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रिम्स में हर रस्म के लगते हैं पैसे…शेविंग के 150, लाश पहुंचाने के 300 और भी बहुत कुछ

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Kumar Gaurav

Ranchi : राजेन्द्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस रिम्स रांची. राज्य का सबसे बड़ा अस्पताल है. राज्य के सभी 24 जिलों के लोगों के अनेकों रोग का सबसे भरोसेमंद उपचार केंद्र. हर दिन सैंकड़ों की संख्या में मरीजों का आना-जाना लगा रहता है. रिम्स में मौजूद धरती के भगवान हर दिन कई लोगों को मौत के मुंह से बाहर लाकर नई जिंदगी देते हैं.

हर सिक्के के दो पहलू की तरह रिम्स का भी एक दूसरा अध्याय है. रिम्स के इमरजेंसी गेट से अंदर आने से लेकर स्वस्थ होकर बाहर आने की बात हो. या फिर मरीज की मौत के बाद उपचार केंद्र लेकर जाने की बात हो.

इन सभी के लिए विभिन्न प्रक्रिया के दौरान रिम्स में अवैध तरीके से मरीज और उसके परिजनों से पैसों की वसूली होती है. जिसे हम कह सकते हैं कि रिम्स में ठीक होने तक के विभिन्न रस्मों में पैसे लगते हैं. ये सभी पैसे मरीजों की मजबूरी का लाभ लेकर वसूले जाते हैं. इलाज करा रहे लोगों से बात करने पर पता चला कि झाड़ू करने वाले और दवा देने वालों को छोड़कर अधिकतर मामलों में पैसा देना होता है.

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सबसे पहले वसूलते हैं ट्रॉलीमैन

रिम्स के इमरजेंसी गेट से अंदर आने में अगर आपको ट्रॉली या व्हील चेयर की जरुरत पड़ी तो आपको ट्रॉली मैन को पैसे देने ही होंगे. ये ट्रॉलीमैन सिर्फ दस रुपये लेकर मानने वाले भी नहीं हैं. रिम्स में चतरा से आये एक मरीज के परिजन का कहना है कि दस रुपये देने पर कहते हैं कि हमने सारा काम छोड़कर आपको बाहर से यहां तक पहुंचाया तो क्या इसके सिर्फ दस रुपये ही लेंगे. मरीज को अस्पताल से बाहर लाने के लिए भी ट्रॉली मैन को पैसे देने होते हैं. इससे पहले आपको ट्रॉलीमैन के पास रिक्वेस्ट भी करने होंगे कि हमें तय स्थान तक पहुंचा दें.

रिम्स में मौजूद नाई का चार्ज 150 रुपये

शहर में मौजूद कई एयर कंडीशनर युक्त मेंस पार्लर में बाल और दाढ़ी बनाने के एवज में 100 रुपये देने होते हैं. जबकि बिना एयर कंडीशनर वाले पार्लर में तो पूरा मामला 50 में सेट हो जाता है. लेकिन रिम्स में मौजूद नाई एक बार बाल कायने और शेविंग करने के 150 रुपये लेता है.

इस नाई का रेट फिक्स है. कोई मिन्नत भी यहां काम नहीं आती. लोगों के सिर या शरीर को अन्य अंग, जिसका ऑपरेशन से पहले शेविंग कराना जरूरी हो तो उसके लिए 150 रूपये फिक्स रेट है. न्यूरो विभाग में तो एक-एक मरीज को ऑपरेशन टलने की स्थिती में उसी नाई को बार-बार 150 रुपये देने होते हैं. वार्ड में मौजूद लोगों का कहना है कि ये नाई दरोगा से भी ज्यादा कमाता है.

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आयुष्मान सर्वेयर इंप्लांट की जरुरत के हिसाब से वसूलते हैं पैसे

रिम्स के हर विभाग में आयुष्मान सर्वेयर मौजूद हैं. इन सर्वेयर का काम ऑपरपेशन में लगने वाले इंप्लांट को मंगवाना है. डॉक्टर के लिखने के अनुसार ही इंप्लांट के लिए टेंडर के माध्यम से उसे मंगाना पड़ता है.

ये सामान नहीं आने तक मरीजों को कई दिनों तक इंतजार करना होता है. बिना इंप्लांट के ऑपरेशन संभव नहीं होता. इसी का फायदा उठाकर जल्द इंप्लांट मंगवा देने के नाम पर सर्वेयर मरीज और उनके परिजनों से पैसा वसूलते हैं.

खून की एक यूनिट के लिए 2200-3000 है रेट

रिम्स में इलाज कराने मरीज काफी दूर से भी आते हैं. ऑपरेशन के लिए अधिकतर मरीजों को खून की जरुरत पड़ती ही है. हालांकि जिनके पास डोनर हैं, उनके लिए कोई दिक्कत नहीं. लेकिन जिनके पास नहीं हैं या फिर अधिक यूनिट खून की जरुरत है तो मरीज के परिजन परेशान हो जाते हैं.

राज्य के सभी अस्पतालों को ये निर्देश है कि खून की व्यवस्था खुद अस्पताल को ही करनी है. जिसका पालन नहीं किया जा रहा. इसी का लाभ मौजूद दलाल उठाते हैं और रिम्स के ही ब्लड बैंक से आसानी से खून मुहैया करा देते हैं.

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लाश को पोस्टमार्टम रुम तक पहुंचान का चार्ज है 200-300 रूपये

रिम्स में मरीज की मौत के बाद लाश को पोस्टमार्टम रुम तक ले जाने का चार्ज 200-300 रुपये है. रिम्स में दो लोग ही हैं, जो लाश को पोस्टमार्टम रुम तक ले जाते हैं. दो लोग एक साथ होते हैं इसलिए ये 200-300 रुपये लेते हैं. साथ ही वहीं पोस्टमार्टम के बाद पैकिंग के लिए लगने वाले सामान का रेट 350 रुपया निर्धारित है.

जल्द ऑपरेशन कराने के नाम पर भी होती है पैसों की वसूली

रिम्स में कई ऐसे मरीज आते हैं, जिन्हें तत्काल में ऑपरेशन की जरुरत होती है. रिम्स में लंबे समय से इलाज करा रहे मरीज के परिजनों ने बताया कि, इमरजेंसी से वार्ड तक मरीज को लाने में ट्रॉलीमैन भांप लेते हैं कि ये लोग पैसे दे सकते हैं या नहीं.

इसके बाद वे ओटी अटेंडेंट और जूनियर डॉक्टरों से मिलकर पैसों का डील कर लेते हैं. पैसे देने वाले मरीज का जल्दी से ऑपरेशन भी हो जाता है. इसके अलावा रिम्स में आनेवाले परिजनों का कहना है कि जान बचाने के लिए दस-बीस हजार दे देने में ही हमने भलाई समझी. रिम्स में ज्यादातर समय मरीजों के साथ ऐसा ही होता है. कदम-कदम पर पैसे देने होते हैं, अगर देने की हालत नहीं तो मरीज को जान से हाथ धोना पड़ता है. ये बातें कई मरीजों को परिजनों का कहना है.

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