
Akshay Kumar Jha
Ranchi: नेता का जेल जाना या जेल से बाहर होना भारत में कोई नयी बात नहीं है. राजनीति में कहावत भी है कि आना-जाना तो लगा रहता है.
झारखंड विधानसभा चुनाव से पहले भी ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं, जिसमें राजनीतिक विरासत बचाने के लिए जेल से या जमानत पर बाहर निकल कर विधायक या पूर्व विधायक अपनी पिच तैयार कर रहे हैं.
किसी भी हाल में राजनीति विरासत बचाने के लिए प्लान ए और बी पर काम हो रहा है. जानते हैं झारखंड के ऐसे ही राजनीति धुरंधरों को.
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कमल किशोर भगत
आजसू पार्टी से दो बार विधायक रहे कमल किशोर भगत को जैसे दूसरी जिंदगी मिली हो. महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर लोहरदगा के पूर्व विधायक कमल किशोर भगत सहित प्रदेश के 12 बंदी रिहा किये जायेंगे.
शहर के मशहूर चिकित्सक डॉ. केके सिन्हा (अब स्वर्गीय) पर हमला, मारपीट व रंगदारी मांगने के मामले में कमल किशोर भगत को जून 2015 को सात साल की सजा और 10 हजार रुपये का जुर्माना लगा था.
भगत को मारपीट की घटना के 21 साल बाद सजा मिली थी. सजा मिलने के बाद लोहरदगा सीट के उपचुनाव में कांग्रेस से सुखदेव भगत जीते. सुखदेव भगत ने कमल किशोर भगत की पत्नी निरू शांति भगत को करीब 23000 वोट से हराया था.
निश्चित तौर पर कमल किशोर भगत की गैरहाजिरी का प्रभाव चुनाव पर था. श्री भगत अभी छह सालों तक चुनाव नहीं लड़ सकते हैं. ऐसे में इस बार भी वो अपनी पत्नी पर ही दांव खेलेंगे. कमल किशोऱ भगत के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि 2014 के बाद 2019 में होनेवाले चुनाव में ही वो सक्रिय नजर आ सकते हैं. वो राजनीति से सिर्फ चार साल ही दूर रहे. अपनी पुरानी विरासत बचाने के लिए जाहिर तौर कमल किशोर भगत कोई कोर-कसर नहीं छोड़नेवाले. पुरानी पार्टी उनका कितना साथ देती है ये देखनेवाली बात होगी.
एनोस एक्का
पारा शिक्षक मनोज कुमार की हत्या मामले में उम्र कैद की सजा काट रहे पूर्व मंत्री एनोस एक्का को गुरुवार को हाइकोर्ट से जमानत मिल गयी है.
झारखंड से बाहर जाने से पहले कोर्ट से अनुमति लेनी होगी. इसके अलावे पासपोर्ट निचली अदालत में जमा करने का आदेश दिया गया है.
इसी साल जुलाई में एनोस एक्का को उम्र कैद की सजा मिली थी. उम्र कैद की सजा मिलने के बाद एनोस एक्का की विधानसभा सदस्यता भी समाप्त हो गयी थी.
सदस्यता समाप्त होने के बाद उनकी गैरहाजिरी में उनकी पत्नी मेनन एक्का ने चुनाव तो लड़ा. लेकिन उन्हें कांग्रेस के उम्मीदवार विक्सल कोंगाड़ी ने हरा दिया.
इस बार के चुनाव से ठीक पहले एनोस एक्का जेल से बाहर आये हैं. 2005, 2009 और 2014 में लगातार तीन बार जीतनेवाले पूर्व विधायक अपनी खोयी राजनीति विरासत को जाहिर तौर पर वापस पाना चाहेंगे.
एक बार फिर चुनाव में मेनन एक्का के उतरने की पूरी उम्मीद है. देखना दिलचस्प होगा कि क्या एनोस एक्का को उनका राजनीति रसूख वापस मिल पायेगा.
राजा पीटर
राजा पीटर की राजनीतिक कहानी पर बॉलीवुड के किसी डायरेक्टर की नजर पड़ेगी तो जरूर उनकी बायोपिक बन जायेगी. वो अभी जेल में हैं. उन पर पूर्व मंत्री रमेश सिंह मुंडा की हत्या की साजिश करने का आरोप है. आरोप है कि उन्होंने नक्सलियों के साथ मिल कर उनकी हत्या करवायी.
कोर्ट में ट्रायल चल रहा है और वो जेल में बंद हैं. राजा पीटर दो बार विधायक बने. पहली बार शिबू सोरेन को हरा कर उन्होंने झारखंड की राजनीति में गहरी छाप छोड़ी. उनकी जीत की वजह से सरकार तक गिर गयी.
कुछ दिनों पहले एनसीपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता धीरज शर्मा झारखंड पहुंचे थे. उन्होंने राजा पीटर की दूसरी पत्नी आरती जायसवाल को एनसीपी में ज्वाइन कराया. आरती जायसवाल के एनसीपी ज्वाइन करने के बाद कयास लगाया जा रहा है कि आनेवाले चुनाव में वो राजा पीटर की राजनीतिक विरासत वापस लाने की पूरी कोशिश करेंगी.
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संजीव सिंह
कोयला, पैसा और बाहुबलियों की ताकतवाले विधानसभा क्षेत्र झरिया में इस बार का चुनाव काफी रोचक होनेवाला है. एक ही घराने से दो बहुएं आमने-सामने दिख सकती हैं.
कांग्रेस नेता नीरज सिंह की हत्या के आरोप में उनके रिश्तेदार संजीव सिंह जेल में बंद हैं. संजीव सिंह के जेल में बंद होने की वजह से सिंह मेंशन को धनबाद की राजनीति से डिगने का डर सता रहा है.
सिंह मेंशन की तरफ से घोषणा हो चुकी है कि संजीव सिंह की पत्नी रागिनी सिंह 2019 के चुनाव में मैदान में होंगी. तो दिवंगत नीरज सिंह के रघुकुल घराने से भी उनकी पत्नी पूर्णिमा सिंह को मैदान में उतारने की पूरी कोशिश हो रही है.
विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि सिंह मेंशन बीजेपी से चुनाव लड़ने की तैयारी में है. मामले को लेकर केंद्र के एक बड़े मंत्री से सिंह मेंशन संपर्क में है.
वहीं रघुकुल की तरफ से अभी पत्ता नहीं खोला गया है कि पूर्णिमा सिंह किस पार्टी से मैदान में होंगी. जो भी हो, पूरे कोयलांचल की नजर इस बार झरिया विधानसभा के क्षेत्र पर है.
योगेंद्र साव
पूर्व मंत्री योगेंद्र सिंह ने सजायाफ्ता होने के बावजूद अभी तक अपनी राजनीतिक विरासत बचा कर रखी है. 2014 के चुनाव में मोदी लहर के बावजूद कांग्रेस से चुनाव लड़ते हुए उनकी पत्नी निर्मला देवी ने जीत हासिल की थी. इस बार भी योंगेद्र साव का परिवार चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर रहा है.
बस फर्क इतना हो सकता है कि इस बार योगेंद्र साव की पत्नी के बजाय उनकी बेटी अंबा प्रसाद चुनाव लड़ सकती है. हालांकि इस बारे उनके परिवार की तरफ से पत्ते नहीं खोले गये हैं. यह भी अभी कहना मुश्किल है कि अंबा किस पार्टी से अपना डेब्यू करेंगी.
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