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एक लाख करोड़ के ऑन गोईंग प्रोजेक्ट की रफ्तार धीमी, आपूर्तिकर्ताओं का भुगतान लंबित

अफसरों और ठेकेदारों की भी है लापरवाही, हर महीने 60 करोड़ के बालू, 50 करोड़ के चिप्स और 100 करोड़ के ईंट की होती है सप्लाई

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RAVI ADITYA

Ranchi: राज्य में लगभग एक लाख करोड़ के ऑन गोईंग प्रोजेक्ट की रफ्तार धीमी हो गई है. इसकी वजह मेटेरियल सप्लाई करने वालों का भुगतान पिछले तीन चार माह से लंबित है. सरकारी प्रोजेक्ट में आपूर्तिकर्ताओं द्वारा हर माह लगभग 60 करोड़ के बालू, 50 करोड़ के चिप्स और लगभग 100 करोड़ के ईंट की सप्लाई की जाती है. इसका आधार 4:3:1 (चार कड़ाही बालू. तीन कड़ाही चिप्स और एक कड़ाही सीमेंट) माना गया है. दूसरी वजह यह भी है कि बार-बार प्रोजेक्ट के डिजाइन और डीपीआर में बदलाव होने के कारण प्रोजेक्ट कॉस्ट बढ़ जाता है. ठेकेदार को समय पर पैसा नहीं मिलने के कारण आपूर्तिकर्ताओं का भी भुगतान लंबित हो जाता है. प्रदेश में आपूर्तिकर्ताओं का लगभग 1000 करोड़ रुपये से भी अधिक का भुगतान लंबित है.

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अफसरों और ठेकेदारों की मिलीभगत भी है कारण

विभिन्न प्रोजेक्ट्स में काम कर रहे ठेकेदारों और अफसरों की मिलीभगत के कारण आपूर्तिकर्ताओं का भुगतान लंबित हो जाता है. पैसा मिलने के बावजूद ठेकेदार दूसरे प्रोजेक्ट में पैसा लगा देते हैं. वहीं जो बड़े ठेकेदार पहुंचवाले हैं, वे अफसरों की मिली भगत से एडवांस ले लेते हैं. नियमत: पहले एडवांस का उपयोगिता प्रमाण पत्र देने के बाद ही दूसरा एडवांस मिलता है. लेकिन एक ही काम में एक से ज्यादा एडवांस पहुंचवाले ठेकेदारों को मिल रहा है. राशि का कोई हिसाब-किताब नहीं है. इस कारण बजट प्रावधान से भी पार कर जाता है.

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एसी-डीसी बिल की बाध्यता खत्म होना भी है एक कारण

एसी-डीसी बिल की बाध्यता खत्म होने का असर भी आपूर्तिकर्ताओं पर पड़ रहा है. अब अफसर उपयोगिता प्रमाण पत्र में सिर्फ लिख कर दे देते हैं कि राशि का उपयोग हो गया है. लेकिन इसका कोई सत्यापन नहीं हो पा रहा है. सरकार को जहां से राजस्व मिलता है, वहां से वसूली भी कम हो रही है. जीएसटी लागू होने के बाद भी नुकसान हो रहा है. इससे पहले ठेकेदारों को जो पेमेंट होता था, उसमें टैक्स काट लिया जाता था. जब से जीएसटी लागू हुई है, तब से बिना टैक्स के पेमेंट हो रहा है. इस कारण टैक्स नहीं आ पा रहा है.

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पथ विभाग में चल रहा है 5000 करोड़ का प्रोजेक्ट

पथ विभाग में फिलहाल 5000 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट 26 डिवीजन में चल रहा है. ठेकेदार को हर माह 250 से 300 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा रहा है. विभाग के अनुसार आपूर्तिकर्ताओं के भुगतान लंबित होने के जिम्मेवार ठेकेदार ही हैं. विभाग का कहना है कि समय पर ठेकेदारों का भुगतान कर दिया जाता है, लेकिन ठेकेदार उस पैसे को किसी और प्रोजेक्ट में लगा देते हैं. इस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. इसके लिए पूरी तरह से ठेकेदार ही जिम्मेवार हैं.

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उदाहरण एक: यहां भी है भुगतान लंबित

रांची में पहले चरण में सीवरेज-ड्रेनेज के लिए 360 करोड़ का कार्यादेश कानपुर की कंपनी ज्योति बिल्डटेक को मिला था. कंपनी को रांची नगर निगम की तरफ से इस काम के लिए 54 करोड़ रुपये का अग्रिम और चार करोड़ के बिल भुगतान भी किया गया. 18 महीने के अंदर न तो प्रोजेक्ट पूरा हुआ और न ही काम आगे बढ़ा. अब कंपनी कह रही है कि प्रोजेक्ट कॉस्ट 8 फीसदी और बढ़ाया जाये, साथ ही मियाद भी बढ़ाई जाये. इसी तरह एक दर्जन से भी अधिक प्रोजेक्ट्स का कॉस्ट बढ़ गया है. इस कारण भी आपूर्तिकर्ताओं का भुगतान लंबित है.

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कर्ज में है झारखंड

  • लोक ऋण – 3760.56 करोड़
  • कर्ज व उधार- 1543 करोड़
  • पूंजीगत खर्च- 12305.59 करोड़
  • राजस्व खर्च- 62744.44 करोड़

किस विभाग में कुल कितने का प्रोजेक्ट

  • कृषि- 26500 करोड़
  • भवन- 57100 करोड़
  • ऊर्जा- 340000 करोड़
  • वन एवं पर्यावरण- 41000 करोड़
  • स्वास्थ्य- 260000 करोड़
  • उद्योग व खान- 42500 करोड़
  • पथ- 400000 करोड़
  • ग्रामीण विकास- 650000 करोड़

क्या कहते हैं झारखंड बालू ट्रक एसोसिएशन के महासचिव

बालू ट्रक एसोसिएशन के महासचिव मोईज अख्तर के अनुसार ठेकेदारों को समय पर बिल का भुगतान तो हो जाता है, लेकिन ठेकेदारों द्वारा दूसरे प्रोजेक्ट में पैसा लगा देने के कारण आपूर्तिकर्ताओं को समय पर भुगतान नहीं हो पाता है. इसके लिए भी सरकार को नियम बनाना चाहिए कि आपूर्तिकर्ताओं को समय पर भुगतान हो सके.

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