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दर्द-ए-पारा शिक्षक: फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की नौकरी छोड़ बने पारा शिक्षक, अब मानदेय के अभाव में बने कर्जदार

समय मिलने पर वीडियोग्राफी करते हैं, उसी से घर चलता है

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Chhaya

Ranchi : किस्मत इंसान को कहीं भी ले जाती है. अच्छी खासी नौकरी छोड़कर अगर कोई ऐसी नौकरी करने लगे जहां उसे अपने दैनिक उपयोगी वस्तुओं के लिए तरसना पड़े, तो इसे किस्मत की मार ही कहेंगे. कुछ ऐसी ही कहानी पारा शिक्षक महेश्वर महतो की है. महेश्वर साल 2003 से 2006 तक फॉरेस्ट डिर्पाटमेंट में काम करते थे. इसके बाद साल 2006 में इन्होंने पारा शिक्षक की नौकरी पकड़ी. इसके बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की नौकरी में सम्मान नहीं था. शिक्षक की नौकरी में अधिक सम्मान है, लोगों के बीच पहचान है, इसी उम्मीद से पारा शिक्षक की नौकरी पकड़ी.

महेश्वर ने बताया कि फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में पेड़- पौधों को चिन्हित कर, नर्सरी तैयार करना था. जिसके लिए चार हजार रूपये महीने में और इसके साथ प्रतिदिन चावल और दाल भी मिलते थे. लेकिन सप्ताह के सातों दिन काम करने पड़ते थे. वहीं पारा शिक्षक की नौकरी जब ज्वाइन की तब पचीस सौ मानदेय मिलता था.

अब तेरह हजार मानदेय मिलता है. उन्होंने कहा कि फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में अभी भी रहते तो वेतन अधिक रहती. लेकिन नौकरी छोड़कर अब अफसोस होता है. घर की स्थिति तो ऐसी है कि कहा नहीं जा सकता. वर्तमान में ये उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय बेनियाजरा के शिक्षक हैं.

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मूलभूत आवश्यकताएं ही पूरी हो सकती हैं

पारा शिक्षक के मानदेय के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि मानदेय पर्याप्त नहीं है. सिर्फ इतना हो पाता है कि मूलभूत आवश्यकताएं ही पूरी हो पाती हैं. बच्चों और माता-पिता की मूलभूत आवश्यकताएं ही पूरी हो पाती हैं. इसके बारे में बात करते हुए इन्होंने कहा कि घर चलाने के लिए समय मिलने पर वीडियोग्राफी करते हैं. समय अधिक मिल नहीं पाता.

महेश्वर का कहना है कि गांव में शादी होने पर ही लोग वीडियोग्राफी कराते हैं, हमेशा तो इस तरह के काम मिलते नहीं हैं. इससे किसी खास अवसरों पर ही वीडियोग्राफी करने पर दो-तीन हजार रुपये का ही लाभ हो पाता है. वर्तमान में पारा शिक्षकों की जो स्थिति है, उससे संतोष तो नहीं है. छह-छह माह रोक के एक माह का मानदेय दिया जाता है. मानदेय नियमित मिले तो भी हर जरूरत पूरी नहीं हो सकती. बच्चों की इच्छाएं पूरी नहीं हो सकती हैं और न ही कोई बड़ी जरूरत. क्योंकि हमारे पास इतना पैसा है नहीं.

परिवार में माता-पिता, पत्नी और दो बच्चे हैं. इन्होंने बताया कि इनके घर में थोड़ी बहुत खेती बाड़ी होती है. वहीं वीडियोग्राफी से पैसे बचा कर रखते हैं, जिससे सालभर गुजारा चलता है.

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टीबी, कर्ज लेकर इलाज कराया

घर की स्थिति बताते हुए महेश्वर ने कहा कि फरवरी से मानदेय बंद है. इधर वीडियोग्राफी भी नहीं हो पायी, क्योंकि गर्मी छुट्टी के पहले भी स्कूल सुबह ही लगती थी. ऐसे में इस लगन के दौरान समय नहीं मिल पाया. मां को टीबी और मुझे शुगर है. बीते माह काफी तबीयत खराब हो गयी थी. रिम्स ले गया तो वहां एडमिट कराके इलाज कराना पड़ा. इलाज कराने के लिए पैसे नहीं थे तो ऐसे में एक दोस्त से 24,000 कर्ज लेकर मां का इलाज कराया. इसके साथ ही मां की बीमारी के लिए धान तक बेचने पड़े, क्योंकि दूसरा कोई विकल्प नहीं था.

महेश्वर ने कहा कि उधार मांगना तो अब आदत सी हो गई है. अपने बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि पिछले चार पांच साल से मुझे भी शुगर की बीमारी है. जिसमें हर महीने कम से कम हजार रूपये की दवाई लेते हैं. क्योंकि खेती-बाड़ी से हर जरूरत पूरी नहीं हो सकती है. मानदेय भी समय पर नहीं मिलता है तो ऐसे में वीडियोग्राफी ही सहारा है.

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लंबे समय तक दुकान में उधार रहने पर दुकानदार भी बोलने लगते हैं

बातचीत के दौरान महेश्वर ने कहा कि राशन कार्ड तो है. अनाज भी मिल जाता है और थोड़ी बहुत खेती बाड़ी है. जो तीन-चार माह से अधिक नहीं चल सकता. गांव के राशन दुकान से उधार में ही तेल मसाले लेते हैं. गांव घर में होने के बाद भी राशन दुकानदार कई बार बाते बोल देते हैं. हम कुछ समय बोल के उधार लेते हैं. लेकिन जो समय पैसे देने के लिए बोलते हैं, उस समय में पैसे नहीं दे पाते. ऐसे में राशन दुकानदार कहते हैं कि काफी समय हो गया है पैसा दे दिजिए. कई बार तो एक बार ही पूरा उधार मांगते हैं, जो हम चुका नहीं पाते हैं.

बच्चों की फीस की बात करते हुए महेश्वर ने कहा कि इस बार रीएडमिशन महिला समिति से दस हजार कर्ज लेकर भरें. लेकिन उससे सिर्फ रीएडमिशन और कॉपी किताब ही ले पाएं. अभी भी कुछ महीनों का फीस बकाया है.

उज्जवला योजना से गैस सिलेंडर तो मिला, लेकिन जब से मानदेय नहीं मिला है तब से गैस सिलेंडर भी नहीं भरा पाए हैं. पत्नी लकड़ी में ही खाना बनाती है. बिजली बिल भी पांच महीने से बकाया है. अप्रैल माह का मानदेय मिला, लेकिन वो कर्ज चुकाने में ही चला गया. कुछ बचत कैसे हो, यहां तो सिर पर कर्ज पहले से तैयार रहता है.

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