Opinion

अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचिए, निजीकरण से कर्मचारियों के न्यूनतम अधिकार भी छिन जायेंगे

Hemant  Kumar Jha

महत्व इस खबर का नहीं है कि सरकारी दफ्तर में चपरासी, सफाईकर्मी और माली के विज्ञापित पदों के लिए पीएचडी, आइआइटी से बीटेक और अच्छे संस्थानों से एमबीए किये प्रत्याशियों ने आवेदन किया है, बल्कि, महत्व इस सवाल का है कि आखिर इन चतुर्थ वर्गीय पदों के लिए इतनी उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों ने आवेदन किया ही क्यों?

झारखंड में सिविल कोर्ट में इन पदों के लिए जो विज्ञापन निकला था, उसमें निर्धारित योग्यता 10वीं पास थी. कुल 40 पदों के लिए 40 हजार लोगों ने आवेदन किया और खबर है कि साक्षात्कार लेनेवाले जज उलझन में हैं कि आखिर आइआइटी ग्रेजुएट, डॉक्टरेट आदि किये हुए प्रत्याशियों का क्या किया जाये.

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सवाल है कि इतने पढ़े-लिखे लोग आखिर क्यों उन पदों पर नियुक्त होने के लिए व्यग्र हैं, जिनमें महज 10वीं पास की योग्यता चाहिए.

क्या सिर्फ रोजगार पाने के लिए?  नहीं, ऐसा कहना स्थितियों की सरलीकृत व्याख्या होगी.

तो क्या उन पदों पर नियुक्त लोगों को बहुत अच्छा वेतन और भत्ते मिलते हैं? क्या उस वेतन-भत्ते के लिए ही डॉक्टरेट या बीटेक प्रत्याशी लालायित हैं?

जाहिर है, नहीं.

सातवें वेतन आयोग के बावजूद चतुर्थ वर्गीय कर्मियों का वेतन इतना नहीं है कि कोई आइआइटी ग्रेजुएट, कोई पीएचडी धारक, कोई एमबीए उसके लिए लालायित हो जाये. न ही उन पदों के साथ इतना सम्मान जुड़ा है कि कम वेतन के बावजूद लोग उनमें नियुक्ति के लिए उत्सुक हों.

तो फिर, महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ऐसा क्या है उस विज्ञापन में?

सीधा सा जवाब है…वे सारे चतुर्थ वर्गीय पद सरकारी ऑफिस के हैं और उन पदों पर नियुक्ति के बाद सेवा के साथ सरकारी सुरक्षा की निश्चिंतता होगी, भले ही वेतन कम हो.

इस आपाधापी के दौर में सेवा की सुरक्षा बड़ी चीज है.

इसके साथ ही सरकारी सेवा में कर्मियों की न्यूनतम मानवीय गरिमा बनी रहने की गारंटी भी होती है. कोई आपको यह नहीं कह सकता कि कल से मत आना. अगर अनुशासनात्मक कार्रवाई भी होती है तो उसकी एक तय प्रक्रिया है और अन्याय होने पर कोर्ट का दरवाजा खुला रहता है.

सेवा सुरक्षा, नियमानुसार वार्षिक वेतन वृद्धि, न्यूनतम मानवीय गरिमा की सुरक्षा, समयबद्ध प्रोन्नति के अवसर, अन्याय होने पर न्याय पाने के लिए कोर्ट जाने का अधिकार आदि बड़े कारण हैं कि मध्य और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों के अधिकतर युवा सरकारी सेवा पाने की अधिकतम कोशिशें करते हैं.

हाल में एक खबर आयी थी कि किसी नामी आआइटी से ग्रेजुएट एक मेधावी युवक रेलवे में गैंगमेन के रूप में भर्त्ती हुआ और पूछे जाने पर उसने सीधा जवाब दिया कि उसे प्राइवेट में इससे बेहतर पैकेज मिल सकता था लेकिन रेलवे की सरकारी सेवा की सुरक्षा उसे आकर्षक लगी.

वह अधिक पढ़ा-लिखा है तो भविष्य में अपने लिए बेहतर अवसर रेलवे में ही तलाश लेगा.

ऐसी खबरें आती ही रहती हैं. पिछले दिनों यूपी के सिंचाई विभाग, हरियाणा के शिक्षा विभाग में चपरासी और सफाई कर्मियों के विज्ञापित पदों के लिए पीएचडी, एमए, एमबीए, बीटेक आदि आवेदकों की भरमार थी.

अब सवाल यह उठता है कि सरकारी नौकरी के आकर्षण में, इसकी सेवा सुरक्षा की छतरी के नीचे आने की ललक में जो पीएचडी, एमबीए, बीटेक आदि आदि डिग्री धारक सफाईकर्मी तक बनने के लिए बेताब हैं वे सरकार के अंध निजीकरण अभियान के बारे में क्या सोचते हैं.

क्या उन्हें पता नहीं है कि सरकार रेलवे, एयरपोर्ट सहित पब्लिक सेक्टर की अनेकानेक इकाइयों का निजीकरण करने जा रही है?

क्या उन्हें पता नहीं है कि नीति आयोग ने अपनी कार्ययोजना में तमाम सरकारी स्कूलों के निजीकरण का मन्तव्य जाहिर किया है?

क्या वे इन खबरों से वाकिफ नहीं हैं कि नयी शिक्षा नीति में सरकारी विश्वविद्यालयों के कारपोरेटीकरण की योजना पर सोचा जा रहा है?

इसके साथ ही चतुर्थवर्गीय पदों पर बहाली के लिए हलकान हो रहे डॉक्टरेट और बीटेक लोगों को यह पता नहीं है कि सरकार तमाम सरकारी/पब्लिक सेक्टर कार्यालयों में चतुर्थ वर्गीय पदों को एक-एक कर आउटसोर्सिंग जैसी अमानवीय प्रणाली के हवाले करती जा रही है?

उन्हें यह सब पता नहीं हो ऐसा नहीं हो सकता. आखिर, वे सब अच्छे-खासे पढ़े-लिखे युवा हैं और बदलती हुई दुनिया, बदलते हुए देश के हालात उनसे छुपे कैसे हो सकते हैं?

लेकिन, समस्या यह है कि नौकरियों के प्रत्याशी के बतौर वे अलग भावभूमि पर हैं और बतौर नागरिक एक अलग ही भावभूमि पर. इस द्वैध के दुष्चक्र में वे जिस भ्रम में जीते हैं वह उनकी सजगता छीन रही है.

अगर उन पीएचडी, बीटेक, एमए, एमबीए आदि डिग्रीधारकों का सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल चेक किया जाये तो अधिकतर के वाल पर आपको उन्हीं सरकारी कर्मियों के लिए चिढ़ और तदनुसार निजीकरण के लिए समर्थन मिलेगा जिनके ऑफिसों में वे येनकेन प्रकारेण चपरासी भी बन जाने के लिए व्यग्र हैं.

किसी सरकारी विज्ञापन के बतौर प्रत्याशी वे अलग चीज हैं जबकि बतौर नागरिक बिल्कुल ही अलग चीज. नौकरी के प्रत्याशी के रूप में उनको सेवा की सुरक्षा चाहिए, कर्मियों के न्यूनतम अधिकार चाहिए, मानवीय गरिमा की रक्षा चाहिए, नियमानुसार वेतन वृद्धि और तरक्की चाहिए, जबकि बतौर नागरिक उनमें से अधिकतर को मोदी-शाह ब्रांड राष्ट्रवाद चाहिए, अपनी नौकरी के अलावा बाकी सारी कायनात का निजीकरण चाहिए.

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वे उस परसेप्शन में मजे से जीते हैं कि तमाम सरकारी कर्मी भ्रष्ट और कामचोर हैं और निजीकरण का डंडा ही ऐसों को सीधा करेगा. निजीकरण में ही देश का विकास है. सरकारी स्कूलों को तो मर ही जाना चाहिए आदि आदि.

उनमें से अधिकतर इस पर ध्यान भी नहीं देते कि सरकार जानबूझ कर चिकित्सा मद में सरकारी खर्च में कटौती करती जा रही है और इस क्षेत्र में निजी पूंजी को लूट मचाने के लिए पूरा मैदान खाली किया जा रहा है.

बतौर नागरिक वे न अपनी पीढ़ी का हित-अहित सोच पा रहे हैं न अपने बच्चों की पीढ़ी के हित-अहित पर विचार कर पा रहे हैं. वे उसी भावनात्मक रौ में बहे जा रहे हैं जिसमें न्यूज चैनलों के दलाल एंकर उन्हें बहाते जा रहे हैं.

उनकी चिंता यह नहीं है कि जिस चपरासी या सफाईकर्मी के पद के लिए वे बीटेक या एमए, पीएचडी होकर भी अप्लाई कर रहे हैं, ताकि एक कर्मचारी के रूप में उनके न्यूनतम अधिकारों की रक्षा हो.

उसी पद के लिए उनके बच्चे अप्लाई तक नहीं कर पायेंगे क्योंकि आउटसोर्सिंग की सरकारी मुहिम निरंतर परवान चढ़ रही है.

आनेवाले वक्त में ऐसे तमाम पद आउटसोर्स होनेवाले हैं जिनमें सरकारें आदमियों की भर्त्ती नहीं करेंगी बल्कि कंपनियां गुलामों की भर्त्ती करेंगी.

ऐसे गुलाम, जिन्हें बतौर कर्मचारी न्यूनतम अधिकार भी हासिल नहीं होंगे, जिनके वेतन का बड़ा हिस्सा कंपनियां हड़प लेंगी और जिनकी न्यूनतम मानवीय गरिमा की सुरक्षा भी नहीं होगी क्योंकि कम्पनी किसी भी गुलाम को कभी भी कह सकती है “कल से मत आना”.

यह पीढ़ी विचारों के स्तर पर द्वैध की शिकार है. स्वार्थी, आत्मनिष्ठ पीढ़ी. इतनी आत्मनिष्ठ, जिसे अपने बच्चों की पीढ़ी की भी चिन्ता नहीं. उन्हीं बच्चों की, जिनकी एक मुस्कान के लिए वे अपना सब कुछ न्योछावर करने के लिए तत्पर हैं. लेकिन, उनके वैचारिक खोखलेपन और द्वैध का आलम यह है कि खुद तो इतना पढ़ लिख कर भी सरकारी छतरी की ललक में चपरासी बनने तक को तैयार हैं, लेकिन इस बात के लिए कतई चिंतित नहीं कि उनके बच्चे किस गुलामी के दुष्चक्र में बड़े होंगे और न्यूनतम मानवीय गरिमा से भी महरूम होंगे।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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