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विधानसभा समितियों की कार्यशैली के बारे में नहीं जानते हैं कई विधायक, अध्यक्ष ने भी टाला सवाल

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Ranchi: झारखंड विधानसभा की ओर से हर साल विभिन्न समितियों का गठन किया जाता है. हर कमेटी को अलग अलग कार्य दिये जाते हैं. जैसे जिला परिषद् एवं पंचायती राज समिति, महिला एवं बाल कल्याण समिति, पर्यावरण एवं प्रदूषण नियंत्रण समिति समेत कुल 18 समितियां हैं. लेकिन हैरानी की बात है कि विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव को भी यह नहीं पता कि आखिर ये समितियां काम कैसे करती हैं. सिर्फ अध्यक्ष ही नहीं कई विधायकों को भी इस बात की जानकारी नहीं कि ये समितियां कैसे काम करती हैं.

अध्यक्ष से भी पूछा लेकिन उन्हें भी नहीं पता

न्यूज विंग की टीम ने जब विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव से विभिन्न समितियों के गठन का उद्देश्य जानने की कोशिश की तो उन्होंने साफ-साफ कहा कि अध्यक्ष हैं तो इतनी जानकारी नहीं है. कमेटी का गठन होता है, सो किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि विधानसभा आकर इसकी जानकारी लें ले. कहा कि अध्यक्ष होने के नाते हर बात की जानकारी हो यह जरूरी नहीं.

विधायकों ने भी झाड़ा पल्ला

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विधानसभा की विभिन्न समितियों में से एक अनुसूचित जाति, जनजाति, अल्पसंख्यक, पिछड़ा व कमजोर वर्ग कल्याण समिति है. मानवाधिकार दिवस के पूर्व जब समिति के सदस्य चाईबासा विधायक दीपक बिरूआ, मंझगांव विधायक निरल पूर्ति, घाटशिला विधायक लक्ष्मण टुडू, तमाड़ विधायक विकास कुमार मुंडा से राज्य के विभिन्न मुद्दों पर समिति के कार्य की जानकारी मांगी गयी तो अधिकांश ने बहाना बना कर फोन काट दिया. चाईबासा विधायक दीपक बिरूआ और तमाड़ विधायक विकास कुमार मुंडा ने बैठक में होने और कोई प्रतिनिधि को भेज कर बात करने की बात कही. वहीं घाटशिला विधायक लक्ष्मण टुडू को कई बार फोन लगाया गया, लेकिन उनका फोन बंद आया. यहां तक कि समिति के अध्यक्ष बोरियो विधायक ताला मरांडी से भी संपर्क नहीं हो पाया.

कुछ विधायकों ने सरकार को लिया निशाने पर

मंझगांव विधायक निरल पूर्ति से जब मूलवासी पलायन, विस्थापन, सीएनटी एसपीटी समेत अन्य मुद्दों पर बात की गयी तो उन्होंने कहा कि सरकार सुनती ही नहीं है, पलायन, विस्थापन, सीएनटी, एसपीटी जैसे मुद्दों पर विधानसभा में आवाज उठा उठा कर थक गये हैं, लेकिन सरकार पर कोई असर नहीं हो रहा. उन्होंने कहा कि डोमेसाइल नीति तो बना दी गयी है लेकिन लोगों को इससे कितना लाभ है ये अस्पष्ट है. उन्होंने कहा कि रांची और चाईबासा क्षेत्र में जनजातीय मुद्दों पर हमेशा सवाल उठाया गया है.

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