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झामुमो का दर्दः हेमंत की सीनियर लीडरों व कैडर से दूरी, किचन कैबिनेट से हो रही दुर्गति

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Akshay Kumar Jha

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Ranchi: झारखंड मुक्ति मोर्चा. इस पार्टी की नींव ही आंदोलन मानी जाती रही है. आंदोलन के अगुआ शिबू सोरेन, विनोद बिहारी महतो और टेकलाल महतो जैसे नेता रहे हैं. जिनकी पहचान हमेशा से किसी पार्टी के मेंटॉर से ज्यादा रही है. इस पार्टी का दावा है कि इसने ही झारखंड को अलग राज्य बनाने के लिए सबसे ज्यादा आंदोलन किया. इसी दावे के साथ पार्टी राज्य की कमान अपने हाथ में लेने के लिए झारखंड की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर ऊभरी है. लेकिन अब इस पार्टी को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. संथाल परगना में भाजपा की मजबूती के बाद तो पार्टी की नेतृत्व क्षमता को लेकर भी सवाल खड़े किये जा रहे हैं. लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों से जेएमएम खेमे में अजीब सी खलबली है. आनेवाले दो जून को पार्टी हार पर मंथन के लिए एकजुट होनेवाली है. लेकिन पार्टी की ऐसी दुर्गति हुई क्यों. ये लाख टके का सवाल है. न्यूज विंग ने पार्टी के ही कुछ कार्यकर्ताओं से नाम न छापने की शर्त पर हाले जेएमएम बयां किया है. जानते हैं जेएमएम की वो इन साइड स्टोरी जिसकी वजह से हेमंत सोरेन समेत पार्टी के सभी आला नेताओं की पेशानी पर बल है.

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विधायक और सीनियर लीडर्स से हेमंत की दूरी

हेमंत सोरेन की छवि राज्य में एक मुखर नेता के तौर पर है. हाल के चुनावी सभाओं में जुटी भीड़ भी इस बात का सबूत देती है कि पब्लिक के बीच हेमंत का क्रेज है. लेकिन पार्टी को परिणाम नहीं मिल पाता है. क्योंकि वह न तो विरोधी दल के खिलाफ जानेवाले मुद्दों को पकड़ पाते हैं और न ही हवा बना पाते है. हेमंत सोरेन की एक बड़ी विफलता जनमुद्दों को लेकर आंदोलन, धरना प्रदर्शनों से पार्टी को दूर कर लेना भी है. यही कारण है कि लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों में पार्टी को हार का सामना करना पड़ता है. जानकार बताते हैं कि ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिन्हें कभी जेमएम का थिंक टैंक माना जाता था, उन्होंने पार्टी से दूसरी बना ली है. वजह है जेएमएम में वीवीआइपी कल्चर का आ जाना. शिबू सोरेन के वक्त पार्टी का साधारण नेता भी शिबू सोरेन के सामने अपनी बात रख देता था. छोटी-छोटी बात पर चर्चा होती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है. इक्का-दुक्का लोगों की बात छोड़ दें तो, फोन पर भी हेमंत से उनका सीधा कॉन्टैक्ट नहीं हो पाता है. पार्टी के पक्षधर चाह कर भी अपनी बात अपने नेता तक पहुंचाने में सक्षम नहीं हैं.

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क्या कुछ लोगों ने पार्टी को हाइजैक कर लिया

क्या सच में पार्टी को महज चंद लोगों ने हाइजैक कर लिया है. नाम न बताने की शर्त पर एक कार्यकर्ता का कहना है कि कुछ लोग हेमंत सोरेन के आस-पास ऐसे फिल्टर की तरह हैं, जो मनचाही चीज को ही हेमंत तक पहुंचने देने का काम करते हैं. हेमंत इन्हीं लोगों के इशारे पर लोगों से मिलते हैं. पार्टी के अहम फैसले लेते हैं. जिससे पार्टी को नुकसान छोड़ कर आजतक कुछ नहीं मिला. आरोप यह भी लग रहे हैं कि हेमंत सोरेन की रणनीति ये लोग ही तैयार करते हैं. इनमें विनोद पांडे, अभिषेक प्रसाद पिंटू, रवि केजरीवाल, सुप्रियो भट्टाचार्य और सुनील श्रीवास्तव के नाम सबसे आगे हैं. कहा जाता है कि क्षेत्र के कार्यकर्ताओं की बात जितनी हेमंत को सुननी और उसपर अमल करनी चाहिए उतनी हेमंत सोरेन नहीं करते हैं. चारों तरफ से हेमंत इन लोगों से घिरे रहते हैं. जो पार्टी और खुद हेमंत के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं.

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हार के बाद पार्टी में मंथन क्या महज दिखावा

पार्टी पर एक आरोप और लग रहा है. चुनाव का नतीजा 23 मई को ही आ गया था. पार्टी जिस तरीके से हारी है, उस तरह और कोई पार्टी हारती तो हार पर मंथन या समीक्षा कब की हो जाती. लेकिन जेएमएम हार के करीब दस दिनों के बाद मंथन करेगा. यह भी कहा जा रहा है कि मंथन महज एक खानापूर्ति ही साबित होनेवाला है. फैसले के तौर पार्टी एक ही बड़ा फैसला ले सकती है कि विधानसभा चुनाव वो अपने दम पर लड़े. लेकिन इसके भी आसार कम लग रहे हैं. पूरे राज्य में पार्टी को महज एक सीट पर जीत मिली है. जो जेएमएम के लिए काफी शर्मनाक नतीजे हैं. हार पर मंथन में एक बार फिर से पार्टी कार्यकर्ता अपनी बात आला अधिकारियों के पास रखने की कोशिश करेंगे. लेकिन पार्टी उनकी बातों को किस तरह से लेती है, देखनेवाली बात होगी.

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आखिर जेपी पटेल ने क्यों छोड़ दी पार्टी

आखिर जय प्रकाश भाई पटेल ने पार्टी क्यों छोड़ी. इस सवाल का जवाब जेपी पटेल से बेहतर कोई नहीं दे सकता. जेपी पटेल ने न्यूज विंग को बताया कि ऐसा नहीं है कि हेमंत जिस तरह की मनमानी कर रहे हैं, वो पहले नहीं होता था. उन्होंने शिबू सोरेन पर भी संगीन आरोप लगाये. हेमंत के बारे में साफ लफ्जों में कहा कि हर बार बैठक या मंथन में सभी चीजों पर सिर्फ चर्चा भर ही होती थी. फैसले की घड़ी आते ही हेमंत का जवाब होता था कि गुरु जी मामले पर फैसला लेंगे. लेकिन सभी को पता है कि गुरु जी की काफी उम्र होने की वजह से वो फैसला लेने में सक्षम नहीं हैं. फैसला हेमंत के आस-पास के लोग ही लेते हैं. जिसे पार्टी पर थोप दिया जाता था. ये सारी बात उनके निजी विचार हो सकते हैं. लेकिन जेपी पटेल के पार्टी छोड़ने के पीछे राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जगरनाथ महतो को जेएमएम की तरफ से लोकसभा का टिकट मिल जाने से जेपी पटेल काफी नाराज चल रहे थे. टिकट न मिलने की वजह से ही उन्होंने बागी तेवर अपनाया.

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