Opinion

डूबती अर्थव्यवस्था में अगर सचमुच सुधार करना है तो दावों और यथार्थ के बीच के अंतर को समझना जरूरी है

Faisal Anurag

वर्तमान आर्थिक परिवेश में भारत की इकोनॉमी पांच ट्रिलियन होने का दावा रेल मंत्री पीयूष गोयल कर रहे हैं. अमित शाह कह रहे हैं कि इकोनॉमी तेजी से उबर रही है. और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो कह ही चुके हैं कि कोरोना से जंग जारी रहेगी लेकिन इकोनॉमी को भी गति देनी है. आत्मविश्वासों से भरे इन बयानों को ले कर यदि विशेषज्ञों में उत्साह नहीं पैदा हो रहा है तो उसके कारकों की भी तलाश किए जाने की जरूरत है.

राहुल गांधी से बात करते हुए उद्योगपति राजीव बजाज ने यूं ही तो नहीं कह दिया है कि ये लॉकडाउन ड्राकोनियन (कठोर) है. इस से जाहिर होता है कि सरकार के 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा के बावजूद भरोसे की कमी बनी हुई है. राजीव बजाज ने जो कुछ कहा है उसे अनेक उद्योगपति महसूस करते हैं. लेकिन बोल नहीं पाते हैं.

आनंद महिंद्रा ने भी नीतियों को ले कर अपरोक्ष टिप्पण्यिां की हैं. उद्योग जगत का एक तबका महसूस करता है कि कुछ खास घरानों को निगाह में रख कर नीतियां बनाया जा रही हैं. यह अहसास पिछले तीन सालों में कुछ ज्यादा ही गहरा हुआ है. जब राहुल बजाज ने खुल कर अमित शाह की उपस्थिति में तीखी बात की थी और उस पर खूब तालियां भी बजी थीं.

इसे भी पढ़ेंः रांची के कोचिंग संस्थानों की लूट कथा 7: न मॉनिटरिंग करने वाली संस्था और न ही है नियमावली

अर्थिक विशेषज्ञों के एक बड़े समूह ने कई तरह से कहा है कि सरकार वास्तविकताओं का सही मूल्यांकन नहीं कर रही है. खास कर किसान और श्रमिक सरकार की घोषणाओं को ले कर जानकार प्रभावित नहीं हैं. श्रमिकों के लिए सरकार ने जिस तरह के राहत पैकेज की बात की है उससे उनकी माली हालत बदलने नहीं जा रही है. किसानों के लिए घोषणाओं के बावजूद कृषि संकट से इन्हें बाहर निकालना आसान नहीं है.

तमाम घोषणाओं में खेतीहर मजदूरों और बंटाईदारों के हितों की उपेक्षा हुई है. जबकि भारतीय कृषि के वे ही रीढ हैं. अजीम प्रेम जी यूनिवर्सिटी के शोधपत्र  ‘सेंटर फॉर सस्टेनेबल एंप्लॉयमेंट’ द्वारा जारी अध्ययन में बताया गया है कि कोविड-19 व लॉकडाउन ने कृषि आय को भी बुरी तरह प्रभावित किया. लगभग 15 प्रतिशत किसान अपनी उपज को बेचने में असमर्थ थे, जबकि 37 प्रतिशत किसान अपनी फसल नहीं काट सकते थे.

यह सब श्रम की कमी, कृषि यंत्रों की कमी और परिवहन बाधाओं के कारण हुआ. लगभग 37 प्रतिशत किसानों ने अपनी फसलें कम कीमत पर बेचीं. उनमें से केवल 12 प्रतिशत ही अपनी रबी फसलों को नियमित या अधिक कीमत पर बेच पाए. इस रिपोर्ट के अनुसार सर्वे में शामिल 688 भूमि वाले किसानों में से केवल एक चौथाई को पीएम-किसान योजना के माध्यम से उनके खातों में नकद राशि प्राप्त हुई. यह शोध रिपोर्ट बताती है कि किसान योजना का लाभ अधिकांश लोगों तक पहुंच ही नहीं पाया है.

इसे भी पढ़ेंः ‘रजनीगंधा’, ‘छोटी सी बात’ जैसी मशहूर फिल्मों के निर्देशक बासु चटर्जी का 93 साल की उम्र में निधन

किसान पहले से ही कर्ज में डूबे हुए हैं. और 20 लाख करोड़ के पैकेज में उन पर नए कर्ज थोपने की बात की गयी है. किसान नेताओं का कहना है कि इसका लाभ बड़े किसान को ही मिल सकेगा. मध्यम और सीमांत किसानों के लिए इससे मुसीबत ही बढ़ेगी. कृषि को इस समय संकटों से बाहर लाने की जरूरत है. पिछले तीन वित्तीय वर्षों में कृषि का योगदान जीडीपी में घटता गया है. और उसमें गति आने की संभावना भी नहीं हैं. किसान संगठनों के  बीच संशय बना हुआ है.

भारत सरकार ने निजीकरण और एफडीआई के लिए जिस तरह कोर सेक्टर को खोला है, उसे ले कर भी कुछ आर्थिक जानकार संतुष्ट नहीं हैं. प्रो रवि सिन्हा, प्रो अरूण कुमार और प्रो पटनायक तो इसे घातक कदम की तरह देख रहे हैं. हालांकि उद्योगजगत ने सरकार के सुधारों का स्वागत किया है. लेकिन मुडीज ने भारत की रैंकिग घटा का जो संकेत दिए हें उसे भी समझने की जरूरत है. कई अन्य अंतरराषट्रीय एजेंसियों ने तो भारत की रैंकिंग को ले कर पहले भी उत्साह नहीं दिखाया है.

एमके वेणु ने अपने ताजा लेख में कहा है पिछले चार सालों में हो सकता है कि हमने इन उपलब्धियों में काफी कुछ को गंवा दिया हो. क्योंकि निजी निर्माण जैसे अहम क्षेत्र, जिसमें किसानी से निकलकर आने वाले काफी श्रम बल को खपा लिया था, लगभग चरमरा गए हैं. इस बात की तस्दीक मनरेगा में काम की मांग में भारी बढ़ोतरी से होती है.

कोविड लॉकडाउन के बाद की अवधि में हम इन रुझानों को और गहरा होते हुए देख सकते हैं. समस्या को बढ़ाते हुए पिछले दो वर्षों में भारत की वृद्धि में सतत गिरावट ने एक गंभीर सार्वजनिक वित्त संकट खड़ा कर दिया है.  जिसने वर्तमान संकट से निकलने के लिए जरूरी खर्च करने की सरकार की क्षमता कम कर दी है.

अगले छह महीने में भारी-भरकम सरकारी खर्च की गैरमौजूदगी में, विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था में ज्यादा तेज गति से सुधार, जिसको लेकर प्रधानमंत्री इतने आश्वस्त नजर आ रहे हैं, असंभव लगता है. दावों और यथार्थ के बीच अंतर करना आज की जरूरत है.

इसे भी पढ़ेंः देवघर: पथरौल थाना के ASI को ACB ने किया गिरफ्तार, केस डायरी के लिए मांगी थी घूस

Telegram
Advertisement

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Related Articles

Back to top button
Close