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दर्द-ए-पारा शिक्षक : एक समय पेड़ के नीचे बच्चों को पढ़ाती थीं, अब घर का दरवाजा टूटा हुआ है, पर्दा लगा के सोती हैं

चार डिसमिल जमीन स्कूल बनाने के लिए दी, दो कमरों में खुद रहती है, मानदेय नहीं मिलने से राशन कार्ड के भरोसे चल रहा दाना पानी, गैस सिलेंडर महीनों से खत्म

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Chhaya

Ranchi :  शिक्षक शब्द के पहले पारा लगते ही इसके मायने और इनका स्तर दोनों बदल जाता है. काम सरकारी शिक्षक के बराबर ही करते हैं, लेकिन फर्क इन्हें मिलने वाले मेहनताने का है. सरकारी शिक्षकों को अच्छा वेतनमान दिया जाता है जबकि पारा शिक्षकों को मानदेय दिया जाता है.

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यह कहना है नामकुम जोरार गांव की पारा शिक्षिका उमा कुमारी धान का. वह 2001 से पारा शिक्षक के रूप में काम कर रही है. तब इनके गांव में स्कूल नहीं था. वर्तमान में ये नवसूजित प्राथमिक विद्यालय जोरार में पढ़ा रही हैं. उमा के पति दैनिक मजदूरी करते हैं. एक बेटी और दो बेटे हैं. घर पूरी तरह से उमा पर निर्भर है.

ग्रेजुएशन और डीएलएड करने वाली उमा  कहती है कि पारा शिक्षक की नौकरी से अच्छा वह बेरोजगार रहती. कम से कम बच्चों को किसी चीज की उम्मीद तो नहीं रहती.  खीझते हुए उमा कहती हैं कि पारा शिक्षकों को सरकार बबार्द कर रही है. अब तो स्थिति यह है कि तीन माह से गैस सिलेंडर तक नहीं है. लकड़ी और कोयला के भरोसे है.

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चार डिसमिल जमीन स्कूल बनाने के लिए दी

अपने बारे में बताते हुए उमा ने बताया कि सर्व शिक्षा अभियान के दौरान सभी गांवों में स्कूल खोलने की बात की गयी. जोरार गांव में किसी ने जमीन देने पर सहमति नहीं जताई, ऐसे में उमा ने अपने ससुराल की चार डिसमिल जमीन स्कूल खोलने के लिए दी.

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2000 में उमा ने जमीन दी. स्कूल 2010 में बन कर तैयार हुआ. इसके पहले लगभग दस सालों तक उमा पेड़ के नीचे गांव के बच्चों को पढ़ाया करती थी. उन्होंने बताया कि कई साल बाद उनके आंगन में स्कूल भवन बन कर तैयार हुआ. जहां वो शुरू से पढ़ा रही है. मानदेय नहीं मिलने का जिक्र करते हुए इन्होंने कहा कि पिछले चार सालों में पारा शिक्षकों के साथ सरकार ने दुव्र्यवहार किया है.

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टूटा दरवाजा नहीं बना पा रही, पर्दा लगा कर सोती हैं

उन्होंने कहा कि अक्टूबर माह से सरकार पारा शिक्षकों के मानदेय के साथ खिलवाड़ कर रही है. इसके पहले भी पांच-पांच माह का मानदेय रोक दिया जा रहा था. जबकि मानदेय मात्र दो-दो माह का दिया जा रहा था. ऐसे में सालों से घर का मुख्य दरवाजा टूटा पड़ा है. रात में कुत्ता न घर में आ जाये, इसके लिए पर्दा लगा के सोती हूं.रात भर जाग जाग कर देखना पड़ता है. बेटी भी है जो पीजी कर चुकी है. ऐसे में सुरक्षा का ख्याल रखना पड़ता है. उन्होंने कहा कि नौ-दस हजार मानदेय मिलता है.

इस बार फरवरी माह से फिर से रोक दिया गया है. कर्ज पहले से बढ़ गया है ऐसे में जो पैसा मिलेगा वो तो कर्ज में ही चला जायेगा. खेती बारी तो है नहीं कि गुजारा हो जाये. कहा कि रिश्तेदारों और परिवार वालों से मिलना छोड़ दिया है. लेन देन तो लगा रहता है. ऐसे में कैसे संभव है सब कुछ पूरा करना.

राशन कार्ड है खाना तो मिल जाता है, ग्यारह हजार बिजली बिल कैसे भरें?

घर चलाने की बात आते ही उमा की आंखें भर आयी. कहतीं हैं कि पति के नाम से राशन कार्ड है तो चल रहा है. नहीं होता तो कहां से खाना लाते. राशन दुकान तो जाने में खराब लगता है. पति मजदूरी करके लाता है उसी से कुछ जरूरती समान और दवाई आदि का खर्च चल रहा है. इन चार माह में किसी को बीमारी भी हुई तो डाक्टर को नहीं दिखा पाये, फीस कहां से लाते. वहीं बिजली बिल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि एक साल से नहीं भरा है.  अब तो ग्यारह हजार बिजली बिल आ गया है.  नहीं भरेंगे तो घर की बिजली काट दी जायेगी.

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बड़े बेटे की पढ़ाई ग्रेजुएशन के बाद रुक गयी

बच्चों की पढ़ाई लिखाई का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बड़े बेटे की पढ़ाई भी इसी तरह ग्रेजुएशन में रुक गयी. मानदेय मिल नहीं रहा था कैसे पैसा देते. अब किसी तरह छोटे बेटे का ग्रेजुएशन पूरा हुआ तो एमकाम के लिए पैसा नहीं है. वहीं उनके बेटे ने जानकारी दी कि इस बार एमकाम करने की योजना है. मानदेय मिल जाने से पढ़ाई पूरी हो जायेगी.

उमा ने बताया कि एक बेटी है पीजी तो हो गयी है लेकिन घर स्थिति ऐसी नहीं है कि कुछ और कोचिंग करा पाऊं. ऐसे में अब उसे  खुद ट्यूशन पढ़ाने के लिए कह दिया है.  कम से कम कोचिंग समेत अन्य चीजों में दौ़ड़ भाग के लिए भाड़ा खुद जुगाड़ लेगी.

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