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दर्द-ए-पारा शिक्षक: खुद का घर खर्च तो कर्जे से चलता है, अब मिड डे मील के लिए भी उधार पर निर्भर हैं मालती

स्कूल से छुट्टी के बाद जंगल में लकड़ी इकट्ठा कर गांव और बाजार में बेचती है, धान का भूसा भी बेचती है

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Chhaya

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Ranchi . मानदेय नहीं मिलना और ऊपर से मीड डे मील भी उधार में चलाना. अकेली महिला और परिवार का भार. ये वास्तविक स्थिति है, अनगढ़ा ब्लॉक के चंद्राटोली की पारा शिक्षिका मालती देवी की. जो खुद तो अपने परिवार का भरण-पोषण कर्ज लेकर कर ही रही हैं. लेकिन मिड डे मील भी उधार लेकर बच्चों को खिला रही हैं. क्योंकि ब्लॉक स्तर पर उनके खाते में मिड डे मील का पैसा दिया ही नहीं जा रहा है. मालती उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय चंद्राटोली में कार्यरत हैं और स्कूल में प्रभारी भी हैं. इस बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि ब्लॉक स्तर से जानकारी मिली की उनके खाते में मिड डे मील का दो हजार रूपया ज्यादा आ गया है. इस वजह से डेढ़ माह से पैसे नहीं मिले हैं.

अब डेढ़ माह बच्चों को दो हजार से खिलाना संभव नहीं है. तो ऐसे में मिड डे मील भी उधार लेकर ही बच्चों को खिलाना पड़ रहा है. इस बारे में मालती ने कहा कि फल दुकान में पहले एक हजार उधार था, अप्रैल माह का मानदेय मिलते ही पांच सौ दे दिया पर अभी भी पांच सौ बाकी है.

वहीं अंडा दुकान में भी पांच रुपये सौ बकाया है. बच्चों को रूटीन के हिसाब से खाना देना है. इसमें प्रत्येक सप्ताह फल, अंडा, दूध भी देना ही है. मालती ने बताया कि घर चलाना तो मुश्किल है ही, मिड डे मील भी उधार में चलाना संभव नहीं है. इनके विद्यालय में सरकारी शिक्षक नहीं हैं, मात्र दो पारा शिक्षक है और 45 छात्र हैं.

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लकड़ी बेचती हैं, धान के भूरे से भी 70-80 रूपये मिलते हैं

पारा शिक्षक के साथ अन्य कामों के बारे में बताते हुए मालती ने कहा कि ये स्कूल से आकर लकड़ी बेचती हैं. जंगल से लकड़ी लाकर जमा करती हैं और फिर आसपास के गांवों में जाकर बेचती हैं. जिससे इन्हें एक दिन में सौ रूपये तक की कमाई होती है. इनके पति का निधन साल 2018 में हो गया. इसके बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि पति का इलाज के अभाव में देहांत किए. वे धान की गाड़ियां चलाते थे. जिससे घर चलता था. लेकिन लंबे समय तक बीमार रहने के बाद इनका देहांत हो गया.

उन्होंने बताया कि घर में थोड़ी बहुत खेती भी होती है. कुछ अधिक तो नहीं पर इतना कि अनाज मिल जाता है. वहीं राशन कार्ड से अनाज भी मिल जाता है. ऐसे में कभी-कभी जरूरत होने पर धान या धान को पकाके उसके भूरे को बेचते हैं. धान पकाने के लिए लोग इसे खरीदते है. इससे भी 70-80 रूपये की कमाई होती है. घर में उधार में ही सब कुछ चलता है. राशन दुकानदार बोलते तो हैं, लेकिन किसी तरह बात बनायी जाती है.

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सब्जियां नहीं खाते, साग सुखा कर खाते हैं

पारिवारिक खान-पान के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि सब्जियां नहीं लाते. कभी-कभार आलू लाते हैं और उसे उबालकर रस बनाकर वही खा लेते हैं. इससे ज्यादा कभी कुछ खा पाते नहीं. जंगल नजदीक है तो ऐसे में साग की पत्तियां सुखाकर रखते हैं और कभी कभार उसे भी बनाकर खा लेते हैं.  अभी गर्मी है तो आसानी से सूखे हुए साग मिल रहे हैं. लेकिन बरसात में परेशानी होगी. इनके परिवार में एक बेटी, एक बेटा और मालती के भाई और बहन हैं.

मालती ने बताया कि इनके भाई दिव्यांग हैं. इसलिए खेती में भी वो मदद नहीं करते. बेटा छोटा है. जिससे कोई मदद नहीं होने के कारण खेती काफी सीमित करती हैं. इन्होंने बताया कि उम्मीद थी की दोनों बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाऊं, लेकिन नहीं हो सकता. इसलिए पास के ही सरकार स्कूल में बच्चे जाते हैं.

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उज्जवला योजना का जिक्र करते हुए इन्होंने कहा कि इन्हें एक साल पहले गैस सिलेंडर मिला है. एक बार इन्होंने भराया. जिसमें 1030 रूपये लगे. इसके बाद नवंबर से गैस नहीं भराया क्योंकि जब खाना के नहीं हैं तो गैस कहां से भराएं.

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गर्दन में एक साल से दर्द है, इलाज नहीं करा पा रही

बीमारी के बारे में बताते हुए मालती ने कहा कि इनको एक साल से गर्दन में दर्द रहता है. जिससे   ये गर्दन हिला भी नहीं पाती हैं. दो बार स्थानीय डॉक्टर से इलाज कराया, मगर उन्होंने रांची जाकर   इलाज कराने की सलाह दी. रांची में डॉक्टर की फीस आठ सौ रूपये है. जिससे वो इलाज नहीं करा रही हैं.

पहले सिलाई का काम भी ये करती थी, लेकिन गर्दन के दर्द की वजह से अब वो भी नहीं कर सकती. अपने घर के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि दो साल से घर में प्लास्टिक लगाकर रह रही हूं. घर मरम्मत कराना काफी जरूरी है. लेकिन पैसे की कमी के कारण मरम्मत नहीं हो पा रहा. बरसात में तो सामान हर दिन इधर से उधर करना पड़ता है. पाइप लाकर रखा हुआ है, लेकिन मजदूर नहीं लगा पा रहे.

मालती ने कहा कि घर में सबकी जिम्मेवारी है. मानदेय अगर नियमित मिले तो कुछ पैसे बचाकर  भी रखा जा सकता है. लेकिन यहां तो मानदेय ही समय से नहीं मिलता.

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बेटी की छात्रवृत्ति के पैसे से स्कूली बच्चों का SDMIS रिपोर्ट जमा किया

स्कूली कार्यों का जिक्र करते हुए इन्होंने बताया कि पैसे की इतनी किल्लत है कि कई बार घर के पैसे से स्कूली कार्य करने पड़ते हैं. इसी साल विभाग के आदेश पर ब्लॉक में बच्चों का सीडीएमआइसी रिर्पोट जमा करना था. मालती के पास पैसे नहीं थे, इनकी बेटी को छात्रवृत्ति मिली थी. जिससे 450 रूपये उन्होंने रिर्पोट जमा करने में लगाया.

उन्होंने बताया कि रिर्पोट को जमा करने में प्रति बच्चे दस रूपये सीडी बनाने में देना था. जो बेटी की छात्रवृत्ति के पैसे से मैंने भरा. अन्य रिर्पोटों की मांग भी समय-समय पर की जाती है. कोई भी काम के पैसे नहीं मिलते, खुद का ही पैसा ही लगाना होता है. इसके पहले दो बार इन्होंने पांच-पांच सौ कई बार लगाया है. इसके अलावा हार्ड कॉपी हो या सॉफ्ट कॉपी सबको बनाने के लिए भी पैसे देने पड़ते हैं.

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