
New Delhi : फ्रांस सरकार ने कहा है कि राफेल लड़ाकू विमानों के अरबों डॉलर के करार के लिए भारतीय औद्योगिक साझेदार चुनने के मामले में वह किसी भी तरीके से शामिल नहीं रही है. इससे पहले पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने कथित रुप से कहा था कि भारत ने ही इन करार के लिए भारतीय साझेदार के तौर पर रिलायंस डिफेंस के नाम का प्रस्ताव रखा था. उनके इस बयान से राजनीतिक विवाद गहरा गया.
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रिलायंस डिफेंस के नाम का प्रस्ताव भारत सरकार ने ही रखा
फ्रांस सरकार ने कहा कि फ्रांस की कंपनियों को इस करार के लिए भारतीय कंपनियों को चुनने की पूरी आजादी है. उधर, राफेल के विनिर्माता दसाल्ट एविएशन ने कहा है कि उसने राफेल करार के लिए स्वयं ही रिलायंस डिफेंस लिमिटेड से साझेदारी का फैसला किया था. फ्रांस सरकार और फ्रांसीसी एविएशन ने अलग अलग तब बयान जारी किया है जब फ्रांस के मीडिया में पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के हवाले से कहा गया कि 58,000 करोड़ रुपए के राफेल करार में दसाल्ट एविएशन के लिए साझेदार के तौर पर रिलायंस डिफेंस के नाम का प्रस्ताव भारत सरकार ने ही रखा था और फ्रांस के पास कोई अन्य विकल्प नहीं था.
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36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के करार की घोषणा की थी
फ्रांसीसी वेबसाइट ‘मीडियापार्ट’ द्वारा उद्धृत ओलांद के सनसनीखेज बयान से इस विवाद में एक नया मोड़ आ गया है क्योंकि भारत सरकार अब तक कहती रही है कि उसे आधिकारिक रुप से इस बात की जानकारी नहीं थी कि दसाल्ट एविएशन ने इस करार की ऑफसेट शर्त को पूरा करने के लिए भारतीय साझेदार के तौर पर किसे चुना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 अप्रैल 2015 को पेरिस में फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति ओलांद के साथ वार्ता करने के बाद 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के करार की घोषणा की थी.
भारत सरकार ने इस सेवा समूह का प्रस्ताव किया था
फ्रांस सरकार ने एक बयान में कहा, ‘‘फ्रांसीसी कंपनियों की ओर से चुने गए/चुने जा रहे या चुने जाने वाले भारतीय औद्योगिक साझेदारों के चयन में फ्रांसीसी सरकार किसी भी तरीके से शामिल नहीं रही है.’ ‘मीडियापार्ट’ ने अपनी एक खबर में ओलांद के हवाले से कहा था, ‘‘भारत सरकार ने इस सेवा समूह का प्रस्ताव किया था और दसाल्ट ने अंबानी से बातचीत की थी. हमारे पास कोई विकल्प नहीं था, हमने उस वार्ताकार को अपनाया जो हमें दिया गया था.’’
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रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को फायदा पहुंचाने के आरोप लगाते रहे हैं
ओलांद के कथित बयान पर रक्षा मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा, ‘‘यह बात दोहरायी जाती है कि न तो सरकार और न ही फ्रांस सरकार वाणिज्यिक फैसले में किस भी रुप से शामिल थी. इस बीच एनडीटीवी ने खबर दी है कि ओलांद के कार्यालय ने कहा है कि वह मीडियापार्ट में छपे अपने बयान पर अडिग हैं.
ओलांद का बयान सामने आने के बाद विपक्षी पार्टियों ने राफेल करार को लेकर मोदी सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं. वे करार में भारी अनियमितता और रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को फायदा पहुंचाने के आरोप लगाते रहे हैं. उनका कहना है कि एयरोस्पेस क्षेत्र में रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को कोई अनुभव नहीं है, लेकिन फिर भी सरकार ने अनुबंध उसे दे दिया.
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रक्षामंत्री मोदी को बचाने के लिए झूठ बोल रहे हैं
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, ‘‘अब प्रधानमंत्री के लिए महत्वपूर्ण यह है कि वह या तो ओलांद के बयान को स्वीकार करें या कहें कि वह झूठ बोल रहे हैं या फिर वह बताएं कि सच क्या है.’’ उन्होंने कहा कि राजग के विभिन्न रक्षामंत्री मोदी को बचाने के लिए झूठ बोल रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं? यह रक्षाबलों से जुड़ा मामला है, यह भ्रष्टाचार से जुड़ा मामला है. फ्रांसीसी कंपनी ने कहा, ‘‘रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) 2016 के नियमन के अनुसार इस ऑफसेट अनुबंध की आपूर्ति की गई. इस ढांचे में और ‘मेक इन इंडिया’ नीति के अनुसार, दसाल्ट एविएशन ने भारत के रिलायंस समूह के साथ साझेदारी का फैसला किया है. यह दसाल्ट एविएशन की पसंद है.’’
फ्रांसीसी सरकार ने कहा, ‘‘भारत की अधिग्रहण प्रक्रिया के अनुसार, फ्रांसीसी कंपनियों को ऐसी भारतीय साझेदार कंपनियां चुनने की पूरी आजादी है जिन्हें वे सबसे प्रासंगिक समझती हों, फिर ऐसी ऑफसेट परियोजनाओं को भारत सरकार की मंजूरी के लिए पेश करें जिन्हें वे भारत में इन स्थानीय साझेदारों के साथ मिलकर लागू करना चाहती हों.’कांग्रेस राफेल सौदे में बड़े पैमाने पर अनियमितता का आरोप लगाती रही है. कांग्रेस का आरोप है कि उसकी अगुवाई वाली पिछली संप्रग सरकार जब 126 राफेल विमानों की खरीद के लिए सौदा कर रही थी तो प्रत्येक राफेल विमान की कीमत 526 करोड़ रुपए तय हुई थी, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार के समय हुए करार में प्रत्येक राफेल विमान की कीमत 1,670 करोड़ रुपए तय की गई.
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राफेल करार की घोषणा किए जाने से महज 12 दिन पहले बनाई गई
कांग्रेस ने यह आरोप भी लगाया कि सरकार इस सौदे के माध्यम से रिलायंस डिफेंस को फायदा पहुंचा रही है. रिलायंस डिफेंस ने इस सौदे की ऑफसेट जरुरतों को पूरा करने के लिए दसाल्ट एविएशन के साथ संयुक्त उपक्रम स्थापित किया है. विपक्षी पार्टियों ने आरोप लगाया है कि रिलायंस डिफेंस 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से राफेल करार की घोषणा किए जाने से महज 12 दिन पहले बनाई गई. रिलायंस ग्रुप ने आरोपों को नकारा है.
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अनुबंध मूल्य का कम से कम 30 फीसदी हिस्सा खर्च करना होता है
फ्रांस सरकार ने कहा कि उसने 36 राफेल विमानों की आपूर्ति के लिए भारत के साथ जो अंतर-सरकारी करार किया, उसका संबंध पूरी तरह विमानों की आपूर्ति और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की उसके दायित्वों से है. उसने बयान में कहा, ‘जैसा कि होता है, फ्रांसीसी कंपनियां भारतीय कानूनों के ढांचों में पहले ही कई भारतीय सार्वजनिक और निजी कंपनियों के साथ करार कर चुकी है.’ कांग्रेस सरकार से इस बात का जवाब मांग रही है कि सरकारी कंपनी एचएएल को इस करार में शामिल क्यों नहीं किया जैसा कि संप्रग के समय तय हुआ था. भारत की ऑफसेट नीति के तहत विदेशी रक्षा कंपनियों को कुल अनुबंध मूल्य का कम से कम 30 फीसदी हिस्सा भारत में खर्च करना होता है. यह खर्च उपकरणों की खरीद या शोध एवं विकास सुविधाओं की स्थापना के मद में करना होता है.




