
Ranchi: बिहार में सत्ता से दूर रह जाने का असर सिर्फ कांग्रेस पर ही नहीं पड़ा है, बल्कि महागठबंधन के अगुआ राजद में भी हलचल है. इस बात के साफ़ संकेत मिल रहे हैं कि राजद में बहुत जल्द बड़ा फेरबदल हो सकता है.
अपने पिता लालू यादव से शनिवार को मिलकर पटना लौटने के बाद तेजस्वी यादव ने सोमवार को राजद की समीक्षा बैठक बुलाई और पार्टी में बड़े बदलाव के संकेत दिए. बैठक में तेजस्वी के तेवर बदले-बदले से नजर आ रहे थे.
जिस तरह से उन्होंने बैठक में साफ़ शब्दों में कहा कि नकारा नेताओं पर गाज गिरेगी वह इस बात की ताकीद कर रहा था कि लालू यादव ने तेजस्वी को हर बड़ा फैसला लेने के लिए अधिकृत कर दिया है. राजद की विरासत पूरी तरह से तेजस्वी यादव के हाथों में जा सकती है.
बिहार विधानसभा चुनाव में अपने बूते 76 सीट जीतकर तेजस्वी यादव एक सफल नेता का टैग ले चुके हैं. लालू यादव की अनुपस्थिति में तेजस्वी ने पार्टी को न सिर्फ सम्हालकर रखा बल्कि बिहार चुनाव में पार्टी की साख भी नहीं गिरने दी.
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अब बदले जमाने का राजद
हलांकि बिहार चुनाव से पहले ही तेजस्वी यादव ने ताबड़तोड़ कई बड़े फैसले लेकर यह जता दिया था कि लालू यादव के बाद पार्टी की कमान उसी के हाथों में रहेगी.
सीतामढ़ी के पूर्व सांसद सीताराम यादव समेत कई बड़े नेताओं को छह वर्ष के लिए पार्टी से निकालकर तेजस्वी यादव ने संकेत दे दिया था कि राजद अब बदले जमाने की पार्टी है, जिसमें बागियों और भितरघातियों के लिए कोई जगह नहीं है.
राजद में पहली बार चुनाव में प्रत्याशियों की हार के लिए जिम्मेदारी तय की जा रही है और आरोप सत्यापित हो जाने पर कार्रवाई भी हो रही है. सोमवार की बैठक में तेजस्वी ने यह भी साफ कर दिया कि पार्टी संगठन में जो जिम्मेवारी निभाएगा वह चुनाव नहीं लडेगा.
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राजद में चलेगा अनुशासन का डंडा
लालू प्रसाद के साथ राजनीति करने वाले नेताओं को अच्छी तरह याद है कि तब कहीं किसी प्रत्याशी को हराने के लिए कोई काम करता था तो चुनाव बाद आलाकमान द्वारा बुलाकर उसे समझा-बुझा दिया जाता था.
राजद प्रमुख अपने अंदाज में डांट देते थे और फिर वह उसी तरह राजद का हो जाता था, जैसे चुनाव के पहले होता था. इसके लिए उदाहरण दिया जाता है कि पूर्व सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव के तीखे बयानों पर भी राजद ने कभी कार्रवाई नहीं की, जबकि 2014 में राजद के टिकट पर सांसद बनने के साथ ही पप्पू यादव ने लालू की सियासी विरासत पर अधिकार जताना शुरू कर दिया था.
आगे बढ़कर तेजस्वी का विरोध करने लगे थे. फिर भी लालू ने उन्हें राजद से निकालना जरूरी नहीं समझा, मगर तेजस्वी यादव ने अनुशासन का डंडा भी चलाना शुरू कर दिया है जिसका संकेत उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले ही दे दिया था, जब पार्टी लाइन से अलग चल रहे कई विधायकों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था.
जो छोड़कर चले गए थे, उनकी तो कोई बात नहीं, परंतु जो पार्टी में रहकर भी विरोध का झंडा बुलंद कर रहे थे, उन्हें कार्रवाई के दायरे में लाया गया. तत्कालीन विधायक महेश्वर यादव, प्रेमा चौधरी, अशोक सिंह, संजय सिंह और फराज फातमी को निष्कासित कर दिया गया.
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