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बीटेक करने के बाद भी नहीं मिल रही नौकरी, कबाड़ से एलईडी उठाकर करता है मरम्मत

  •  भारतीय कॉलेज इंजीनियरों की स्किल्ड फोर्स तैयार नहीं कर पा रहे हैं, लिहाजा भारी संख्या में छात्र पास-आउट होने के बाद बेरोजगार रह जाते हैं. अंग्रेजी भाषा भी ग्रामीण इलाकों से संबंध रखने वाले युवाओं के लिए रोजगार में बड़ी बाधा है.
  •  इंजीनियरिंग और मास्टर्स की डिग्री लेने के साल भर बाद भी युवाओं को नहीं मिल रही है नौकरी.

New Delhi: भारत में बेरोजगारों की तादाद इस रफ्तार से बढ़ रही है कि इंजीनियरिंग, बीटेक और मास्टर्स करके भी युवा सालों तक नौकरी के लिए भटक रहे हैं. बीते एक साल के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो बेरोजगारी दर में भारी इजाफा हुआ है. ‘सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी’ (CMIE) के मुताबिक पिछले वर्ष फरवरी 2018 में जहां बेरोजगारी दर 5.9 फीसदी थी, वहीं 2019 में यह 7.2 फीसदी हो चुकी है. नौकरी के लिए पढ़े-लिखे युवा किस कदर भटक रहे हैं इसका अंदाजा महाराष्ट्र स्थित चिंचावाड़ में आयोजित एक रोजगार मेले से मिला. न्यूज़ ऐजेंसी रॉयटर्स द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में यहां पहुंचे बेरोजगारों का दर्द बयां किया गया है.

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रॉयटर्स ने बेरोजगारों को चॉकबोर्ड पर उनकी क्वालिफिकेशन के साथ खड़ा करके तस्वीरें ली हैं. इन तस्वीरों की चर्चा मीडिया डोमेन में काफी है. लेकिन, इससे ज्यादा मार्मिक बेरोजगारों की कहानी है. रिपोर्ट के मुताबिक संतोश गौरव (27) नाम के युवा ने एक छोटे शहर में स्थित इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक की डिग्री हासिल की. संतोष ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग करके सोचा कि पास-आउट होते ही उसे अच्छी नौकरी मिल जाएगी. लेकिन, पास होने के 6 महीने बाद तक कोई नौकरी नहीं मिलने पर उसने पुणे में मिस्कर-ग्राइंडर्स, टेबल फैन और दूसरे बिजली के घेरलू उपकरण की मरम्मत का काम शुरू कर दिया. दिन यदि अच्छा रहा तो उसे कबाड़खाने से उसे टूटी-फूटी एलईडी लाइटें मिल जाती हैं, जिन्हें वह फिक्स करके बेच देता है. संतोष हर महीने मुश्किल से लगभग साढ़े 3 हजार रुपये कमा पाता है, जिससे वह सिर्फ अपने कमरे का किराया दे पाता है. जबकि, वह अपने दो अन्य दोस्तों के साथ कमरे का किराया साझा करता है.

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रॉयटर्स से बातचीत में संतोष ने बताया कि उसने (लगभग) 278 551 रुपये का एजुकेशन लोन ले रखा है, जिसकी भरपाई नहीं हो पा रही है. संतोष उन हजारों लड़कों में से एक है जो इंजीनियरिंग करके रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं और अपनी एजुकेशन लोन की पूर्ति भी नहीं कर पा रहे हैं. रोजगार मेले में युवाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस वादे का भी जिक्र किया जो उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में किया था. उस दौरान नरेंद्र मोदी ने करोड़ों रोजगार के अवसर पैदा करने की बात कही थी. उस दौरान ‘मेक इन इंडिया’ के तहत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में क्रांति लाने की बात कही गई थी.

स्किल्ड लेबर की कमी: हिंदुस्तान में भारी संख्या में युवा डिग्री लेकर कॉलेज से बाहर तो आ रहे हैं, लेकिन रोजगार-परक और स्किल्ड फोर्स तैयार करने में एजुकेशन सिस्टम कही ना कहीं चूक रहा है. गौरतलब है चीन ने अपने 40 साल के दारौन मैन्युफैक्चरिंग बूम की बदौलत विकास के नए आयाम को हासिल कर लिया. लेकिन, भारत में ऐसा मुमकिन नहीं हो पा रहा है. दरअसल, कंपनियां सिर्फ सस्ता लेबर ही नहीं बल्कि स्किल्ड लेबर चाहती हैं, जो उनकी गुणवत्ता को बनाए रखते हुए तकनीक का बेहतर इस्तेमाल कर सके. अक्सर कंपनिया इंजीनियरिंग क्षेत्र के कुशल छात्रों की कमी होने की शिकायत करती रहती हैं. रॉयटर्स को स्किल एसेस्मेंट फर्म ‘एस्पाइरिंग माइंड्स’ के सह-संस्थापक वरुण अग्रवाल ने बताया कि भारत में पास-आउट होने वाले 80 फीसदी से अधिक इंजीनियर रोजगार के लायक नहीं होते हैं. बिना स्किल्ड वाले इंजीनियरों की संख्या बल पर हो-हल्ला नहीं मचना चाहिए. इनमें से अधिकांश बेसिक कोड भी नहीं लिख सकते. अग्रवाल बताते हैं कि इसके लिए भारत को सबसे पहले अपनी शिक्षा नीति में बड़ा बदलाव करना होगा.

अंग्रेजी भाषा सबसे बड़ी परेशानी: रोजगार मेले में युवाओं से बातचीत के बाद रिपोर्ट में बताया गया है कि खराब अंग्रेजी की वजह से युवा नौकरी हासिल करने में पिछड़ रहे हैं. चिंचावाड़ जैसे शहरों में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र ग्रामीण क्षेत्रों से संबंध रखते हैं. इनमें से अधिकांश की पढ़ाई-लिखाई क्षेत्रीय भाषा में हुई रहती है, जिससे अंग्रेजी पर्याप्त रूप से अच्छी नहीं रहती. ऐसे में अधिकांश कंपनियां जिस पोजिशन के लिए टैलेंट हायर करती हैं, उनमें ये छात्र पिछड़ जाते हैं. कई छात्रों की परेशानी है कि अधिकांश कंपनिया अंग्रेजी बोलना अनिवार्य करती हैं, जिसके वजह से उनका कोई चांस नहीं बन पाता.

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