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दर्द ए पारा शिक्षक: बेटे को प्रतियोगी परीक्षा नहीं दिला पा रहे अमर, मानदेय मिलता तो परीक्षाएं नहीं छूटतीं

2004 से पारा शिक्षक की नौकरी कर रहें, बड़े बेटे को है दिमागी बीमारी, मां कमर से है असमर्थ

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Ranchi :  एक अभिभावक के लिए यह बात कितनी कष्टदायक होगी कि जो खुद समाज में शिक्षा का अलख जगा रहे, वो अपने घर में ही बच्चों की पूर्ति नहीं कर पा रहे. वो भी तब जब बच्चे को जीवन के अहम फैसले लेने हों. हमें एक ऐसा ही पारा शिक्षक और उनका परिवार मिला, जो आर्थिक तंगी झेल रहा है. आर्थिक तंगी भी इस हद तक कि इंजीनियरिंग किये हुए अपने बेटे को ये शिक्षक प्रतियोगी परीक्षाओं में भेजने में भी असमर्थ है. यह पारा शिक्षक हैं हेसला टोली के अमर कुमार महतो.  महतो साल 2004 से पारा शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं. नामकुम हेसला टोली में इनका स्कूल है.

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देखें वीडियो-

बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि उनके बेटे ने चाईबासा इंजीनियरिंग कालेज से इंजीनियरिंग पूरी की. जिसके बाद पिछले एक साल से इनका बेटा प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आवेदन दे रहा है. लेकिन अक्टूबर से जो पारा शिक्षकों के मानदेय पर सरकार की तलवार चली है, उससे इनके बेटे परीक्षा नहीं दे पा रहे. खुद अमर कुमार महतो के छोटे बेटे रविंद्र कुमार ने बताया कि अक्टूबर से मानदेय नहीं मिलने के कारण वे तीन परीक्षाएं छोड़ चुके है. वहीं इतने पैसे अब है नहीं कि ये आगे की पढ़ाई तक के लिए अप्लाई कर सके. बताया कि पिछले कुछ दिनों से इन्होंने कहीं फार्म भी नहीं भरा है क्योंकि पैसे ही नहीं है. वर्तमान में ये अपग्रेडेड हाई स्कूल हेसला टोली में कार्यरत हैं.

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मानदेय का आधा पैसा इलाज में चला जा रहा है

अमर ने बताया कि 9680 रुपये मानदेय मिलता है. वो भी सरकार पांच छह माह के लिए रोक दे रही है. जब देती है तो एक दो माह का ही. साथ ही परिवार में दो दो लोग बीमार हैं, खर्च अधिक है. मानदेय का आधा पैसा इलाज में चला जा रहा है. इन्होंने बताया कि   बड़े बेटे को दिमागी बीमारी है. जिनका इलाज रिनपास में चल रहा है. वह 26 साल का तो है लेकिन दिमागी रूप से बच्चा है.

अमर ने कहा कि बेटे के इलाज में ही  लगभग दो हजार खर्च होता है. छोटे बेटे को भी किसी तरह इंजीनियरिंग कराया, ताकि अच्छी नौकरी लगे, लेकिन नौकरी भी नहीं लग रही.  जो पहले आवेदन किया है, बेटे ने वो परीक्षा भी नहीं ली.  अपनी मां का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मां भी बाथरूम में गिर गयी थी. तब से कमर से लाचार है. प्रतिमाह इनके इलाज में 2500 का खर्च है. मानदेय मिल नहीं रहा, ऐसे में इलाज की  समस्या है.

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परिवार का सहयोग है, नहीं तो और बेइज्जती होती

अपनी स्थिति बताते हुए नम आंखों से अमर ने कहा है कि लाली में थोड़ी बहुत पारिवारिक खेती होती है. लेकिन उसमें भाईयों का भी हिस्सा है. उन्होंने कहा कि सरकार ने कोई विकल्प नहीं छोड़ा है. खेती बारी से थोड़ा बहुत राशन चल रहा. भाईयों का सहयोग है. गांव वालों की भी थोड़ी सहभागिता होती है. लेकिन राशन दुकानों में भी कुछ न कुछ खरीदारी हो ही जाती है. गांव की राशन दुकान में उधार अधिक है.

कई बार दुकानदारों ने लोगों के सामने बोल दिया है. किस किस को क्या जवाब दें , समझ नहीं आता. सरकार ने तो हमें कहीं का नहीं छोड़ा. दुकानों में उधार के कारण गांव वाले भी इज्जत नहीं देते और न बच्चे.  जिससे शिक्षकों का स्तर ही गिरता जा रहा है. जब पारा शिक्षक की नौकरी ली थी, तब जो इज्जत मिलती थी,  अब वो बात नहीं रही. खराब तो तब लगता है तब अपने बच्चों की भी जरूरत को पूरा नहीं कर पाते.

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त्योहार हमेशा रूखे-सूखे बीतते हैं

होली जैसे त्योहार का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सिर्फ इसी साल नहीं, हमेशा त्योहार रूखे सूखे रहते हैं. अब तो रिटार्यमेंट की उम्र हो चली है. जितना हो सके, अपने खेतों में खटते है. कहीं और तो कुछ नहीं कर सकते. उपज कम है लेकिन सहारा है. दीवाली और दशहरा जैसे त्योहार भी ऐसे ही बीत जाते है.. बच्चों की इच्छा मारना सबसे अधिक दुखी करता है.

बड़े बेटे का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उसे तो कुछ समझ नहीं आता. ऐसे में किसी तरह उसकी जरूरतों और मांगों को पूरा करते है. स्कूल में दो सरकारी शिक्षक हैं और एक अन्य पारा शिक्षक है. सरकारी शिक्षकों की स्थिति तो अच्छी रहती है लेकिन जब भी त्योहारों का जिक्र स्कूल में होता है हम पारा शिक्षक चुप हो जाते हैं क्योंकि हमारे पास इतना संसाधन नहीं रहता कि त्योहार में  कुछ कर सकें.

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