
Ranchi : कोविड से राहत मिलने के बावजूद कई लोगों को अस्पताल जाना पड़ रहा है. उन्हें ब्लैक फंगस के संक्रमण से जूझना पड़ रहा है. ब्लैक फंग्स से बचाव और उपचार को समझना अब जरूरी हो गया है, क्योंकि इसकी चपेट में आनेवालों की संख्या बढ़ती जा रही है. साइनस, नाक का बहना, नोज ब्लॉकेज, नाक के अंदर पपड़ी पड़ना, फेस के एक तरफ सूजन होना, स्टूल में खून, पेट में दर्द और डायरिया समेत, बुखार और आंख के नीचे काले धब्बे ब्लैक फंगस के लक्षण हैं. शुरुआती दौर में ही इसे पहचान लिया गया तो आसानी से इसका इलाज संभव है, लेकिन देरी होने पर ये बीमारी 46 से 95 फीसदी तक घातक हो सकती है. जिस अंग को ब्लैक फंगस संक्रमित करता है उसे ऑपरेट कर हटाना मजबूरी बन जाती है. वहीं कई मामलों में मौत से बचा पाना भी मुश्किल होता है.
सदर अस्पताल के डॉक्टर एसके मंडल ने कहा कि ब्लैक फंगस का प्रभाव ब्रेन, आंख और चेहरे पर काफी घातक होता है. कोरोना से बीमार रोगी को स्टेरॉयड दिया जा रहा है. जिन लोगों को भी स्टेरॉयड दिया गया है उन्हें बीटाडीन से गार्गल करना चाहिए. जिन लोगों को ऑक्सीजन दिया गया है उऩ्हें स्टीम (भाप) लेना चाहिए. जो लोग अब भी ऑक्सीन ले रहे हैं उनके नैजल प्रॉंग्स का बदलना भी जरूरी है. सबसे महत्वपूर्ण है शुगर को कंट्रोल में रखना. ये सभी उपाय ब्लैक फंगस से बचने के लिए जरूरी हैं.
इसे भी पढ़ें – 1345 नये कोरोना संक्रमित मिले, 4375 ठीक हुए, 37 की मौत
ब्लैक फंगस क्या है और कैसे फैलता है
ब्लैक फंगस म्यूकर माइकोसिस से फैला रोग है जबकि म्यूकर माइकोसिस फंगी का एक रूप है. इसे ऑप्ररच्यूनिस्टिक इंफेक्शन कहते हैं. इसकी वजह ये है कि जैसे ही शरीर की इम्यूनिटी कमजोर होती है, इसके फैलने का खतरा बढ़ जाता है. दरअसल ये म्यूकर माइकोसिस मिट्टी, सड़े हुए फल, सब्जी और गीली जगह में ज्यादा पनप सकता है. इसलिए आइसीयू में जहां गीलापन यानी ऑक्सीजन और इंट्रावीनस फ्लूड दिये जाने की जरूरत ज्यादा पड़ती है, वहां इसके पनपने का खतरा ज्यादा रहता है.
इसे भी पढ़ें – कोरोना से मरनेवाले कर्मियों के परिजनों को टाटा स्टील कंपनी सेवा काल तक का वेतन देगी



