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पंचायतों में वित्तीय गड़बड़ियों में फंसते रहे मुखिया, बचते रहे अफसर

  • 5 सालों में नपे 150 मुखिया, अफसरों पर नहीं आयी आंच

Amit Jha

Ranchi : राज्य में पंचायतों का दूसरा टर्म समाप्त होने को है. दिसंबर 2020 तक गांव की सरकार का कार्यकाल पूरा हो जायेगा. यह दिलचस्प रहा है कि साल 2015 से 2020 के दौरान 150 से अधिक मुखिया की वित्तीय शक्तियों को जब्त किया गया या उन्हें निलंबित किया गया.

हालांकि इनमें से आधे से अधिक को उनकी शक्तियां फिर से मिल भी गयी हैं. इसी अवधि में डीसी, बीडीओ से लेकर पंचायत सचिव के मामले में ऐसी शिकायतें नगण्य ही रहीं. वह भी तब जब एक ही तरह के काम के लिए पंचायतों को तुरंत दोषी माना गया जबकि सरकारी पदाधिकारियों के खिलाफ जांच के नाम पर प्रक्रिया चल रही है.

14वें वित्त से बढ़ी परेशानी

राज्य की 4300 से अधिक पंचायतों को 2015-16 से 14वें वित्त का पैसा आवंटित होना शुरू हुआ. इससे पहले (2010-2015) 13वें वित्त का कुछ पैसा पंचायतों तक पहुंच सका था. 14वें वित्त के पैसे के साथ-साथ कई तरह की चुनौतियां भी खड़ी होती गयीं. मुखिया पर आरोप लगे कि ग्राम पंचायत की कार्यकारिणी की बैठक बिना सूचना के वे आयोजित करते हैं.

इसके अलावा बिना तकनीकी जांच के एलइडी लाइट का भुगतान करते हैं. चापाकल के भौतिकी जांच में उनके खिलाफ गड़बड़ियां पायी जाने लगीं. सोलर लाइट, सोलर वाटर औऱ ऐसे ही अन्य सामानों की खरीद में पंचायतों को दोषी समझा जाने लगा.

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रघुवर सरकार में लगने लगा था आरोप

पूर्व सीएम रघुवर दास के समय अलग-अलग पंचायतों से लगातार मुखियाओं के वित्तीय अधिकार जब्त किये जाने की खबरें आ रही थीं. झारखंड पंचायत राज अधिनियम 2001 की धारा 64 के तहत कई मुखियाओं को निलंबित भी किया गया था.

यही वजह थी कि वे कई बार कार्यक्रमों में कहते थे कि सभी मुखिया चोर हैं. इसे लेकर पंचायत प्रतिनिधियों में गुस्सा भी रहता था. हालांकि उन्होंने बाद में कई मुखियाओं को उनका अधिकार वापस दिलाने में भी पहल की थी.

जिस मुखिया के विरुद्ध कोई बड़ी वित्तीय अनियमितता का मामला था या कोर्ट में केस था, उसे छोड़ कर बाकियों के मामले में पहल भी की थी.

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मुखिया सबसे आसान चाराः मुखिया संघ

झारखंड राज्य मुखिया संघ के महासचिव और सीएम स्मार्ट ग्राम बुंडू, बोकारो के मुखिया अजय सिंह के अनुसार जिन स्कीमों, कार्यों के लिए पंचायत को बिना समय दिये दोषी साबित कर दिया जाता है, वैसा प्रखंड स्तर पर नहीं होता.

उदाहरण कि चंदनक्यारी की एक पंचायत ने जिस रेट पर सोलर लाइट की खरीदारी 2 साल पहले की, उसके लिए उसके मुखिया को बर्खास्त तक कर दिया गया. पर इसी काम के लिए प्रखंड स्तर पर की गयी खरीद के लिए पंचायत समिति प्रमुख औऱ बीडीओ के खिलाफ 2 सालों से जांच ही चल रही है. अब भी कई मुखिया मामूली गलती पर या बिना गलती के भी निलंबित हैं.

गलत जांच रिपोर्ट का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है. पंचायती राज विभाग को उनके लिए गंभीरता दिखाने की जरूरत है. वास्तव में ब्यूरोक्रेट्स की ओर से पंचायतों पर नाजायज दबाव दिया जाता रहा है. कुछ मुखिया को टारगेट कर पंचायत प्रतिनिधियों में डर फैलाया जाता है.

नियमों के अनुसार पंचायत प्रतिनिधियों को पदच्यूत किये जाने का प्रावधान है, निलंबित करने का नहीं. मुखिया की वित्तीय शक्ति को सीज किये जाने या उसके मामले में एक्शन लेने में कभी पंचायती राज विभाग सामने आ जाता है तो कभी जिला प्रशासन.

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फंड फंक्शन औऱ फंक्शनरीज में स्वायत्ता की जरूरत

पंचायती राज विशेषज्ञ बलराम के अनुसार अब भी पंचायतों को फंड फंक्शन औऱ फंक्शनरीज में स्वायत्ता की जरूरत है. 14वां-15वां वित्त का पैसा पंचायतों को तो जारी हो गया पर अब भी प्रशासनिक कंट्रोल उनके पास नहीं.

उनका डिजिटल साइन पदाधिकारियों, कंप्यूटर ऑपरेटर के पास है. एक भी मैनपावर पंचायत के कंट्रोल में नहीं है. उसे ब्लॉक के भरोसे ही दौड़ना पड़ता है. और बड़ी बात यह है कि ब्यूरोक्रेट्स अपने पावर का डिसेंट्रलाइजेशन नहीं करना चाहते.

ऐसे में मुखिया के सामने हजारों चुनौतियां हैं. कुछेक उदाहरणों को छोड़ दें तो अमूमन पंचायत प्रतिनिधि साजिशों का हिस्सा जानबूझ कर बनाये जा रहे हैं.

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