
Amit Kumar Jha
Ranchi: मिशन 2024 के लिए प्रदेश भाजपा ने कमर कस ली है. लगातार तीसरी दफा केंद्र की सत्ता में पार्टी को काबिज करवाना पार्टी के लिए कड़ा इम्तिहान साबित हो रहा है. ऐसे में महा जनसंपर्क अभियान के जरिये उसके नेता, वर्कर जून महीने की तपती धूप में पूरे प्रदेश भर में गांव, शहरों की खाक छान रहे हैं. पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे और उनकी उपलब्धियों के साथ लोगों से संवाद बनाने में पार्टी के शीर्ष नेता के साथ-साथ प्रदेश के नेता लगे हुए हैं. इधर, झारखंड में अब तक विपक्षी एकता की साफ साफ तस्वीर सामने नहीं आ सकी है.
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झारखंड में कहने को सत्तारूढ़ गठबंध के सभी दल झामुमो, कांग्रेस और राजद साथ-साथ अगला लोकसभा चुनाव लड़ने की बात कह रहे हैं. पर, यूपीए के बैनर तले आने को उतावले अन्य दल जनता दल (यू), आम आदमी पार्टी (आप) के लिए कौन सा फॉर्मूला अपनाया जायेगा, इस पर किसी तरह की तस्वीर साफ नहीं हो पायी है. बिहार के सीएम नीतीश कुमार, दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल जैसे लीडर विपक्षी एकता के नाम पर रांची आकर यहां सीएम हेमंत सोरेन से मिलकर बात कर चुके हैं. पर अब भी विपक्षी एका को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है. यह स्थिति तब है जब लोकसभा चुनाव के लिए अब सालभर से भी कम यानी केवल आठ-नौ महीने का ही समय शेष है.
क्या है यूपीए का रूख
पिछली दफा 2019 में हुए आम चुनाव में झारखंड में 14 सीटों में से 11 पर भाजपा ने जीत दर्ज की थी जबकि एक सीट (गिरिडीह) पर सहयोगी दल के रूप में आजसू पार्टी को जीत मिली थी. वहीं साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस और झामुमो के खाते में केवल एक-एक सीट (सिंहभूम और राजमहल) आयी थी. राजद का खाता भी नहीं खुला था. ऐसे में अब उम्मीद की जा रही है कि 2024 में होनेवाले आगामी चुनाव में भी तीनों दल साथ-साथ चुनाव लड़ें. हालांकि यूपीए के अहम घटक दल झामुमो के रवैये से लग रहा है कि लोकसभा चुनाव के दौरान भी वह फ्रंट पर बैटिंग करना चाहता है. 14 जून को पार्टी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक सवाल के जवाब में कहा था कि लोकसभा में कांग्रेस बड़े भाई के रूप में है. पार्टी महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने इसमें यह भी जोड़ते कहा था कि झामुमो की जो सांगठनिक ताकत है, उसमें कांग्रेस को आगे बढ़ाने में हमारी पार्टी की अहम भूमिका होगी. अभी चुनाव के लिए सीटों के निर्धारण, संख्या के बारे में कुछ तय नहीं हुआ है. आपस में बैठ कर इसे तय कर लिया जायेगा.
कांग्रेस सीटवार कर रही स्थिति का आकलन
इधर, प्रदेश कांग्रेस तकरीबन सभी चौदह सीट पर अपनी नजर लगाए हुए है. हालांकि उसके मुताबिक सीटों के संबंध में निर्णय बड़े नेताओं की बैठक के बाद ही लिया जायेगा. फिलहाल उसकी ओर से लगातार कई कार्यक्रम किए जा रहे हैं. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर के मुताबिक देश से भाजपा की विदाई जरूरी है. महंगाई, बेरोजगारी जैसे सवालों पर वह फेल है. भारत जोड़ो यात्रा, सत्याग्रह, हाथ से हाथ जोड़ो जैसे तमाम कार्यक्रमों के जरिये पार्टी जनता के सवालों को लेकर आगे बढ़ती रही है. जो पार्टियां केवल अपने हित की बात कर महागठबंधन में साथ आना चाहेंगी, उसकी कोई जगह नहीं बनेगी. अपने दायरे में रहकर बात करने वालों का ही स्वागत होगा.
जदयू के लिए प्रदेश में नील बटे सन्नाटा की है स्थिति
वहीं झारखंड में जनता दल (यू) की बात करें तो पिछले एक दशक से वह नील बटे सन्नाटा की स्थिति में दिख रही है. विपक्षी एकता की कवायद के नाम पर बिहार सरकार में मंत्री और प्रदेश प्रभारी अशोक कुमार चौधरी लगातार झारखंड दौरा कर पार्टी में जान फूंकने व संगठन को दुरूस्त करने में लगे हुए हैं. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से खीरू महतो को राज्यसभा सांसद बनाकर और झारखंड में जदयू की कमान थमाकर संगठन में जान फूंकने की कवायद के रूप में ही देखा जा रहा है.
विपक्षी एका के नाम पर हेमंत के सपर्क में आप
आम आदमी पार्टी ने भी विपक्षी एकता के नाम पर हेमंत सोरेन से समर्थन मांगा है. हालांकि औपचारिक तौर पर पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली सरकार के अधिकारों में कटौती के मसले पर केंद्र के अध्यादेश के खिलाफ राज्यसभा में गैर भाजपाई दलों से एकजुटता दिखाने की मांग की है. पर रांची आने के बाद कांग्रेस के लिए जिस तरह की मंशा उनकी दिखी है, उसे लेकर आशंका बनी ही हुई है कि मिशन 2024 के लिए कांग्रेस उसके साथ सहज दिखे. फिलहाल सभी की नजरें 23 जून को पटना में होने वाले विपक्षी दलों के नेताओं के बैठक पर हैं. कहा जा रहा है कि इसमें कांग्रेस से राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी शामिल होंगे. देखने वाली बात होगी कि आम आदमी पार्टी सहित दूसरे दलों के कितने लोग इसमें अपनी हाजिरी लगाते हैं और क्या निष्कर्ष निकलता है.




