
Chhaya
Ranchi : कांके डैम में मछलियों के मरने की खबर ने एक बार फिर से राजधानीवासियों के मन में यह आशंका उत्पन्न कर दी है कि क्या राजधानी में डैम का पानी पीने योग्य है. अधिकारियों ने मछलियों के मरने का कारण पानी में ऑक्सीजन की कमी को बताया है. शहर के बीचोंबीच स्थित कांके डैम में ऑक्सीजन की कमी का मुख्य कारण प्रदूषण है. कांके डैम में मछलियों के मरने की घटनाएं कई बार हो चुकी हैं. इसके बावजूद इसके रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया जाता है.
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एक सप्ताह पहले से आ रही थी दुर्गंध
डैम के आस-पास रहनेवाले लोगों ने सप्ताह भर पूर्व डैम से दुर्गंध आने की बात उठायी थी. स्थानीय लोगों ने पर्यावरणविदों को भी इसकी सूचना दी, जिसके बाद सोशल मीडिया में इस मुद्दे को उठाया गया. लेकिन, इसके बाद भी डैम से दुर्गंध आने की बात को डैम प्रबंधन ने प्रमुखता से नहीं लिया, जिसके बाद शुक्रवार को मरी हुई मछलियों को डैम के तल पर देखा गया.
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पहले भी हो चुकी हैं घटनाएं
राजधानी में मछलियों के मरने की घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं. कांके डैम समेत कई जलाशयों में ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, तो वहीं प्रत्येक साल में दो बार बड़ा तालाब की मछलियां भारी संख्या में प्रदूषण के कारण मरती हैं.
रासायनिक तत्वों की अधिकता है डैम में
पर्यावरणविद डॉ नीतीश प्रियदर्शी ने बताया कि कांके डैम शहर के बीचोंबीच स्थित है. यहां पानी में भारी मात्रा में रासायनिक तत्व पाये जाते हैं, जिनमें आर्सेनिक, मर्करी, प्लास्टिक डाइऑक्सीन आदि रसायन पाये जाते हैं. शहर में नाली व्यवस्था ठीक नहीं होने के कारण ऐसी स्थिति जलाशयों में पायी जाती है. उन्होंने बताया कि नगर में सीवरेज-ड्रेनेज के नाम पर नाली तो बना दी गयी है, लेकिन उसके लिए उचित व्यवस्था नहीं है, जिससे डैम के पानी और जीवों को क्षति पहुंच रही है. शहर में जितने भी जलाशय हैं, उनकी स्थिति यही है.
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जलकुंभी है प्रदूषण का संकेत
डॉ प्रियदर्शी ने बताया कि सप्ताह भर पूर्व से ही डैम से दुर्गंध आने लगी थी, जिसे आस-पास के लोगों ने बताया. सोशल मीडिया में पोस्ट करने के बाद भी प्रशासन की ओर से उक्त विषय में कुछ नहीं किया गया. जबकि, किसी भी जलाशय से दुर्गंध आने का अर्थ है वहां पानी में ऑक्सीजन कम हो रहा है. ऑक्सीजन की कमी भी मुख्यत: पानी में रासायनिक तत्वों के बढ़ने से होती है. जल प्रदूषण का अन्य संकेत पानी में जलकुंभी का निकलना है. ऐसी स्थिति में स्वतः जलीय जीव मरते ही हैं.
ब्लीचिंग और क्लोरीन का छिड़काव भी सीमित हो
डॉ प्रियदर्शी ने बताया कि डैम के दूषित होने पर अधिक ब्लीचिंग और क्लोरीन का प्रयोग नहीं किया जा सकता. क्योंकि, इन रसायनों के अधिक प्रयोग से भी जलीय जीवों के मरने की आशंका रहती है. उन्होंने कहा कि डैम में ऑक्सीजन की कमी और प्रदूषण से मछलियों का मरना और उसके बाद प्रशासन की ओर से इसकी रोकथाम के लिए डैम में ऑक्सी टैबलेट डालना प्राथमिक उपचार के समान है. इसके पूर्व भी डैम में ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन इसके लॉन्ग टर्म उपचार पर कभी ध्यान नहीं दिया गया. जबकि डैम में बार-बार मछलियों का मरना साबित करता है कि यहां प्रदूषण स्तर समय-समय में काफी बढ़ जाता है.
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सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की व्यवस्था हो
डॉ प्रियदर्शी ने कहा कि शहर के जलाशयों को बचाना वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जरूरी है, क्योंकि गर्मियों में जल संकट का सामना लोगों को करना पड़ता है. प्रशासन को चाहिए कि एक माह में कम से कम दो बार जलाशयों का लैबोरेटरी टेस्ट हो, जिससे पानी की गुणवत्ता का पता लगाया जा सके. इसके साथ ही नालियों से आनेवाले पानी के सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट के माध्यम से शुद्धीकरण की व्यवस्था की जाये, ताकि जलाशय में पानी प्रदूषित न हो.
सलाह नहीं लेती सरकार
डॉ प्रियदर्शी ने बताया कि राज्य के पर्यावरणविदों को दूसरे राज्यों में बुलाकर सरकार सलाह लेती है, जबकि अपने राज्य में सरकार सिर्फ योजना और नियम लागू करती है. यहां विशेषज्ञों से सलाह नहीं ली जाती, जिसके कारण ऐसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं. जबकि, सरकार को चाहिए की इन मुद्दों को संजीदगी से ले, क्योंकि जलसंकट पूर्व से ही गंभीर है.
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सरकार करे समुचित व्यवस्था
उन्होंने कहा कि राज्य में सरकार जल संसाधन और मत्स्य पालन को प्रोत्साहित कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत देखी जाये, तो सरकारी योजनाएं दम तोड़ती नजर आती हैं. प्रशासन को चाहिए कि तालाबों की साफ-सफाई की व्यवस्था दुरुस्त करे, समय-समय पर जलाशयों की सफाई होती रहे, चप्पू वाली बोटिंग को प्रोत्साहित करे, क्योंकि इससे जलाशय दूषित नहीं होगा, साथ ही पानी में चप्पू चलाने से हवा के माध्यम से पानी में ऑक्सीजन की कमी को दूर किया जा सकता है.




