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दर्द ए पारा शिक्षक : आखिर क्यों शिक्षक को हिंदुस्तान यूनिलिवर में साबुन छंटाई का काम करना पड़ रहा है

Chhaya

Ranchi :  किस्मत का खेल ही कहें कि आर्मी के लिए चयनित तो हो गये लेकिन आंखों की बीमारी के कारण बहाली नहीं हो पायी और पारा शिक्षक बन गये. ये कोई किताबी लाईन नहीं है, ये एक पारा शिक्षक की मर्माहत करने वाली सच्ची घटना है. जरिया गांव के रहने वाले मनोज मुंडा का चयन साल 2008 में आर्मी के लिए हुआ था,

लेकिन दूर की चीजें नहीं देख पाने के कारण ये आर्मी ज्वाइन नहीं कर पाये. साल 2009 में इनका चयन पारा शिक्षक के लिए हुआ. और तब से ये पारा शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं. इनके साथ  घर में पिताजी, बुआ और एक छोटा भाई रहता है. सबका खर्च मनोज के सर पर है.

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हां पिताजी थोड़ा बहुत मुर्गी और बकरी पालन करते हैं, लेकिन इससे रोजी रोटी चलने वाली नहीं. ऐसे में मनोज को कभी दैनिक मजदूरी तो कभी नाईट गार्ड की नौकरी कर घर चलाना पड़ रहा है. अपने बारे में बताते हुए मनोज ने कहा कि घर का सारा खर्च मेरे ऊपर है.

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एक दिन भी बैठ जाने से भीख मांगने की नौबत आ जायेगी. पिता जी और बुआ दोनों उम्र दराज हैं, जितना होता है करते हैं,  लेकिन इन पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. बता दें कि मनोज ग्रेजुएट और डीएलएड किये हुए हैं.

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कंपनियों में नाईट गार्ड का काम भी करते थे

रांची टाटा रोड में हिंदुस्तान यूनिलिवर कंपनी है. जहां वर्तमान में मनोज दैनिक मजदूरी कर रहे है.. बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि यहां कंपनी के साबुन, सर्फ समेत अन्य क्लिंसिंग प्रोडक्ट्स आते हैं. जिनकी छंटाई इसी जगह होती है. मनोज भी अन्य मजदूरों के समान इन प्रोडक्ट्स की छंटनी करते है.. बेकार उत्पादों को छांट कर फ्रेश आइटम को ये ट्रकों में लोड भी करते हैं. यहां इन्हें प्रतिदिन के 300 रुपये मिलते हैं.

वर्तमान में मनोज अपग्रेडेड मिडिल स्कूल जामचुआं में कार्यरत है.. मनोज ने बताया कि जब भी लंबी छुट्टी मिलती है वे हिंदुस्तान यूनिलिवर में दिहाड़ी खटते है.. गर्मी छुट्टी के पहले जब स्कूल मार्निंग था,  तो मनोज आस पास स्थित कंपनियों में नाईट गार्ड का काम करते थे. लेकिन स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव पड़ने के कारण उन्होंने ये काम छोड़ दिया.

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बैल की तरह खटते हैं, नहीं खटेंगे तो घर नहीं चलेगा

छोटे भाई का खर्च भी मनोज के उपर है. बताया कि उनके भाई ने सिर्फ आठवीं तक पढ़ाई की है. क्योंकि घर के पास इतने पैसे नहीं है कि भाई पढ़ाई कर सकें. मनोज ने यह बताते हुए कहा कि अगर दिन भर बैल की तरह नहीं खटेंगे तो घर तो चलेगा ही नहीं. गांव में इतना पैसा किसी के पास होता नहीं है कि लोग बार बार कर्ज दें.

अभी तक किसी के पास इस हद तक कर्ज नहीं लिया है कि लोगों से कर्ज के लिए बात सुननी पड़े. अधिक जरूरत होने पर बकरी मुर्गी बेच दिये जाते हैं. वहीं दैनिक मजदूरी है जिससे खर्च चल रहा है. बीमारी की बात करते हुए उन्होंने कहा,  वर्तमान में किसी को कुछ खास बीमारी नहीं है.

हां पिताजी और बुआजी को कभी कुछ हो जाने से गांव के डाक्टर से दिखाया जाता है. राशन कार्ड है नहीं,  क्योंकि गांव के लोग सोचते हैं कि पारा शिक्षकों को मानदेय अधिक है ऐसे में सरकारी सुविधा का लाभ नहीं मिलता. घर में थोड़ा बहुत धान और सब्जियां उगती है,  जो सहारा है. सालों से घर टूटा हुआ है.  बारिश में पानी टपकता है बना ही नहीं पा रहे.

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भाई के इलाज के लिए जमीन रखी गिरवी

साल 2011 में मनोज के छोटे भाई सड़क दुर्घटना में घायल हो गये थे. इसके बारे में बताते हुए कहा कि दुर्घटना गंभीर थी. भाई को ब्लड चढ़ाना था. दस रुपये भी हाथ में नहीं थे, किसी से कर्ज लेने से बेहतर लगा कि जमीन ही गिरवी रख दी जाये.  धान कटाई हो ही गयी थी.

एक एकड़ जमीन दस हजार रु पये के लिए गिरवी रख दी. इस जमीन को मेहनत मजदूरी के बल पर ही छुड़ाया गया. फिर  मुस्कुराहट के साथ उन्होंने कहा कि सरकार मानदेय तो देती नहीं समय पर, ऐसे में काम तो करना ही होगा. नहीं करेंगे तो खायेंगे कहां से.

गांव वाले कहते हैं मजदूरी करता है बच्चों को क्या पढ़ायेगा

गांव में सम्मान की बात करते हुए उन्होंने कहा कि मानदेय सरकार देती नहीं, गांव में घर की स्थिति से लोग वाकिफ है. मजदूरी करते देखते है सभी. सत्र शुरू होने के समय जब गांव वालों को बच्चों को स्कूल भेजने की बात की जाती है तो गांव वाले कहते हैं मजदूरी करता है तो बच्चों को क्या पढ़ायेगा. सरकार भी सिर्फ पढ़ाई का काम नहीं कराती. जनगणना समेत अन्य सर्वे में अधिक समय भी लगता है और मेहनत भी. मानदेय तो इतना है नहीं कि घर चले.  पता नहीं सरकार कब जागेगी.

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