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दर्द-ए-पारा शिक्षक: उम्र का गोल्डेन टाइम इस नौकरी में लगा दिया, अब कर्ज में डूबे हैं

उमा ने कहा आदत हो गई है मानदेय देर से मिलने की और कर्ज में मानदेय खत्म होने की

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Ranchi: भविष्य बेहतर हो इसी उम्मीद के साथ पारा शिक्षक की नौकरी पकड़ी. लेकिन पिछले चार- पांच सालों में पारा शिक्षकों की स्थिति दयनीय हो गई है. इनकी बहुत सी समस्याएं हैं और सबकुछ कैसे बताएं. ये कहना है पारा शिक्षक उमा शंकर दास का, जो साल 2002 से पारा शिक्षक की नौकरी कर रहे हैं. वर्तमान में ये उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय चायबगान में कार्यरत हैं. इनके परिवार में इनसे बड़े दो भाई हैं, जो मजदूरी करते हैं. साथ ही इनकी एक छोटी बहन और माता-पिता हैं.

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अपने बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि परिवार बड़ा है. भाईयों की आमदनी इतनी है नहीं, ऐसे में मेरे उपर परिवार निर्भर है. इसलिए स्कूल से समय मिलने पर बगल की दुकान में मदद करते हैं, जिससे डेढ़-दो सौ रूपये की कमाई हो जाती है. इससे उपरी खर्च निकल जाते हैं.

वहीं भाईयों से भी थोड़ी मदद मिल जाती है. पैसा सही समय पर नहीं मिलने से काफी तनाव भी हो जाता है. पिछले कई सालों से घर मरम्मत कराना है, वो भी नहीं हो पा रहा. एक बारिश होते ही घर में सब कुछ इधर-उधर करना पड़ता है. छोटी बहन भी स्नातक पूरी करके घर में है. घर वाले चाहते हैं, उसे प्रोफेसनल कोर्स कराऊं, लेकिन यहां उधार से छुटकारा मिले तब तो.

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आदत हो गयी है, मानदेय से कर्ज चुकाने की

मानदेय की बात करते हुए इन्होंने कहा कि आदत हो गई है कि, जो भी मानदेय मिलता है वो कर्ज चुकाने में ही खर्च हो जाते हैं. उमा का कहना है कि हमेशा का यही है, पारा शिक्षकों का मानदेय रोक दिया जा रहा है. खराब भी लगता है, लेकिन क्या करें. स्थिति ऐसी हो जाती है कि पास पड़ोस से या रिश्तेदारों से कर्ज लेना ही होगा.

अब तो रिश्तेदार भी समझने लगे हैं. लोग कतराते हैं कर्ज देने से. क्योंकि जिस समय हम वापस करने की बात कहते हैं, उसे समय से वापस नहीं करते. समय अधिक हो जाता है. जरूरतें सबकी हैं. ऐसे में मानदेय से घर परिवार चलाना काफी मुश्किल है. राशन दुकानदार भी उधार नहीं देना चाहते हैं. कई बार पैसे के लिए पूछते हैं. लेकिन आस पड़ोस के होने के कारण काम चल जाता है. इन्होंने बताया कि राशन दुकान में इनका 6551 रूपये बकाया है. दुकानदार भी हमेशा उधार को लेकर बोलते रहते हैं. गैस तो भरा नहीं पाते, अब भाभियां लकड़ी पर ही खाना बना रही हैं.

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लोग कहते हैं टैलेंट की बात, सुदूर गांव में किसे पढ़ाएं ट्यूशन

समाज की बात करते हुए इन्होंने कहा कि पारा शिक्षक होना ही गुनाह है. लोग तरह-तरह की बातें कहते हैं. तब ऐसा लगता है कि क्यों पारा शिक्षक की नौकरी ज्वाइन की. उमा कहते हैं कि जिस वक्त ये नौकरी ज्वाइन किया था तो सरकारी क्षेत्र होने की वजह से ही इस नौकरी में आया था. साथ ही बेहतर भविष्य की कल्पना थी.

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स्कूल से घर और घर से स्कूल. इस बीच कुछ समय घर की जरूरतों को पूरा करने में भी देना पड़ता है. स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के अलावा और भी दायित्व होते हैं. लोग कहते हैं कि तुम में टैलेंट नहीं है. इतने काबिल हो तो नौकरी छोड़ दो. लेकिन 17 साल हो गए, नौकरी करते हुए. अब तो उम्र बीत गई इस नौकरी में और अब क्या करें. लोग ट्यूशन पढ़ाने की बात करते हैं. पारा शिक्षक ऐसे-ऐसे गांवों में है, जहां बच्चों को घर से निकालकर स्कूल ले जाना ही बहुत बड़ी बात है.

ऐसे में उन गांवों में ट्यूशन पढ़ाकर कितनी कमाई होगी कि जरूरत पूरी हो. लोग ये समझते नहीं. सरकार का ऐसे भी निर्देश हैं कि सरकारी शिक्षक ट्यूशन नहीं पढ़ा सकते और पढ़ाते भी हैं, तो उपर की कक्षाओं के छात्रों को. गांव में इस उम्र के बच्चों का मिलना मुश्किल है. ये भी बात है कि अगर बच्चे इतने सक्षम होते की ट्यूशन पढ़ लें तो सरकारी स्कूल में बच्चे क्यों आते.

पूरी तरह से सरकारी नहीं होने के कारण डर लगा रहता है

सरकारी आदेशों की बात करते हुए उमा ने कहा कि जिस सरकारी आदेश में खर्च की बात होती है, उससे परेशानी और बढ़ जाती है. मोबाइल तो हमने रखा है, लेकिन इसके खर्च को मैनेज करना मुश्किल है. सरकारी शिक्षकों के साथ ऐसी परेशानी नहीं है. पारा शिक्षक तो पूरी तरह से सरकारी भी नहीं है. ऐसे में विभागीय कार्रवाई हम पर जल्दी होती है.

जिसके डर से हम हर आदेश का पालन करते हैं. तीन साल पहले पारा शिक्षकों के लिए यूनिफॉर्म  बनवाने का निर्देश दिया गया था. इस दौरान मैंने भी चार पांच कपड़े बनवाये. जो आज तक पहनते हैं. दूसरे कपड़े बनवा ही नहीं सकते क्योंकि इतनी आमदनी नहीं है. अब किसी भी शादी, पार्टी या अन्य समारोह में इसी पोशाक को पहनकर जाते हैं.

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पार्ट टाइम नौकरी करते देख लोग पूछते हैं सवाल

पार्ट टाइम नौकरी करते देख लोग सवाल पूछने लगते हैं. कहते हैं कि स्कूल में शिक्षक हैं और फिर मजदूरी दिहाड़ी करते हैं. ऐसे में बहुत खराब लगता है. मानदेय की स्थिति तो ऐसी है कि किसी त्योहार के पहले या बाद में ही मिलती है. ऐसे में घर में मां को उम्मीद लगी रहती है कि घर में अच्छे से त्योहार मने. लेकिन पैसों के अभाव में हम त्योहार भी अच्छे से नहीं मना पाते हैं. त्योहार भी बहुत कुछ सोचकर मनाना पड़ता है.

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