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दर्द-ए-पारा शिक्षक: परिवार में तीन शिक्षक, सिर पर दो लाख का कर्ज-कई महीनों से घर में नहीं पकी दाल

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Ranchi: परिवार में एक या दो सदस्य अगर पारा टीचर हो तो घर की क्या हालत होती है, हमने आपको बताया. लेकिन परिवार में अगर तीन-तीन लोग पारा टीचर हो तो क्या होगा. वो भी तब जब परिवार के पास आजीविका का कोई दूसरा साधन न हो.

हमें एक ऐसा ही परिवार मिला. जिसमें दो बेटे और एक बहू पारा टीचर हैं. ये परिवार रांची जिला स्थित टाटीसिंगारी गांव में रहता है. जहां सोहन बेदिया, जीतराम बेदिया और अंजनी बाला देवी पारा टीचर हैं. जीतराम और अंजनी पति-पत्नी हैं. वहीं सोहन जीतराम के छोटे भाई हैं.

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शुरूआती बातचीत में तो सोहन ने खीझ खाते हुए अपने घर की हालत नहीं बतानी चाही. लेकिन थोड़ा वक्त देने के बाद वो सहज हुए. इन्होने बताया कि इनके परिवार का भरण-पोषण पारा टीचर की नौकरी के भरोसे है.

परिवार की थोड़ी खेती है, जिससे कम-से-कम बच्चे खा रहे हैं. नहीं तो बच्चे क्या खाते पता नहीं. स्कूल की छुट्टी होने पर बच्चे भी घर में है. जरूरत पूरी नहीं होने पर बहुत तकलीफ होती है. मां के नाम से राशन कार्ड है. अनाज मिल जाता है.

समय मिलता नहीं और न मानदेय, खेती कैसे करें

इन्होंने बताया कि स्कूल के बाद समय मिलता नहीं है. सरकारी काम भी मिलते रहते हैं, ऐसे में खेती कैसे करें. गांव में मजदूरों से खेती कराने के लिए पैसे चाहिए. यहां तो मानदेय मिलता नहीं, खेती कैसे करें.

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तीन लोग पारा टीचर हैं मानदेय समय में मिलता तो खेती कराते. सोहन ने बताया कि इनके पैर में लोहे की रड लगी है, साल 2017 में इनके साथ सड़क दुर्घटना हुई थी, इस दौरान इनकी पत्नी को भी चोट लगी थी. इस कारण से ये खेती-मजदूरी नहीं करते.

फीस के कारण स्कूल से छुट्टी नहीं मिल रही थी

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बात करते हुए उन्होंने कहा कि अपने बेटे को ये हॉस्टल में रखकर पढ़ाते हैं. क्योंकि गांव बहुत सुदूर क्षेत्र में है. गरमी छुट्टी में बच्चे को हॉस्टल से लाना था, लेकिन पैसे नहीं होने के कारण स्कूल से छुट्टी नहीं मिल रही थी.

तब एक अन्य टीचर से 15000 लेकर फीस जमा किया, फिर बच्चे को हॉस्टल से लेकर आएं. डबडबाई आंखों से उन्होंने कहा कि बहुत परेशानी में है. वहीं जीतराम अपने बच्चों को नवोदय में पढ़ाते हैं.

दो लाख से ज्यादा का उधार

इन्होंने बताया कि साल 2017 में हुई सड़क दुर्घटना के बाद इलाज के लिए इन्होंने करीब तीन लाख का उधार लिया था. दो साल बाद भी वे इस उधार को नहीं चुका पाएं हैं. उन्होंने कहा अभी भी दो लाख से ज्यादा उधार है.

जिसमें सोहन और जीतराम के 45,000, वहीं अंजनी और सोहन की पत्नी ने पचास पचास हजार का उधार ले रखा है.

पांच महीने से घर में नहीं पकी दाल

खान-पान के बारे मे बताते हुए अंजनी बाला ने बताया कि बच्चों को सही पौष्टिक भोजन भी नहीं मिल रहा है. जंगल से चाकोर कटई साग सुखा के खाते हैं. गरमी है तो चल रहा है, बरसात में क्या करेंगे. समय मिले तो सिलाई करें. पाँच माह से दाल तक नहीं खरीद पाएं हैं.

अब मन भर गया है दूसरा विकल्प ढूंढ रहे

सोहन ने कहा कि उम्मीद थी सरकार कभी-न-कभी पारा टीचर के हित में फैसला लेगी. लेकिन स्थिति बदतर होती जा रही हैं. इसलिए इस गरमी छुट्टी में एलआइसी एजेंट की ट्रेनिंग ली. कुछ क्लास अभी भी बाकी है. मानदेय काफी तो है नहीं पर नियमित मिले तो घर-परिवार मैनेज कर सकते हैं.

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