Opinion

ग्रीन इकोनॉमिक मॉडल से बेहतर होगी वैश्विक अर्थव्यवस्था 

  • विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष

Ramapati Kumar

अगर विश्वव्यापी समस्याओं की बात करें तो क्लाइमेट चेंज यानी जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव का नाम इनमें सबसे ऊपर है, जो मानव और मानवेतर जीवन और सभ्यता के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है. बार-बार आपदाओं के आने से कभी-कभार इन्हें प्रकृति का कोप और विनाशलीला भले समझा जाये लेकिन क्लाइमेट चेंज के जरिये पैदा होने वाली इन समस्याओं के पीछे असल कारण मानव जनित हैं.

18वीं सदी से शुरू हुई औद्योगिक क्रांति और उपनिवेशवाद से लेकर भूमंडलीकरण की अंधाधुंध रफ़्तार से पिछली दो सदियों में परितंत्र और पर्यावरण का जो विनाश हुआ, वह इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ. पृथ्वी सम्मलेन और क्योटो प्रोटोकॉल से लेकर यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसी) के बैनर तले ‘कॉन्फ्रेंस ऑन पार्टीज या कोप समिट’ में जो विवाद और असहमति के दौर आये हैं और गरीब-अमीर मुल्क से लेकर विकासशील और विकसित देशों के बीच पर्यावरण-सुधार को लेकर जो अपनी-अपनी जिद है, उससे पर्यावरण और समाज का ज्यादा नुकसान हुआ है. अभी हानिकारक ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन में चीन का स्थान पहला है. वहीं अमेरिका का दूसरा, लेकिन अमेरिका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में अव्वल है. लेकिन दोनों के बीच उत्सर्जन मानक में कमी को लेकर विवाद है और उनकी अपनी अलग-अलग राह और प्राथमिकता है. इन कारणों से क्लाइमेट चेंज भीषण संकट बनता जा रहा है.

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दुनिया भर के वैज्ञानिक एकमत हैं कि क्लाइमेट चेंज ने मौसम चक्र को बदल दिया है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम में अप्रत्याशित बदलाव जैसे एक्सट्रीम वेदर अब आम घटना है. बीते साल यूरोप इससे काफी परेशान रहा था. वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल आर्गेनाईजेशन का मानना है कि इस सदी के सबसे गर्म 20 वर्ष पिछले 22 सालों में ही घटित हुए हैं. इसी तरह लगातार सुखाड़ और बाढ़ भारत सहित करीब सभी एशियाई और अफ्रीकी मुल्कों में आम बात है, जिसका असर फसल उत्पादन से लेकर पेयजल संकट के रूप में गंभीर हो गया है. आज वैश्विक तापमान 19वीं सदी के मुकाबले 1 डिग्री ज्यादा गर्म हो गया है. वैश्विक संस्था इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने वैश्विक तापमान को दो डिग्री से कम रखने पर जोर दिया है. बीते दिनों अम्फान आपदा ने जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के निवारण को फिर से बहस में ला खड़ा किया है. ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिए ऊर्जा उत्पादन और खपत ढांचे में बेहद तीव्र बदलाव करना होगा, क्योंकि जीवाश्म ईंधनों से जलवायु गर्म हुई है और एयर क़्वालिटी ख़राब.

वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदुषण असमय मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बन गया है. क्लाइमेट चेंज के दुष्प्रभावों और गर्म होते वातावरण का ‘लाइम’ डिसीज, जीका वायरस, डेंगू आदि बीमारियों के फैलने से सीधा संबंध है. दुनिया में करीब 80 करोड़ की आबादी सुखाड़, बाढ़, हीट वेव्स, एक्सट्रीम वेदर के कारण कमजोर हालत में है.

यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसी) के बैनर तले विश्व्यापी सम्मेलनों के तहत यह सहमति बनी कि ग्लोबल एडेप्टशन फ्रेमवर्क के लिए एक ग्रीन फंड बने, जो वर्ष 2020 तक 100 बिलियन डॉलर की उगाही कर जरूरी कार्य करे. अगर यह जमीन पर उतरता है तो हालत सुधरने लगेंगे. वैश्विक आबोहवा को बेहतर और सेहतमंद रखने के लिए यूनाइटेड नेशन्स एन्वॉयरन्मेंट प्रोग्राम (यूएनइपी) ने वर्ष 2016 में माना कि क्लाइमेट चेंज के अडेप्टेशन के लिए करीब 140-300 बिलियन डॉलर की जरूरत होगी. दरअसल जीवाश्म ईंधन पर अपनी 90 प्रतिशत निर्भरता को अगले 20-30 सालों में अक्षय ऊर्जा की तरफ मोड़ा जाये तो पृथ्वी का तापमान मानक स्तर पर बनाये रखने में मदद मिलेगी.

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इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी का आकलन है कि ग्लोबल एनर्जी सिस्टम के ‘डिकार्बनाइजेशन’ से करीब 28 मिलियन जॉब्स वर्ष 2050 तक पैदा होंगे. इसी एजेंसी का आकलन है कि दुनिया को 2 प्रतिशत से कम गर्म रखने के लिए वर्ष 2050 तक अक्षय ऊर्जा तकनीकों पर करीब 800 बिलियन डॉलर खर्च करने पड़ेंगे. अल्पकालिक और दीर्घकालिक रूप से इस खर्च का काफी फायदा है: स्वच्छ पर्यावरण, मानव सेहत में सुधार, एयर क़्वालिटी में बेहतरी, जंगल, वन्यजीव और जैव विविधता का सरंक्षण आदि.

भारत ने जिस प्रकार फ्रांस के साथ मिल कर ‘इंटरनेशनल सोलर अलायंस’ की नींव रखी है, वह विश्वव्यापी ऊर्जा समस्याओं और क्लाइमेट चेंज के दुष्परिणामों को दूर करने के लिहाज से बेहतर रणनीति है. भारत अक्षय ऊर्जा के मामले में सबसे तेज गति से विकसित होता राष्ट्र है. अभी हाल में केंद्र सरकार ने जिस तरह से ‘वन सोलर, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ की जो बात की है, वह क्लीन और ग्रीन टेक्नोलॉजी के जरिये बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने और पर्यावरण और परिवेश को स्वच्छ एवं बेहतर करने के लिहाज से दूरगामी होगा. यह अभियान वाकई अच्छा है लेकिन सभी देशों के नेताओं को उस एनर्जी सिस्टम में व्यापक बदलाव लाना होगा जो अभी प्रदूषणकारी जीवाश्म ईंधनों पर आधारित है और जो क्लाइमेट चेंज का सबसे बड़ा कारण भी है. भारत जैसे विकासशील देश और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए पर्यावरण रक्षा के साथ-साथ ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक रफ़्तार को बनाये रखने के लिए ग्रीन इकोनॉमी मॉडल सबसे बेहतर रणनीति है. इसलिए यह समय एकजुट होकर ऐसी पहल पर एकजुटता से चलने का है. सच यह है कि वैश्विक पर्यावरण को बेहतर करने की जिम्मेवारी केवल विकासशील देशों ही नहीं बल्कि गरीब और धनी मुल्कों से लेकर हम सभी की भी है.

(लेखक सेंटर फॉर एन्वॉयरन्मेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट, दिल्ली के सीईओ हैं)

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