
Dhanbad : मार्क्सवादी समन्वय समिति (मासस) का माले में विलय हो गया है. रणधीर वर्मा स्टेडियम में सोमवार को आयोजित कार्यक्रम का मासस के केंद्रीय अध्यक्ष आनंद महतो ने सभा की अध्यक्षता की. लेकिन बाद में तबीयत बिगड़ने के कारण उन्हें सभा से जाना पड़ा. सभा का संचालन माले के जनार्दन सिंह और हलधर महतो ने किया. इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे. मासस के कार्यकारी अध्यक्ष अरूप चटर्जी ने इसकी आधिकारिक घोषणा की.
माले के केंद्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि कॉरपोरेट लूट, देश में सांस्कृतिक-सामाजिक मूल्यों के विरुद्ध हमलों से पूरा देश जूझ रहा है. ऐसे दौर में मासस का भाकपा माले में विलय केंद्र सरकार के विरुद्ध आंदोलन को नई ताकत देगा. सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण के विरुद्ध और रोजगार के लिए आंदोलनों का विस्तार होगा. आगे उन्होंने कहा कि मासस और माले की विचारधारा एक रही है और देश परिवर्तन चाह रहा है, इस विलय से नयी ताकत मिलेगी. उन्होंने यह भी कहा कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी का उत्तर प्रदेश की तरह बिहार और झारखंड में परिणाम नहीं आया, लेकिन विधानसभा चुनाव में बीजेपी को सत्ता में आने नहीं देंगे. मासस के 52 साल के इतिहास को समाप्त करते हुए, माले में विलय हो गया है, जिससे वामदल को नई ताकत मिलेगी. उन्होंने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि हेमंत सोरेन सरकार को अस्थिर करने के लिए केंद्र सरकार ने सीबीआई और ईडी को लगाया, लेकिन इंडी गठबंधन ने मजबूती से उसका सामना किया और मुंहतोड़ जवाब दिया.
बगोदर के विधायक विनोद सिंह ने कहा कि क्रांतिकारी कम्युनिस्ट धाराओं के रूप में मासस व भाकपा माले एक ही दौर में उभरे थे. एके राय के नेतृत्व में मासस ने कोलियरियों के राष्ट्रीयकरण के लिए मजदूरों का नेतृत्व किया और मजदूर आंदोलन औस झारखंड आंदोलन को एक मंच पर लाया. दोनों ही दलों ने क्रांतिकारी संघर्षों को आगे ले जाने के लिए अपने नेता गुरुदास चटर्जी व महेंद्र सिंह को खोया भी है.
निरसा के पूर्व विधायक ने कहा कि अब मासस के विलय से माले को नई ताकत मिलेगी और वामदल और मजबूत होगा. यह विलय वामदल के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है और यह देश की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत कर सकता है. आदिवासियों व झारखंड के दबे-कुचले समुदायों का जल-जंगल जमीन पर उनके सामुदायिक नियंत्रण और राज्य के संविधान की पांचवी अनुसूची को लागू करना झारखंड आंदोलन के प्रमुख एजेंडा में शामिल था.



