
Amit Jha
Ranchi मनरेगा के सहारे दो जून की रोटी हासिल करने की आस लोग गांवों में मजदूरी करते हैं. 100 दिनों का रोजगार उन्हें राहत भी दिलाता है. लेकिन अभी हालत ऐसे हैं कि राज्य में बड़ी संख्या में मनरेगा मजदूरों को उनकी मजदूरी नसीब नहीं हो पा रही है. वे लंबे समय से अपनी गाढ़ी कमाई हासिल करने के लिए भटक रहे हैं.
कहा जा रहा है कि जॉब कार्ड में नाम, बैंक खाता संख्या और आधार नंबर की सही इंट्री नहीं होने के कारण उन्हें अपने हक से वंचित रहना पड़ा है. गलत एकाउंट नंबर और आधार नंबर की इंट्री किए जाने के कारण पूरे राज्य में 2,79,995 ट्रांजैक्शन फेल हुए हैं. इससे मजदूरों को करीब 32 करोड़, 10 लाख 13 हजार, 103 रुपये का भुगतान नहीं हो पाया है.
चार साल से फंसा है मामला
मनरेगा में रिजेक्ट ट्रांजैक्शन का मामला झारखंड के सभी जिलों में है. सभी चौबीसों जिलों में बड़ी राशि मजदूरों तक नहीं पहुंच सकी है. बेचारे मजदूर कई बार अपने बैंक खाते को अपडेट कराने को रोजगार सेवक और प्रखंड के पदाधिकारियों का चक्कर काटते फिर रहे हैं. अब तो ऐसे कई मजदूरों ने मजदूरी का भुगतान हो पाने की आस ही छोड़ दी है. उन्हें जानकारी भी नहीं मिल पा रही है कि आखिर उनके साथ ऐसा क्यों हुआ है. उनके पसीने की कमाई सरकार बैंक और लचर व्यवस्था के बीच फंसकर रह गई है. वर्ष 2016- 2017, 2017- 18, 2018-19, 2019-20, 2020-2021 की योजनाओं में भी काम करने वाले मजदूर के पैसे रिजेक्टेड ट्रांजैक्शन की वजह से अटके हुए हैं.
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स्पेशल कमेटी करे जांच
सामाजिक कार्यकर्ता बलराम कहते हैं कि मनरेगा में पुरानी योजनाएं जारी हैं या बंद हो गयी हैं, इसे देखे जाने की जरूरत है. ज्यादा समय हो जाने पर किये गये काम के लिये मजदूरी भुगतान एक चैलेंज हो जाता है. ऐसे में जिला से लेकर राज्य स्तर तक देखा जाना चाहिये कि काम के बाद कैसे सहजता से भुगतान संभव है. प्रशासनिक सुविधा के नाम पर जो भी प्रावधान या व्यवस्था अधिकारी करें, अंततः इसका खामियाजा श्रमिकों को भुगतना पड़ता है. राज्य में अगर मनरेगा प्रोग्राम में काम के बाद भुगतान का मामला फंसा है तो इसके लिये विशेष ऑडिट होना चाहिये. सरकार को विशेष टीम बनाकर इस मामले की जांच करानी चाहिये.
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बैंक मर्जर होने से कठिनाईः आयुक्त
मनरेगा कमिश्नर सिद्दार्थ त्रिपाठी के मुताबिक राज्य में ग्रामीण बैंक और वनांचल बैंक का मर्जर होने से ग्रामीण क्षेत्रों में समस्य़ा खड़ी हुई है. कई श्रमिकों, मजदूरों का खाता इन्हीं बैंकों में था. इसके कारण नया आइएफसीएस कोड जेनरेट करने की समस्या भी सामने आयी. इन कामों में 6 महीने का समय लग गया.
बैंक एकाउंट का आधार लिंक से जुड़े होने पर ही भुगतान का प्रावधान केंद्र का रहा है. इससे भी कहीं कहीं जटिलता पैदा हुई है. 2018-19, 2019-20 और 2020-21 में मजदूरी भुगतान समस्या ज्यादा दिखी है. हालांकि यह भी एक बात है कि एक ही श्रमिक का भुगतान 2-3 बार रिजेक्ट हुआ है. फिलहाल मनरेगा टीम श्रमिक के आधार, बैंक खाता संख्या का फोटो लेकर भुगतान की प्रक्रिया को सरल बनाने में मदद करने में लगी है. तकनीकी पेंच के कारण मजदूरों को मजदूरी के लिये परेशानियां आयी हैं पर विभाग लगातार उनकी मदद के लिये पहल कर रहा है. एसएलबीसी के साथ मिलकर भी प्रयास किया जा रहा है.
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मनरेगा से जुड़े हैं लाखों परिवार
कोरोना काल में सीएम हेमंत सोरेन ने मनरेगा को अधिक से अधिक प्रोत्साहित करने पर जोर दिया. प्रवासी श्रमिकों के लिये तीन -तीन स्पेशल स्कीम को इसमें जोड़ा गया. राज्य में फिलहाल 60,44,184 परिवार मनरेगा से जुड़कर लाभ उठा रहे हैं. मनरेगा के तहत अभी झारखंड में कई तरह की योजनाएं चल रही हैं. इनमें डोभा, सिंचाई कूप, पशु शेड तथा प्रधानमंत्री आवास योजना जैसे काम प्रमुख हैं. इन्हीं महत्वपूर्ण योजनाओं के जरिए दीदी बाड़ी योजना, बिरसा हरित ग्राम योजना, वीर शहीद पोटो हो खेल विकास योजना तथा नीलांबर-पीतांबर जल समृद्धि योजनाएं क्रियान्वित की जा रही हैं. मानव दिवस का सृजन किया जा रहा है.
वित्तीय वर्ष रिजेक्टेड ट्रांजेक्शन राशि
2016-17 99913 11,48,73,401
2017-18 389990 4,27,16,243
2018-19 34700 3,94,64,047
2019-20 46309 5,25,46,432
2020-21 60083 7,14,12,980
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