
Manoj Kumar Pintu
Giridih: 17 हजार 156 मतों से जीत दर्ज कराने वाली सूबे की उत्पाद मंत्री बेबी देवी ने अपनी निकटम प्रतिद्वंद्वी और एनडीए प्रत्याशी यशोदा देवी को जिस अंतर मतों से पराजित करने में सफल रही, उसे ये स्पष्ट हुआ की डुमरी की जनता का मूड भांपने में एनडीए नाकाम रही. क्योंकि जेएमएम प्रत्याशी सह मंत्री बेबी देवी को 1 लाख 231 वोट मिले, जबकि एनडीए की यशोदा देवी को 83 हजार 75 वोट में ही संतुष्ट होना पड़ा. एनडीए के तीन पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी समेत राज्य के प्रदेश प्रभारी लक्ष्मीकांत वाजपेई और आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो तक चुनाव जीतने को लेकर पूरी ताकत झोंक चुके थे. लेकिन इस चुनाव में ओवर कॉन्फिडेंस रहना भी एनडीए नेताओं को भारी पड़ गया. और एनडीए की यही चूक उसे करारी हार का रास्ता दिखा दिया.

उपचुनाव में एनडीए को मिली हार का एक और बड़ा कारण सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी का गिरिडीह के प्रति शुरू से सौतेला व्यवहार भी माना जा रहा है, चुनाव हारने के बाद सबसे अधिक गिरिडीह भाजपा के नेता ही एनडीए के सांसद को दबी जुबान से कोसते दिख रहे है. न्यूज विंग ने पहले ही ये संकेत दे दिया था कि अगर उपचुनाव में एनडीए हारती है तो सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी का इसकी एक बड़ी वजह के रूप में सामने आ सकता है. क्योंकि कुर्मी वोटर को एनडीए प्रत्याशी यशोदा देवी के पक्ष में गोलबंद करने में भी सांसद नाकाम रहे. जबकि खुद सांसद कुर्मी जाति से आते है और इस उपचुनाव में चंद्रपुरा और नावाडीह के कुर्मी और अल्पसंख्यक वोटरों ने मंत्री बेबी देवी पर अपना भरोसा कायम रखा. दूसरी तरफ उपचुनाव की घोषणा के साथ ही सीएम हेमंत सोरेन तो खुद रेस हुए ही, उनके साथ गिरिडीह के सदर विधायक सोनू ने उपचुनाव में जीत को अपना प्रतिष्ठा बना लिया.

लिहाजा, मतगणना के शुरू होते ही जब पहले राउंड से एनडीए प्रत्याशी यशोदा देवी के पक्ष में रुझान दिखना शुरू हो गया था. शुरुवाती दौर में डुमरी के ईवीएम से एनडीए की यशोदा देवी के समर्थन में वोटरों के मत निकलने शुरू हुए, इसके बाद डुमरी के उत्तराखंड और निमियाघाट इलाके से भी एनडीए की यशोदा देवी के समर्थन में ही वोट निकलने शुरू हुए. इन इलाकों में मंत्री बेबी देवी को कुछ वोट ही निकल रहे थे, लेकिन जब बोकारो के नावाडीह और चंद्रपुरा के ईवीएम खुले, तो मंत्री बेबी देवी के समर्थन में वोटरों की बाढ़ आई.
AIMIM प्रत्याशी अब्दुल मोबिन रिजवी बुरी तरह से इस चुनाव में पीटे, अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर अब्दुल मोबिन रिजवी का भरोसा कायम नही रह पाया. लिहाजा, अब्दुल मोबिन रिजवी को तो महज 10 हजार के अंदर ही सिमट कर रह जाना पड़ा. सारे निर्दलीय प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई.
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