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दर्द ए पारा शिक्षक: भाई के दिए 15 किलो चावल से हो रहा गुजारा, प्रीतम स्कूल के बाद मजदूरी कर चुकाते हैं उधार  

बच्चों को भूलकर भी नहीं बनाऊंगा पारा शिक्षक

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Chhaya

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Ranchi:  एक पुरूष के आत्मसम्मान को  उस वक्त कितनी पीड़ा होगी, जब उसे अपने ससुराल में शरण लेना पड़े और वह भी जेठ सास के घर पर. इस पीड़ा को बयां नहीं किया जा सकता. क्यंकि इससे उस आदमी की काबिलीयत पर भी कई तरह के सवाल उठने लगेंगे.

लोग कहने लगेंगे कि  क्या वह अपने परिवार को एक घर भी नहीं दे सकता. लेकिन सोचिए, अगर उसे दो वक्त की रोटी भी परिवार के सहयोग से मिल रहा हो तब. हां हम पारा शिक्षक की ही बात कर रहे है. पारिवारिक बातें नहीं, निम्न वर्ग के उपर आर्थिक दबाव की बातें. ये पारा शिक्षक है हुरदा गांव के प्रीतम तिर्की.

ऐसे तो ये 2005 से पारा शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं. वर्तमान में उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय हुरदा में हैं. हुरदा में ये अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ किराए के मकान में रहते थे. लेकिन 2016 में उन्हें  वो मकान छोड़ना पड़ा, क्योंकि इन्होंने तीन सालों तक मकान का किराया नहीं दिया था. मकान का किराया मात्र पंद्रह सौ रूपए ही था.

प्रीतम ने बताया कि मकान मालिक अच्छे थे, कि तीन सालों तक छोड़ दिया. आज कल कौन किसी के लिए इतना सोचता है. जब उन्होंने देखा की स्थिति बदतर हो गई है तो उन्होंने कहा अपना देख लो. जेठ सास ने दो बच्चों पर दया कर रामपुर स्थित अपने घर रहने के लिए दिया. तब से यही रह रहे हैं. तीन साल हो चुके हैं. इनका किराया अभी तक बकाया है.

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बच्चों को ठीक से पढ़ा नहीं पा रहे, चाहते हैं बेहतर करें बच्चें

प्रीतम ने कहा कि मैंने तो पारा शिक्षक की नौकरी कर ली, और इसमें परेशानी कितनी है , इसे कह नहीं सकता. घर चलाने के लिए मजदूरी के अलावा कोई उपाय नहीं. स्कूल की छुट्टी होने पर पार्ट टाइम में भी मजदूरी करता हूं. जिससे कम से कम दो सौ रूपये तक मिल जाते हैं. प्रीतम ने बताया कि गर्मी छुट्टी समेत किसी भी लंबी छुट्टी या रविवार के दिन भी मजदूरी करने जाता हूं, जिससे कुछ पैसे मुझे मिल जाते हैं.

एक बेटी और एक बेटा है. आंखें नम थीं, पर एक मुस्कुराहट के साथ उन्होंने कहा कि मैंने तो पारा शिक्षक के रूप में योगदान दिया, बच्चे जीवन में अच्छा करें. अच्छी शिक्षा देना चाहता हूं. लेकिन कैसे संभव है. यहां तो पांच-पांच माह तक वेतन रोक दिया जा रहा है.

छह माह से बच्चों की फीस नहीं दी है. री एडमिशन का पैसा भी बचा है. स्कूल में प्राचार्य अच्छी हैं, जाकर बात करने से उन्होंने बच्चों को परेशान नहीं किया. लेकिन भविष्य में बच्चों को अच्छी शिक्षा दूं ताकि बच्चे कम से कम पारा शिक्षक न बनें.

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15 किलो चावल भाई ने दिया, उसी से हो रहा गुजारा

पांच माह से मानदेय बंद रहने की वजह से इनकी आर्थिक स्थिति इस हद तक बिगड़ी कि पिछले दिनों इनके बड़े भाई ने 15 किलो चावल खरीद कर दिया. इन्होंने कहा कि किराये के मकान में रहते हैं तो ऐसे में राशन कार्ड कहां से आएगा.

मजदूरी करते हैं तो कुछ खर्च चल रहा है. दैनिक उपयोग की वस्तुएं खरीदी जा रही हैं. दुकानों में कर्ज बढ़ता जा रहा है. पहले का कर्ज भी इतना है कि जो अब तक चुकाया नहीं जा सका है.

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दुकान पर सामान लेने जाता हूं तो दुकानदार पहले के बकाये के लिए पूछते हैं. ऐसे में दिहाड़ी करके राहत है कि कम से कम कुछ तो खर्च चल रहा है. रूका मानदेय मिल जाता तो राहत मिलती.

लेकिन अक्टूबर माह से सरकार पारा शिक्षकों के साथ ऐसा कर रही है. उन्होंने कहा कि समय पर मानदेय मिल जाए, तब भी इससे परिवार की जरूरतों की पूर्ति नहीं होती. दिहाड़ी तो करना ही है.

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अभावों के कारण बच्चे और पत्नी मायके चले गये

परिवार वालों के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि अभी घर में अकेले हैं. गर्मी की छुट्टियां चल रही हैं, बच्चें कुछ न कुछ मांग करते रहते हैं और मेरे पास पैसे का अभाव है. साथ ही बताया कि पत्नी भी हर छोटी सी छोटी चीज के लिए मन मार लेता है. इन आभावों के कारण पत्नी बच्चों के साथ मायके चली गई है.

बातचीत के दौरान इन्होंने बताया कि पहले तो कुछ फैक्टरियों में गार्ड का काम भी करते थे, लेकिन महीना में एक बार पैसा मिलता है, जबकि मजदूरी करने से हाथों हाथ पैसे मिल जाते हैं. ऐसे में बेहतर है कि मजदूरी ही करें.

बेटे की बीमारी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ सालों पहले बेटे को गंभीर बीमारी हो गई थी. डॉक्टर ने ब्लड चढ़ाने की बात कहीं थी. अस्पताल के बाहर पत्नी के साथ बच्चे को लेकर खड़ा था, कोई उपाय नहीं सूझ रहा था. ऐसे में एक अफसर ने मदद की, तब जाकर बेटे की जान बची.

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4500 बिजली बिल तक नहीं दे पा रहे

बिजली बिल के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि जेठ सास ने ही बिजली का कनेक्शन लिया है. हालांकि बिजली का उपयोग कम होता है. फिर भी तीन साल से बिजली बिल नहीं दे पाएं हैं.

पिछले तीन सालों में लगातार मानदेय रोक-रोक कर दिया गया. ऐसे में जो पैसे आते हैं, उधार चुकाने में ही चले जाते हैं. अब तो बिजली का बिल भी 4500 हो गया है.

प्रीतम ने कहा कि इस बार जैसे ही पांच महीने का मानदेय मिलेगा, सबसे पहले बिजली का बिल भरूंगा. उन्होंने कहा कि सरकार पारा शिक्षकों से सरकारी शिक्षकों के बराबर ही काम लेती है. लेकिन काम के बदले सही मानदेय नहीं मिलता. जिससे परेशानी बढ़ गई है.

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