JharkhandRanchi

लघु कुटीर बोर्ड ने 32,620 विलेज को-ऑडिनेटर्स को एक साल में ही किया बेरोजगार

  • 200 और 1000 रुपये मानेदय के बीच फंसे विलेज को-ऑडिनेटर्स, दो साल से कर रहे बकाया भुगतान के लिए संघर्ष
  • लोकसभा और विधानसभा चुनाव में 200 रुपये में किया वोलेंटियर का काम
  • शुरू में बोर्ड की ओर से पंचायती राज सर्वे कराया गया, मानदेय का दबाव बनाने पर कार्य मुक्त किया गया

Ranchi: रघुवर सरकार ने ग्रामोउत्पादों को प्रोत्साहित करने और रोजगार सृजन के लिए मुख्यमंत्री लघु एवं कुटीर उद्यम विकास बोर्ड का गठन किया था, पर इससे न ही रोजगार सृजन हुआ और नही ग्रामोत्पादों को प्रोत्साहन मिला.

गठन के मात्र डेढ़ साल बाद ही बोर्ड रोजगार सृजन करने में असफल साबित हुई. नवंबर 2017 में बोर्ड की ओर से 32,620 विलेज को-ऑडिनेटर्स की नियुक्ति की गयी. लेकिन साल 2018 में ही तत्कालीन सरकार की ओर से इन्हें बेरोजगार कर दिया गया.

पिछले दो साल से ये विलेज को-ऑडिनेटर्स अपने बकाया मानदेय की मांग कर रहे हैं. पूर्व की सरकार के दौरान भी जब विलेज को-ऑडिनेटर्स ने बोर्ड से मानदेय की मांग की तो, उनसे काम न लेने का आदेश बोर्ड की ओर से जारी किया गया.

इन विलेज को-ऑडिनेटरर्स की नियुक्ति जिला को-ऑडिनेटर्स की ओर से मौखिक रूप से की गयी. वो भी बोर्ड के आदेश पर.

इसे भी पढ़ें – #DelhiElection से पहले डिप्टी CM सिसोदिया के OSD गिरफ्तार, घूस लेने के आरोप में CBI ने किया अरेस्ट

हर सर्वे पर दो सौ रुपये देने की बात सीईओ ने की थी: जब बोर्ड की ओर से डिस्ट्रिक्ट, ब्लॉक और विलेज को-ऑडिनेटर्स की नियुक्ति साल 2017 में की गयी, तब बोर्ड की सीईओ रेणु गोपीनाथ पणिक्कर थीं.

कुछ डिस्ट्रिक्ट को-ऑडिनेटर्स ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि नियुक्ति के बाद विलेज को-ऑडिनेटरर्स से पंचायती राज विभाग के बीपीएल-एपीएल सर्वे का काम कराया गया. इसके बदले उन्हें कोई मानदेय नहीं मिला.

तत्कालीन सीईओ पर को-ऑडिनेटर्स ने दबाव बनाया गया, जिसके बाद ब्लॉक को-ऑडिनेटर्स के साथ बैठक कर ग्राम संयोजकों को एक गांव के सर्वे पर दो सौ रुपये देने की बात कही गयी. लेकिन उनके तबादले के बाद बोर्ड की ओर से इन्हें मानदेय नहीं मिला. न ही किसी स्तर पर पहल की गयी.

मुख्य सचिव ने की थी एक हजार देने की बात

सीईओ रेणु गोपीनाथ पणिक्कर के दो सौ रुपये प्रति गांव के सर्वे पर देने की बात से विलेज को-ऑडिनेटर्स असंतुष्ट थे. 11 दिसंबर 2017 को तत्कालीन मुख्य सचिव राजबाला वर्मा ने बोर्ड के डिस्ट्रिक्ट को-ऑडिनेटरर्स और ब्लॉक को-ऑडिनेटरर्स के साथ बैठक की.

इसमें विलेज को-ऑडिनेटरर्स को प्रति माह एक हजार रुपये दिये जाने का निर्णय लिया गया. सीएस के निर्देश के बाद आनन-फानन में ग्राम संयोजकों की सूची, बैंक खाता आदि जमा करके बोर्ड को दिया गया, लेकिन इसके बाद भी ग्रामीणों को पैसा नहीं दिया गया.

इसे भी पढ़ें – लोकसभा में सांसदों के बीच धक्का-मुक्की, राहुल के डंडा वाले बयान पर जबरदस्त हंगामा

एकाएक दिया काम नहीं लेने का आदेश

विभिन्न डिस्ट्रिक्ट को-ऑडिनेटर्स ने बताया कि जब विलेज को-ऑॅडिनेटर्स अपने मानदेय के लिए जोर देने लगे, तो अचानक बोर्ड की ओर से इन कर्मचारियों से काम नहीं लिये जाने का निर्देश दिया गया.

आदेश साल 2018 में जारी किया गया. इससे ग्राम संयोजक बेरोजगार तो हुए ही, उनका पैसा भी बकाया रह गया. साल 2018 में सरकार की ओर से एक करोड़ 60 लाख रुपये का आवंटन विलेज को-ऑडिनेटरर्स के लिए किया गया, लेकिन बोर्ड ने पैसे सरकार को सरेंडर कर दिये.

बता दें सरकार की ओर से राशि आवंटित करने के पूर्व ही बोर्ड की ओर से डिस्ट्रिक्ट को-ऑडिनेटर्स को आदेश दिया गया कि विलेज को-ऑडिनेटर्स से काम नहीं लिया जायेगा.

काम के आधार पर मानदेय देने की बात थी

वहीं को-ऑडिनेटर संघ के अध्यक्ष रंजीत प्रसाद राय ने बताया कि विलेज को-ऑडिनेटर्स की नियुक्ति काम के आधार पर की गयी. मतलब काम के आधार पर ही मानदेय देने की बात की गयी थी. नियुक्ति के वक्त बोर्ड की अध्यक्ष रेणु गोपीनाथ पणिक्कर थीं.

श्री राय ने बताया कि इनसे लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में ग्राम स्तर पर वोलेंटियर का काम लिया गया. जिसके बदले सिर्फ दो सौ रुपये दिये गये. जबकि इनका बकाया भुगतान दो साल से लंबित है.

इसे भी पढ़ें – #BCCL की गोविंदपुर एरिया 3 के ओरियंटल आउटसोर्सिंग में सीबीआइ और विजिलेंस का छापा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

Back to top button