
Naveen Sharma
प्राचीन भारत का विश्व सभ्यता को काफी योगदान रहा है लेकिन दुर्भाग्य से आधुनिक भारत का योगदान काफी कम रहा है.खासकर साइंस और गणित में यह कमी एकदम साफ नजर आती है.
इस कमी को पूरा करने में जिन चंद लोगों ने अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है उनमें गणितज्ञ श्रीनिवासन रामानुजन प्रमुख हैं.रामानुजन के जन्मादिन को राष्रीी य गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है.
रामानुजन की गणित के प्रति दिवानगी इस कदर थी कि वे अन्य विषयों पर ध्यान नहीं देते थे. इस कारण गणित में तो वे पूरे के पूरे नम्बर ले आते थे लेकिन अन्य विषय में वे फेल हो जाते थे.इस वजह से उनका रिजल्ट अच्छा नहीं होता था.
ऐसे में उन्हें अपने घर पर बैठना पड़ा.उनके माता पिता ही उन्हें पागल कहने लगे, उपेक्षित करने लगे व कमेंटस तथा नुक्ताचीनी करने लगे.रामानुजन हमेशा संख्याओं से खिलवाड़ करते रहते थे.

इसे भी पढ़ें : रांची में स्वर्ण रेखा नदी के समीप से अज्ञात का शव बरामद, शिनाख्त नहीं
प्राइमरी एग्जालम में पूरे जिले में टॉप किया
इसके बाद 10 साल की उम्र में उन्होंरने प्राइमरी एग्जााम में पूरे जिले में टॉप किया था.15 साल की उम्र में वो ‘ए सिनॉपसिस ऑफ एलिमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योार एंड एप्लाूइट मैथमेटिक्सथ’ नाम की बेहद पुरानी किताब को पूरी तरह घोट कर पी गए थे. इस किताब में हजारों थियोरम थे.
अन्य विषयों को नजरंदाज करने के कारण
उन्हेंं पहले गवर्मेंट कॉलेज और बाद में यूनिवर्सिटी ऑफ मद्रास की स्कॉंलरशिप गंवानी पड़ी. इन सबके बावजूद मैथ्से के प्रति उनका लगाव ज़रा भी कम नहीं हुआ. 1911 में इंडियन मैथमेटिकल सोसाइट के जर्नल में उनका 17 पन्नों.
का एक पेपर पब्लिदश हुआ जो बर्नूली नंबरों पर आधारित था. 1912 में रामानुजन मद्रास पोर्ट ट्रस्टो में क्ल र्क की नौकरी जरूर करने लगे थे लेकिन तब तक उनकी पहचान एक मेधावी गणितज्ञ के रूप में होने लगी थी.
देर से बोलना शुरू किया तो परिजनों की चिंता हुई कहीं गूंगा तो नहीं है
रामानुजन का जन्मू 22 दिसंबर 1887 को कोयंबटूर के ईरोड गांव के ब्राह्मण परिवार में हुआ था.उनकी मां का नाम कोमलताम्मोल और पिता श्रीनिवास अय्यंगर थे.उनके जन्मक के बाद पूरा परिवार कुंबाकोनम जाकर बस गया, जहां पिता श्रीनिवास कपड़े की दुकान में काम करने लगे.
आमतौर पर बच्चे एक साल के बाद कुछ -कुछ बोलना शुरू कर देते हैं पर रामानुजन ने तीन साल की उम्र तक बोलना भी शुरू नहीं किया था.माता पिता को चिंता भी हुई कि कहीं उनका बच्चा गूंगा तो नहीं है.स्कू ल में एडमिशन हुआ तो पढ़ाने का घिसा-पिटा अंदाज उन्हें बिलकुल भी नहीं भाया.
इसे भी पढ़ें : प्रोफेशनल एथलीट की तरह ट्रैक पर फर्राटा भरती नजर आयीं बॉलीवुड एक्ट्रेस तापसी पन्नू
कई तरह के अटपटे लगनेवाले प्रश्न भी पूछते थे
10 साल की उम्र में ही रामानुजन को गणित के प्रति विशेष लगाव शुरू हो गया था.रामानुजन को प्रश्न पूछना बहुत पसंद था.उनके प्रश्न अध्यापकों को कभी-कभी बहुत अटपटे लगते थे.जैसे कि- संसार में पहला पुरुष कौन था? पृथ्वी और बादलों के बीच की दूरी कितनी होती है?
जब वे तीसरे फार्म में थे तो एक दिन गणित के अध्यापक ने पढ़ाते हुए कहा, ‘‘यदि तीन केले तीन व्यक्तियों को बांटे जायें तो प्रत्येक को एक केला मिलेगा.यदि 1000 केले 1000 व्यक्तियों में बाँटे जायें तो भी प्रत्येक को एक ही केला मिलेगा.
इस तरह सिद्ध होता है कि किसी भी संख्या को उसी संख्या से भाग दिया जाये तो परिणाम ‘एक’ मिलेगा.रामानुजन ने खड़े होकर पूछा, ‘‘शून्य को शून्य से भाग दिया जाये तो भी क्या परिणाम एक ही मिलेगा?’’
इसे भी पढ़ें : जमीनी विवाद में लाल हो रही है रांची की धरती
केवल 32 साल के छोटे से जीवनकाल में किया मिरेकल
गणित के क्षेत्र में अपने समय के अनेक दिग्गजों को पीछे छोड़ने वाले श्रीनिवास रामानुजन ने केवल 32 साल के जीवनकाल में पूरी दुनिया को गणित के अनेक सूत्र और सिद्धांत दिए.गणित के क्षेत्र में रामानुजन किसी भी प्रकार से गौस, यूलर और आर्किमिडीज से कम न थे. रामानुजन ने उच्च गणित के क्षेत्र में ऐसी विलक्षण खोजें कीं कि इस क्षेत्र में उनका नाम अमर हो गया.
शुरू में गणित संबंधी कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला
इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए.इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया.
इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं.इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है, यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित मुख्यधारा में अब तक नहीं अपनाया गया है.
उनके सूत्र कई वैज्ञानिक खोजों में मददगार बने.हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है.इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है।
इसे भी पढ़ें : खेलगांव हत्याकांडः आरोपी रिटायर्ड फौजी गिरफ्तार, लाइसेंसी पिस्टल और राइफल जब्त
गणितज्ञ जीएच हार्डी ने पहचानी प्रतिभा, आगे बढ़ाया
रामानुजन उस समय के विश्वह प्रसिद्ध ब्रिटिश गणितज्ञ जीएच हार्डी के काम के बारे में जानने लगे थे.1913 में रामानुजन ने अपने कुछ काम पत्र के जरिए हार्डी के पास भेजे.शुरुआत में हार्डी ने उनके खतों को मजाक के तौर पर लिया, लेकिन जल्दम ही उन्होंरने उनकी प्रतिभा का अंदाजा लगा लिया.
फिर क्याम था हार्डी ने रामानुजन को पहले मद्रास यूनिवर्सिटी में एडमिशन दिलाय.इसके बाद कैंब्रिज में स्कॉमलरशिप दिलाने में मदद की. हार्डी ने रामानुजन को अपने पास कैंब्रिज बुला लिया. हार्डी के सानिध्यॉ में रामानुजन ने खुद के 20 रिसर्च पेपर पब्लिाश किए.
1916 में रामानुजन को कैंब्रिज से बैचलर ऑफ साइंस की डिग्री मिली और 1918 में वो रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन के सदस्यक बन गए.
रॉयल सोसाइटी के इतिहास में सबसे कम उम्र के सदस्य
भारत उस अंग्रेजों गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था. ऐसे समय में किसी भारतीय को रॉयल सोसाइटी की सदस्यअता मिलना बहुत बड़ी बात थी.रॉयल सोसाइटी के पूरे इतिहास में रामानुजन से कम आयु का कोई सदस्य आज तक नहीं हुआ है. रॉयल सोसाइटी की सदस्यता के बाद वे ट्रिनीटी कॉलेज की फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय भी बने.
इसे भी पढ़ें : मुंबई में नाइट क्लब में पुलिस का छापा, सुरेश रैना, सुजैन खान, गुरु रंधावा पर केस
टीबी के कारण कम उम्र में निधन
रामानुजन कड़ी मेहनत कर रहे थे. ब्रिटेन का ठंड और नमी वाला मौसम उन्हें सूट नहीं कर रहा था. 1917 में उन्हें टीबी भी हो गया. स्वालस्य् क में थोड़े-बहुत सुधार के बाद 1919 में उनकी हालत बहुत ज्यानदा खराब हो गई और वो भारत लौट आए.
26 अप्रैल 1920 को 32 साल की बेहद कम उम्र में उनका देहांत हो गया. बीमारी की हालत में भी उन्हों ने मैथ्स् से अपना नाता नहीं तोड़ा. बेड पर लेटे-लेटे वो थियोरम लिखते रहते थे. पूछने पर कहते थे कि थियोरम सपने में आए थे.
रामानुजन के बनाए हुए ढेरों ऐसे थियोरम हैं जो आज भी किसी पहेली से कम नहीं हैं. उनका एक पुराना रजिस्टार 1976 में ट्रिनीटी कॉलेज की लाइब्रेरी से मिला था, जिसमें थियोरम और कई फॉर्मूले थे. इस रजिस्टकर के थियोरम की गुत्थीी आज तक नहीं सुलझ पाई है. इस रजिस्टकर को रामानुजन की नोट बुक के नाम से जाना जाता है.
रामानुजन को ईश्वर में अपार विश्वास था. जब उनसे गणित के फॉर्मूले की उत्पएत्ति के बारे में पूछा जाता था तो वो कहते थे कि ईष्ट देवी नामगिरी देवी की कृपा से उन्हें यह फॉर्मूला सूझा. वे कहते थे, ‘मेरे लिए गणित के उस सूत्र का कोई मतलब नहीं जिससे मुझे आध्यारत्मिाक विचार न मिलते हों.’
रामानुजन की बायोग्राफी ‘द मैन हू न्यूे इंफिनिटी’ 1991 में पब्लिाश हुई थी. इसी नाम से रामानुजन पर एक फिल्म भी बन चुकी है. इस फिल्मं में एक्टिर देव पटेल ने रामानुजन का किरदार निभाया है.
इसे भी पढ़ें : PM मोदी बोले-अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में नजर आता है मिनी इंडिया




