
Rakesh Ranjan
Jamshedpur: अगर कोई व्यक्ति सिक्के के दोनों पहलुओं पर अपनी ही बात पर अड़े तो उसे मनमानी ही कहेंगे न. इसीलिए चित भी मेरी, पट भी मेरी जैसी कहावत का जन्म हुआ. लेकिन कभी – कभी सिक्का किसी भी पहलू पर गिरने की बजाय खड़ा ही रह जाता है. इस स्थिति में कुछ जोड़ दिया जाए – चित भी मेरी, पट भी मेरी , खड़ा मेरे बाप का. है न मजेदार. खासकर सूबे झारखंड की राजनीति में आप इस कहावत को सौ फीसद चरितार्थ होते देखेंगे.
जहां तक जमशेदपुर की बात है तो दो चेहरे इस मुहावरे के लिए सटीक बैठते हैं. झारखंड आंदोलन में इनके योगदान को भुलाया तो नहीं जा सकता है. लेकिन एक ने आंदोलन से वह सबकुछ हासिल करने में कामयाबी पायी जो आज के राजनेता की चाहत होती है. यह बात अलग है कि दूसरा चेहरा आंदोलन से कमाई राजनीतिक ताकत आंदोलन के दौरान ही गवां बैठा और पांव पैदल हो चला. दोनों भले कालक्रम में राजनीतिक हाशिए पर चले गए, लेकिन चर्चा में बने रहने का लोभ संवरण कर नहीं अपनी फजीहत करा बैठते हैं.
भाषा विवाद में मारी इंट्री
झारखंड में अभी क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर विवाद है. सरकार के फैसले ने आलोचना की गुंजाइश छोड़ी तो विपक्ष को जाहिर तौर पर राजनीति की रोटी सेंकने का मौका दिखा. विपक्ष इस मसले को भुनाने में लगा है. एक विधायक निर्दल हैं सो वे अपनी राजनीतिक लाइन ले रहे. इसी बीच विवाद में एक नेता ने इंट्री मारी और और ऐसा बयान दे मारा कि चित भी मेरी,पट भी मेरी, खड़ा मेरे ‘बाप’ का मजेदार मुहावरा बन गया. इस नेता की राजनीतिक लाइन कभी एक नहीं रही. जाहिर तौर पर नीति-सिद्धांत की बातें फिजूल हैं. झारखंड आंदोलन की पहली पंक्ति के नेता के रूप में लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानी संसद का हिस्सा तो बने लेकिन दिल्ली की पहली ही यात्रा में ऐसा कुछ कर बैठे कि पूरा देश भौंचक्क रह गया. झारखंड आंदोलन से मिली ताकत को कथित तौर पर महज एक करोड़ में बेचकर खासकर झारखंड के मूलवासियों के गुनहगार बन बैठे. जेल के सफर के बाद कालक्रम में लंबी कानूनी प्रक्रिया में बरी करार दिए गए, लेकिन तबतक बेहतरी का मौका देखकर विपरीत विचारधारा वाली जमात का सपत्नीक हिस्सा बन गए. पहले खुद और फिर उनकी पत्नी संसद आती -जाती रही. जब यहां बात नहीं बनी तो कभी यहां, कभी वहां उछलते-कूदते रहे. हालांकि, सुनहरे दिन बहुरते नहीं दिखे तो राजनीति से तौबा कर स्वामी शैलानंद बन गए.
मन ना रंगाए-रंगाए जोगी कपड़ा…
स्वामी शैलानंद का अवतार ज्यादा दिन वजूद में नहीं रहा. फिर पुराने वजूद में आने के पीछे का तर्क भी मजेदार रहा. झारखंड को उनकी जरूरत है. वे अपने राजनीतिक अनुभवों से झारखंड को लाभ देने से भला कैसे वंचित कर सकते हैं. भाषा विवाद में इंट्री के दौरान दिकू, अतिक्रमणकारी दिकू, झारखंडी, गैर झारखंडी जैसे शब्दों की गोलीबारी चंचल चित्त राजनेता की मनोदशा और मंशा समझने के लिए काफी है. यही कारण है कि जिन्हें जंग लगे तीरों से बेधने की कोशिश की उन्होंने नेताजी का चरित्र चित्रण कर तीर को वापस उन्हीं की कमान में भेज दिया. ये रही जवाब की बानगी-एक अंतर्मुखी स्वघोषित बुद्धिजीवीजो भी बोलते-लिखते हैं, उसपर गहराई से सोचता-विचारता हूं. आत्मचिंतन और आत्ममंथन करता हूं. चित्त स्थिर रखें. समय के साथ अपने राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक विचार नहीं बदलें. बुद्धिजीवी हैं तो संवाद की मानसिकता रखें. विवाद की नहीं.
सूर्यावतार को भी नहीं मिला यौवन, हो गई अकाल मौत
चित्त स्थिर नहीं होने की वजह से स्वामी शैलानंद की तरह सूर्यावतार को भी यौवन नहीं मिल पाया. इस अवतार भी भी अकाल मौत हो गयी. संसदीय राजनीति की उंची सीढ़ियां चढ़ने के साथ ही धड़ाम हो जाने वाले झारखंड आंदोलन के फायरब्रांड नेता ने तीस बरस तक हाथ-पांव मारे, यहां-वहां उछल-कूद करते रहे, लेकिन वजूद के संकट से ही सामना जारी रहा. खुद के सूर्यावतार बनकर धर्म-अघ्यात्म में रमने के निर्णय से पीछे हटते हुए एलान किया गया कि राजनीति से दूर नहीं रह सकते. राजनीति को उनकी जरूरत है. अब वे अध्यात्म और राजनीति दोनों में सक्रिय रहेंगे. तर्क भी बेजोड़, यही कि अगर भगवा वस्त्र धारी संयासी योगी आदित्यनाथ राजनीति में सक्रिय रहकर सत्ताधारी हो सकते हैं, वे क्यों नहीं. ये तो वही बात हुई मेरी कमीज उसकी कमीज से सफेद कैसे.




