं, लेकिन कोई फायदा नहीं हो पा रहा है.

आगे बताया कि पिछले पांच महीने से मानदेय नहीं मिलने की वजह से बेटी का इलाज भी रूका हुआ है. बताया कि, ऐसे तो स्कूल जाती है. लेकिन पिछले पांच माह से स्कूल की फीस भी बकाया है और  री एडमिशन भी नहीं कराया है.

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ऐसे में बेटी पर होने वाले खर्च तो रूक ही गए हैं. लेकिन जो मानदेय अप्रैल का सरकार ने दिया है, वो सिर्फ कर्ज चुकाने में ही खत्म हो गए. ऐसे में आगे का और परिवार का क्या सोचें. बिजली बिल भी छह माह से बकाया है.

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धान बेचकर चला रहे खर्च, लकड़ी और झाड़ी में खाना बनाते हैं

मार्की ने कहा कि पति-पत्नी दोनों ही पारा शिक्षक हैं. जो थोड़ी बहुच खेती करते हैं, उसके लिए किसी को रख भी नवहीं सकते, क्योंकि किसी से मजदूरी कराने पर उसे पैसे देने पड़ेंगे. ऐसे में पिछले पांच माह से धान बेचकर ही घर चला रहे हैं.

हमारे आंगन में कुछ सब्जियां उगती हैं, जिससे गिजारा चल जाता है. लेकिन जरूरत के बाकि सामान तेल, नमक, सर्फ, साबून खरीदने में बहुच मुश्किल हो रही है. मार्की ने कहा कि, गांव में रहते हैं, इसलिए किसी तरह गुजारा भी हो जा रहा है.

शहरी में रहकर गुदारा करना संभव नहीं है. आगे उन्होंने बताया कि उनके पास राशन कार्ड नहीं है. उज्जवला योजना से गैस भी नहीं मिला. जो पहले से छोटा गैस सिलेंडर है, वो भी चार माह से खाली पड़ा है. घर से कुछ दूर पर जंगल है तो वहीं से लकड़ी, झाड़ लाकर खाना बनाते हैं.

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गांव वालों की बातें भी सुननी पड़ती है, सम्मान अब क्या मिलेगा

गांव में शिक्षक के रूप में मिलने वाले सम्मान के बारे में पूछे जाने पर इन्होंने कहा कि उधार इतना बढ़ गया है कि राशन दुकानदार से लेकर गांव वाले सभी से बातें सुननी पड़ती हैं. सम्मान की बात तो अब सोचते भी नहीं. क्योंकि पेट तो पल नहीं रहा तो ऐसे में आदर की क्या सोचें.

पहले पति डिस्पेंसरी चलाते थे तो वही ठीक था. कम से कम हुनर था पैसे भी ठीक थे. सरकारी नौकरी के चक्कर में पारा शिक्षक बने गये, लेकिन अब आगे के भविष्य की चिंता होती है.

2017 का जिक्र करते हुए मार्की ने बताया कि एक बच्चा पेड़ से गिर गया था. स्कूल में तीन ही शिक्षक हैं. प्रभारी होने के कारण गांव वालों ने मुझे ही बातें सुनाई. वो भी ऐसे-ऐसे अपशब्द कि बताया नहीं जा सकता.

शिक्षक होने के कारण कई अन्य जिम्मेवारियां भी होती हैं. ऐसे में सब तरफ देखना संभव नहीं है. न जनता ये बात समझती है और न सरकार.

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