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दर्द ए पारा शिक्षक: साढ़े चार बजे सुबह उठ कर लाह, महुआ, करंज और इमली चुनते हैं राजू लकड़ा

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  • लदनापीढ़ी के पारा शिक्षक को महुआ बेचने से मिलते हैं 25-30 रुपये
  • रसोई गैस का इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि भराने के पैसे नहीं
  • मुखिया ने दया कर रद्द नहीं किया राशन कार्ड, नहीं तो अनाज पर भी आ जाती आफत

Chhaya

Ranchi : सुबह चार बजे उठ कर लाह, करंज, इमली और महुआ चुनना. उसके बाद उसे बेचने की जुगत लगाना. तब जाकर बच्चों को पढ़ाना. यह एक पारा शिक्षक की दिनचर्या है. बच्चों को पढ़ाने के एवज में जो मानदेय मिलता है, वह किसी भी तरह पूरा नहीं पड़ता. वह भी पांच माह से नहीं मिल रहा. जिंदगी चलाने के लिए करंज, इमली औऱ महुआ चुन कर उसे बेचना पड़ता है. यह कहानी है नामकुम लदनापीढ़ी के पारा शिक्षक राजू लकड़ा की. गांव के लोग इन्हें मास्टर जी कहते हैं. न्यूज विंग ने अपनी सीरीज के दौरान उनसे बातचीत की, तो उनका दर्द छलक उठा.

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राजू लकड़ा साल 2002 से पारा शिक्षक के रूप में काम कर रहे हैं. अभी ये उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय में पढ़ा रहे हैं. घर से यह स्कूल एक किलोमीटर की दूरी पर है, पैदल जाते हैं क्योंकि कोई और साधन नहीं है. उनकी एक बड़ी बेटी और दो बेटे हैं.

अपने बारे में बताते हुए राजू कहते हैं कि घर की स्थिति बहुत खराब है. लाह, महुआ, करंज और इमली चुन कर प्रतिदिन का खर्च चल रहा है. ये जंगली फल प्रति किलो के हिसाब से बिकते हैं. इन्हें बेचने के लिए बुंडू जाना पड़ता है. उन्होंने कहा कि लाह अभी 180 रुपये प्रति किलो बिक रहा है, वहीं महुआ और इमली के 25 से 30 रुपये मिलते हैं. करंज का तो फिलहाल मौसम नहीं.

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बेटी की पढ़ाई के लिए गिरवी रखी जमीन

उनकी स्थिति इस कदर दयनीय है कि उन्हें अपनी बड़ी बेटी की पढ़ाई के लिए जमीन गिरवी रखी पड़़ी. बातों-बातों में उन्होंने बताया कि डेढ़ एकड़ जमीन उन्होंने मात्र 15,000 रुपये में गिरवी रख दी. अभी तक जमीन छुड़ा नहीं पाये हैं. एक साल के लिए 15,000 रुपये मिले हैं.

उनके गांव के लोग सात हजार ही देने को तैयार थे. इसलिए बगल के गांव में के किसी के पास जमीन गिरवी रखी. यह रकम मिलने के बाद ही बेटी का दसवीं क्लास में रजिस्ट्रेशन हुआ. हालांकि बेटी के स्कूल में 22,000 रुपये बकाया था, स्कूल फीस समेत हॉस्टल फीस लेकर. अभी भी तीन हजार बकाया है. जिसके कारण बेटी को मैट्रिक सर्टिफिकेट नहीं दिया जा रहा है.

इनकी बेटी रिंग रोड स्थित मजेरलो कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ती है. स्कूल आठ किलोमीटर दूर है, सभी बच्चों को हॉस्टल में रखा है. उन्होंने बताया कि दो बेटों के कॉपी-किताब भी अभी तक नहीं खरीद पाये हैं. वहीं स्कूल की छुट्टी होने पर या स्कूल की छुट्टी के बाद ये झाड़ काटने का भी काम करते हैं, जिसमें इन्हें 250 रुपये मिलते हैं. नम आंखों से उन्होंने बताया कि काफी चोट भी लग जाती है झाड़ कटने में.

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तेल नहीं खरीद सकते, महुआ तेल से बनाते हैं खाना

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रसोई गैस होते हुए भी ये हमेशा लकड़ी जला कर ही खाना बनाते हैं. पत्नी है नहीं, ऐसे में घर का सारा कार्यभार इनके ही कंधों पर है. राशन-पानी की बात करते हुए उन्होंने कहा कि राशन कार्ड अभी मुखिया ने रद्द नहीं किया है.

मुखिया अच्छे हैं कहते हैं जब तक पारा शिक्षकों का अनुभव के आधार पर स्थायीकरण नहीं होता तब तक राशन कार्ड रद्द नहीं होगा. इससे थोड़ी राहत है. कम से कम अनाज मिल जा रहा है.

उन्होंने कहा कि तेल नहीं खरीद सकते. महुआ के बीजों को बुंडू में पेरा कर तेल निकालवाते हैं, तब इसे जलाते हैं. उन्होंने कहा कि महुआ के तेल का हर कोई इस्तेमाल नहीं कर सकता, इसे इस्तेमाल करने के तरीके होते हैं.

अपने आंगन में कुछ सब्जियां उगा लेते हैं.  इसके अलावा जंगल में मिलनेवाली सागों को सुखा कर ये अन्य दिनों में काम चलाते हैं. कभी-कभी जंगल से ये मधु भी निकाल लेते हैं, जिसे बच्चे रोटी के साथ खा लेते हैं.

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बिजली बिल पांच हजार बकाया, महिला समिति से सात हजार उधार

राजू लकड़ा को आठ हजार रुपया मानदेय मिलता है. उन्होंने बताया कि जब से बीपीएल कार्ड के तहत बिजली ली है तब से बिजली बिल बकाया है. लगभग तीन महीने से. बीपीएल बिजली कनेक्शन में इन्हें प्रति माह 48 रुपये देने होते हैं. जो ये नहीं दे पा रहे हैं.

उन्होंने बताया कि अपनी मां के इलाज के लिए उन्होंने महिला समिति से सात हजार रुपये कर्ज लिया है. जो अब तक नहीं चुका पाये हैं. गांववाले इनकी परिस्थिति जानते हैं जिस कारण कारण से इनसे पैसे नहीं मांगते. इनकी मां को मधुमेह रोग है. जिसके इलाज में प्रतिमाह पंद्रह सौ रुपये खर्च होते हैं. ऐसे में बहनों और रिश्तेदारों से इन्हें कर्ज लेना पड़ता है.

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सौ-सौ रुपये में खरीदी थी शर्ट-पैंट

उन्होंने कहा कि साल 2016-17  में शिक्षा विभाग की ओर से पारा शिक्षकों को शर्ट-पैंट पहनने का आदेश दिया गया था. मानदेय तो इतना है नहीं कि सही से कपड़ा ले पायें. बीईओ की बैठक हुई जिसमें बताया गया यूनिफॉर्म पहनना ही है. एक हजार रुपये थे मात्र.

रांची के मेन-रोड के फुटपाथ से सौ-सौ रुपये में शर्ट और पैंट खरीदी. किसी तरह बच्चों की जरूरतों का गला घोंट कर यूनिफॉर्म लिया था. गांववालों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि गांव में तो सम्मान है ही नहीं. लोग कहते हैं बीज चुनते हैं, आप कैसे शिक्षक हैं. साल 2002 में जो सम्मान गांव में था अब वो नहीं मिलता. सरकार कब जागेगी पता नहीं.

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