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दर्द-ए-पारा शिक्षक : किस-किस का मुंह बंद करें, इतना उधार है कि रातभर नींद नहीं आती

पति भी प्राइवेट स्कूल में शिक्षक हैं, वेतन सही समय पर नहीं मिलता

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Chhaya

Ranchi : उधार इस कदर बढ़ गया है कि लोगों को मुंह दिखाने का मन नहीं करता. पिछले कुछ सालों से लगातार ने मानदेय रोक दिया जा रहा है. परिवार चलाना काफी मुश्किल है. खेती बारी है नहीं. ये कहना है पारा शिक्षिका धर्मशिला महतो का. धर्मशिला साल 2009 से पारा शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं. वर्तमान में ये राज्यकीयकृत मध्य विद्यालय बीसा में कार्यरत हैं. काफी सोचते हुए उन्होंने कहा कि बहुत दिक्कत है. पति भी प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं. उन्हें भी वेतन ज्यादा नहीं मिलता और कभी भी मानदेय भी रोक दिया जाता है.

धर्मशिला ने बताया कि ससुराल वाले गेतलसूद डैम से विस्थापित थे, जो खेती बारी होती भी थी. अब तो वह भी चला गया,यदि खेती करते तो वो भी एक सहारा रहता. डैम से न ही बिजली मिलती है और ना ही सप्लाई पानी. ऐसे में तो हर स्तर पर परेशानी है. 2014 से लगातार मानदेय रोक दिया जा रहा है. पहले ऐसा नहीं होता था.

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अखबारों में मानदेय की खबर पहले आ जाती है

धर्मशिला ने बताया कि, अप्रैल माह का मानदेय सरकार ने इस बार दिया है. इसके पहले पांच माह से मानदेय बंद था. अखबार में मानदेय मिलने के पहले ही खबर आ गई कि पारा शिक्षकों को मानदेय मिल गया. ऐसे में राशन दुकानदार पहले से ही पैसे की मांग करने लगते हैं. जबकि खबर प्रकाशित होने के तीन चार दिन बाद ही मानदेय मिलता है. बार-बार राशन दुकानदार बकाया मांगते है. मुंह दिखाने का मन नहीं करता है.

कई बार तो दुकानदार कहते हैं कि पूरा पैसा दे दिजिए. ऐसे में एक दुकान से दूसरे दुकान जाना पड़ता है. कोई विकल्प नहीं है. बिजली बिल भी एक साल से बकाया है. अब तक छह हजार रूपये बिल हो गए हैं. किस-किस का मुंह बंद करें. रात में नींद नहीं आती है. स्थिति ऐसी है कि किसी को बता भी नहीं सकते. त्योहारों में स्थिति ऐसी होती है कि अगल-बगल के घरों को देखकर बच्चे तरसते हैं कि हमें भी पकवान मिलें. लेकिन परिस्थिति ऐसी नहीं है कि पूर्ति की जाए. देनदारी अधिक है और मानदेय कम.

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ससुर के अंतिम संस्कार में 60,000 उधार लिए, चुका नहीं पायी

अपनी स्थिति बताते हुए इन्होंने कहा कि फरवरी माह से मानदेय बंद है. इसी दौरान ससुर का देहांत हो गया. पति भी प्राइवेट स्कूल में हैं और हमारे पास पैसे नहीं थे. रिश्तेदारों से सहयोग लिया गया. इस दौरान भी राशन दुकान से ही उधार लेकर रिश्तेदारों को खिलाया. वहीं कर्म कांडों के लिए 60,000 उधार ली. जो अब तक नहीं चुका पायी.

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रिश्तेदार तो जानते हैं मेरे घर की स्थिति. लेकिन खुद में शर्म लगती है. कि कैसे दें पैसा. बेटी के स्कूल में तीन माह से फीस भी नहीं भरा है. गर्मी की छुट्टी थी, तो काम चल गया. लेकिन अब स्कूल खुलते ही स्कूल से नोटिस आने शुरू हो जाएंगे. पिछले दिनों बहन की बेटी की शादी थी.

बहन ने ससुर के समय में काफी सहयोग किया था. ऐसे में शादी में सहयोग करने के लिए महिला समिति से दस हजार का कर्ज अप्रैल माह में लिया था. लेकिन अब ये कर्ज कैसे चुकाउं ये समझ नहीं आता. लेकिन सहयोग तो करना था.

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गैस भराने के पैसे लकड़ी जलाकर बना रही खाना

उन्होंने बताया कि पिछले पांच महाने से गैस नहीं भरा पा रही हैं. लकड़ी और पत्ता जलाकर खाना बना रही हैं. स्कूल खुलने के बाद समस्या और बढ़ जाएगी. क्योंकि समय कम रहेगा और लकड़ी और पत्ता जलाने में समय लगता है. वहीं बेटी को भी स्कूल भेजना रहेगा. कभी-कभी कोयला भी खरीद लिया जाता है. क्योंकि रामगढ़ से कोयला बेचने वाले लोग इधर आते हैं, जो सस्ते दाम में कोयला देते हैं. ऐसे में पैसे होने पर खरीद लेती हूं.

सरकार ने स्थिति तो ऐसी कर दी है कि गांव घर में होने के कारण लोग उम्मीद भी लगाते हैं कि एक शिक्षक तो है और मुसीबत में सहयोग मिल जाएगा. लेकिन वो भी नहीं कर पाते. जबकि पति पत्नी दोनों ही शिक्षक हैं. अभी तो किसी तरह काम चल जा रहा है, लेकिन बच्चों के भविष्य की चिंता होती है.

मानदेय बहुत कम है, जरूरतें पूरी नहीं हो सकतीं

आंखें नम करते हुए इन्होंने कहा कि छोटी-मोटी जरूरत तक के लिए उधार लेना पड़ता है. अगर नियमित मानदेय मिले, तब भी जरूरतें पूरी नहीं हो सकती हैं. क्योंकि जब तक सरकार मानदेय देती है, तब तक कर्ज अधिक हो जाता है.

रिश्तेदार हैं जिन्हें देना भी जरूरी है, दुकानों में भी देना है. गेतलसूद डैम से न ही बिजली और न ही सप्लाई पानी की सुविधा मिली. अगर मिलती तो थोड़ी राहत मिलती. लेकिन किसी भी तरह से संतुष्टी नहीं है. बच्चों की जरूरतों में भी कटौती करनी पड़ती है.

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