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वैजयंती माला से प्रेम प्रसंग को ले राजकपूर की पत्नी कृष्णा घर छोड़ चली गयी थी होटल

राज कपूर की पुण्यतिथि पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां .. ये गीत आज राजकपूर की पुण्यतिथि पर बरबस याद आ रहा है. राज कपूर हिंदी सिनेमा के सबसे शानदार डायरेक्टरों में शुमार हैं. इसलिए उन्हें ग्रेटेस्ट शोमैन भी कहा जाता है.

वे पृथ्वीराज कपूर जैसे मशहूर अभिनेता के पुत्र थे लेकिन वे पहली ही फिल्म में हीरो के रूप में लांच नहीं हुए थे जैसा कि बाद के वर्षों में होता रहा है. उन्होंने निर्देशक केदार शर्मा के यहां क्लैपर बाय के रूप में काम शुरू किया था.

यहां तक कि एक बार ज्यादा जोर से क्लैप करने पर उन्हें केदार शर्मा का जोरदार थप्पड़ भी खाना पड़ा था. कुछ वर्षों बाद केदार शर्मा की ही फिल्म नीलकमल में वे हीरो के रूप में आए.

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1950 में आर. के. स्टूडियो की स्थापना

24 साल की उम्र में राजकपूर ने ‘आग’ (1948) का निर्माण और निर्देशन भी स्वयं किया. इसके बाद राज कपूर ने चेम्बूर में 1950 में अपने आर. के. स्टूडियो की स्थापना की. 1951 में उन्होंने ‘आवारा’ बनाई.

इस फिल्म ने राजकपूर को काफी लोकप्रियता दी. यह उनकी सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक है. ‘बरसात’ (1949) फिल्म से राजकपूर और नर्गिस की जोड़ी बन गई थी. राज कपूर ने ‘श्री 420’ (1955), ‘जागते रहो’ (1956) व ‘मेरा नाम जोकर’ (1970) जैसी सफल फ़िल्मों का निर्देशन व लेखन किया और उनमें अभिनय भी किया.

चार्ली चैपलिन’ से काफी प्रभावित थे

राजकपूर अभिनेता ‘चार्ली चैपलिन’ से काफी प्रभावित थे. उनके अभिनय में उनकी स्पष्ट छाप दिखाई देती है. राजकपूर इसलिए महान थे कि उनकी लगभग सभी फिल्मों में कोई-ना कोई मैसेज होता था. यहां तक की वे अपराधी का भी रोल कर रहे होते थे तो भी ईमानदारी व मानवता को उनके किरदार नहीं छोड़ते थे.

नायिकाओं के अंग प्रदर्शन के पीछे की साइकोलॉजी

उनका यौन बिंबों का प्रयोग अक्सर परंपरागत रूप से सख्त भारतीय फ़िल्म मानकों को चुनौती देता था. वे अपनी लगभग हर फिल्म में अभिनेत्रियों के अंगों को दिखाने का कोई ना कोई बहाना या कहे सिच्यूएशन ढूंढ लेते थे.

जैसे मेरा नाम जोकर में सिम्मी ग्रेवाल व पद्मिनी, सत्यम शिवम सुंदरम में जीनत अमान, रामतेरी गंगा मैली में मंदाकिनी के नहाने का सीन. इसके पीछे की सायकोलॉजी के बारे में राजकपूर खुद बताते हैं कि उनकी मां बेहद खूबसूरत महिला थीं.

उनके नैन नक्श एक पठान सत्री के जैसे तीखे थे. हम अक्सर साथ स्नान करते थे और उनकी नग्नावस्था को देखते रहने से मेरे मस्तिष्क में एक गहरा कामुक असर उत्पन्न हुआ. ऊर्दू में एक अति सुंदर कहावत है मुकद्दस यूरियान (पवित्र नग्नता) जो हमारे इस संबंध की पूर्णरूपेण परिचायक है. मेरी फिल्मों में नायिकाओं के स्नान दृश्य बार – बार आते हैं.

फिल्म मेरा नाम जोकर में भी राजकपूर के किशोरावस्था का रोल करने वाले ऋषि कपूर का अपनी टीचर के प्रति जो क्रश दिखाया गया है वो राजकपूर के खुद अपनी आपबीती है.

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अलग-अलग मुद्दों पर बनाई फिल्में

राजकपूर की फिल्मों की सबसे खास बात उसकी कहानी होती थी वे हमारे समाज के अलग-अलग विषयों को दिखाते थे. जैसे श्री 420 में जमाखोरी का मामला था. सत्यम शिवम सुंदरम में निम्न जाति का मसला दिखाया गाया था. प्रेम रोग में विधवाओं की स्थिति को बहुत ही संवेदनशील ढंग से पेश किया गया था.

संगीत की अच्छी समझ

राजकपूर की फिल्मों की सफलता और आज सत्तर साल बाद भी उन फिल्मों के लोकप्रिय होने की एक सबसे बड़ी वजह उनका कर्णप्रिय गीत- संगीत भी रहा है. राजकपूर को संगीत की अच्छी समझ थी. इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह था कि उन्होंने संगीत का बकायदा प्रशिक्षण लिया था. उन्होंने बहुत ही शानदार टीम बनाई थी.

गायक मुकेश तो जैसे राजकपूर की आवाज थे. उनकी लगभग सारी फिल्मों में मुकेश ने ही गीत गाए थे. वहीं संगीत की बागडोर शंकर जयकिशन के पास थी. गीत लिखने के लिए शैलेंद्र थे.

इन लोगों की टीम ने एक से बढ़कर एक यादगार गीत दिए हैं. जिन्हें हम आज भी बड़े शौक से सुनते हैं. मेरा जूता है जापानी.. गीत काफी लोकप्रिय हुआ था.

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पहले ऐसे अभिनेता जो विदेश में भी प्रसिद्ध थे

राजकपूर भारतीय सिनेमा के पहले ऐसे अभिनेता जिनकी लोकप्रियता देश की सीमाओं को लांघ कर विदेशों में भी पहुंच

गई थी. खासकर सोवियत संघ में उनके काफी फैन थे. एक बार पंडित जवाहरलाल नेहरू सोवियत संघ की यात्रा से लौटे तो उन्होंने पृथ्वी राज कपूर से मुलाकात में कहा था कि तुम्हारे बेटे ने आवारा फिल्म बनाई है उसकी चर्चा स्टालिन कर रहा था.

राजकपूर की फिल्में सिर्फ रूस ही नहीं बल्कि इंग्लैंड, ईरान, सीरिया और जोर्डन में भी लोकप्रिय थीं. तेहरान में संगम फिल्म तीन साल तक चली और उसका हर शो हाउसफुल रहा.

विदेशों में उनकी फिल्मों के डिस्ट्रीब्यूटर रहे हिंदूजा परिवार था. इसके सदस्य बताते हैं कि भारतीय सिनेमा का विदेशों में बाजार तैयार करने में राजकपूर की महत्वपूर्ण भूमिका है. राजकपूर विदेशों में भारतीय संस्कृति के अग्रणी राजदूत थे.

राजकपूर की एक बात जो सबसे ज्यादा भाती है वो है उनका एक सीधा-साधा इन्सान का किरदार निभाना. आपको तीसरी कसम का हीरामन तांगावाला याद है. इतना सहज अभिनय ही उनका सबसे बड़ी पूंजी थी. मेरा नाम जोकर के राजू के भोलेपन भी आप फिदा हुए बिना नहीं रह पाएंगे.

राजकपूर जिस तरह की प्रतिभा के धनी अभिनेता और निर्देशक थे उनके स्तर का उनका समकालीन एक नाम मुझे लगता है और वो है गुरुद्त्त. कुछ मामलों में गुरुदत्त को राजकपूर से भी बेहतरीन कहा जा सकता है क्योंकि गुरुदत्त ने हीरोइनों के कपड़े उतरवाने के बहाने नहीं तलाशे.

इसके अलावा गुरदत्त ने शायद राजकपूर की तुलना में ज्यादा बेहतरीन फिल्में बनाई हैं भले ही उनकी फिल्मों को राजकपूर जैसी व्यावसायिक सफलता नहीं मिली हो. अाप साहेब बीबी और गुलाम, प्यासा व कागज के फूल फिल्मों की तुलना राजकपूर की फिल्मों से कर के देख सकते हैं.

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फिल्म निर्माण की बारिकियों पर पैनी नजर

राजकपूर फिल्म निर्माण की लगभग हर विद्या की अच्छी समझ रखते थे. फिल्म निर्माण की बारिकियों पर वे पैनी नजर रखते थे. इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है. फिल्म निर्देशक राहुल रवैल ने सन्नी देओल के लीड रोल वाली अर्जुन फिल्म का एक स्पेशल शो रखा था. राजकपूर भी उसमें गए थे.

किसी एक दृश्य के बारे में जब किसी ने पूछा कि इसमें कितने कैमरे इस्तेमाल किए गए हैं तो राहुल रवैल ने बताया की सात. इस पर तपाक से राजकपूर ने कहा कि मुझे तो पांच ही कैमरे नजर आए.

जब कैमरामैनस से पूछताछ की गई तो पता चला की राजकपूर सही कह रहे थे तकनीकी गड़बड़ी के कारण सिर्फ पांच ही कैमरों का इस्तेमाल हो पाया था.

देर रात शराब पीकर घर आकर करते थे हो हल्ला

ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा खुल्लमखुल्ला में अपने पिता राजकपूर के बारे में भी विस्तार से लिखा है. ऋषि लिखते हैं कि मेरे बचपन में एक समय ऐसा भी आया जब मुझे उनका आगमन सुखद तो कतई नहीं लगता था.

अर्धरात्रि के बाद वाले उस भय से मैं काफी हद तक पीड़ित रहा. मैं हर दिन भयाक्रांत रहा करता कि पता नहीं आज वह कितने पिए और किस मूड में आएंगे और मेरी मां से झगड़ने लगेंगे.

एक कर से एक लंबे अरसे तक पिता के भने मुझे जकड़े रखा. यह भय मदहोशी के आलम के उन दृश्यों के कारण ही रहा होगा उस छोटी उम्र में ही मैंने खुद से वचन लिया था कि मैं कभी नशे में धुत होकर अपने बच्चों को भयभीत नहीं करूंगा.

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लोक संगीत ऐसे जुड़ते थे राज कपूर

ऋषि कहते हैं जैसे जैसे मैं बड़ा होता गया अपने पिता की विलक्षण सृजनात्मकता और उसके फलस्वरूप आए सनकीपन को स्वीकार करने की समझ मुझ में पैदा होती गई. किसी-किसी रात पीने के बाद वह भैया लोगों के भैंसों के बाड़े में जाकर उनके गाने सुनते या उनके साथ ड्रम या हारमोनियम बजाने लगते. दशहरे पर वह बंगाली गाने सुनने शिवाजी पार्क जाते थे.

बड़े होने पर हमें अपने स्वतंत्र कमरे मिलने पर पिता के भय से समायोजन करना सरल हो गया फिर भी दिल की गहराइयों में भय बना ही रहा.

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नटराज होटल में जाकर रहीं थी कृष्णा

ऋषि कपूर लिखते हैं कि नर्गिस के साथ उनके प्रेम प्रसंग के समय में बहुत छोटा था अतः मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. इसके कारण घर पर भी कोई कमी या असामान्य बात मुझे महसूस नहीं हुई परंतु वैजयंती माला के साथ उनकी नजदीकियों के समय मम्मी के साथ मरीन ड्राइव के नटराज होटल में जाकर रहने की बात मुझे याद है.

मुझे याद है कि मां उस समय अपनी बात पर अड़ी रही थीं . होटल से निकल कर दो माह तक हम अल्टा माउंट के मोड़ पर स्थित चित्रकूट बिल्डिंग जिसे मेरे पिता ने हमारे लिए खरीदी थी और जो अभी भी कायम है मैं हम रहे.

मेरे पिता ने मेरे मां को प्राणपन से मनाने की कोशिश की परंतु मेरी मां तभी मानी जब पापा ने अपने जीवन के उस अध्याय को पूरी तरह खत्म कर दिया.

मेरे पिता को सिनेमा से, अपनी शराब से और अपनी नायिकाओं से असीम प्रेम था. समय बीतने के साथ-साथ मुझे महसूस हुआ कि पिता के अनेक आदतें जाते और सनक मैंने भी ग्रहण कर ली.

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नरगिस को मां ने ऐसे समझाया

ऋषि कपूर अपनी किताब में बताते हैं कि मेरी शादी के उत्सव में नरगिस जी आई थीं. उन्होंने जागते रहो के बाद आर के स्टूडियो में कभी कदम नहीं रखा था परंतु उस दिन वह अपने पति सुनील दत्त के साथ मेरे विवाह के उत्सव में शामिल होने के लिए आई थी.

पत्रकार जेपी चौकसे ने बाद में ऋषि कपूर को बताया था कि 24 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद एक कपूर शो में शामिल होने पर उनको अटपटा और असहज महसूस करना स्वभाविक था.

उनका संकोच भांप कर मेरी मां ने उन्हें एक और ले जाकर कहा मेरे पति एक बहुत ही सुदर्शन व्यक्ति हैं साथ ही रोमांटिक भी. मैं आपके प्रति उनके आकर्षण को समझ सकती हूं परंतु अफसोस अपराध बोध महसूस ना करो. वह सब तो बीती बातें हैं आप मेरे घर खुशी के मौके पर आई हैं और आज यहां हम दोनों दोस्त हैं.

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दिलीप कुमार प्रतिस्पर्धी भी दोस्त भी

मई 1988 में पापा एक माह तक कोमा में रहे. वे ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट नई दिल्ली में जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे. उस समय पापा के पलंग के पास शोकाकुल दिलीप कुमार कुछ समय तक बैठे रहे.

उनके मुंह से निकला राज तुम उठो अब यह स्वांग बंद करो तुम हमेशा से दृश्य की जान हुआ करते थे. सुर्खियां तुम्हारे कदम चूमती थी बस अब बहुत हो गया अब उठ जा.

दिलीप कुमार को मेरे नीम बेहोशी में पड़े पिता से इस तरह की बातें करते देख मेरी आंखें छलछला गई. उन्होंने बोलना जारी रखा मैं अभी पेशावर से आया हूं जहां से चपली कबाब लाया हूं.

तुम्हें याद ही होगा हम कितने प्यार से खाते थे चल उठ यार कबाब खाएंगे. मेरे लिए अब अपने को संभालना कठिन हो गया इस तरह मेरे पिता से लगभग 20 मिनट तक बात करते रहे और यह सब मैंने अपनी मां को बाद में बताया.

पापा और दिलीप कुमार बड़े सितारे थे साथ में गहरे मित्र ये अनमोल बात थी. इसी धनिष्ठता के कारण संगम की समानांतर भूमिका के लिए पिता ने पहले ही संपर्क किया था. उन्होंने इसे स्वीकार तो नहीं किया परंतु उनकी दोस्ती कायम रहे वे जीवन पर्यंत एक दूसरे के सच्चे दोस्त बने रहे.

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सुनील दत्त से भी अच्छा रिश्ता

नरगिस जी से शादी के कारण थोड़ी असहजता के बावजूद पिताजी का सुनील दत्त से रिश्ता बहुत अच्छा रहा. जब पापा को जब न्यूयार्क के sloan-kettering में डॉक्टरी मुआयने के लिए ले जाया गया तो दत्त साहब भी वहां आए और उन्होंने पापा को डॉ मंजीत बैंस और उनकी कैंसर विशेषज्ञ दल से मिलवाया. नरगिस जी की बीमारी के दौरान उनका उस टीम से गहरा परिचय हो चुका था.

2 जून 1988 को अस्थमा में जटिलता आने के कारण उनकी मृत्यु हो गई. उस समय मेरे एक दोस्त फारुख रत्न नसीब जो फिल्म निर्माता है. उसको इजराइल के तेल अबीब में एक टैक्सी ड्राइवर ने मेरे पिता के देहांत की सूचना दी.

इस घटना ने हमको एहसास करा दिया कि वह इजराइल में भी कितने लोकप्रिय थे. वहां संगम फिल्म ढाई साल तक चली थी.

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