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बाबूलाल की नैतिकता को जागने में लग गये 37 दिन

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Priyanka

एक राजनीतिक पार्टी, जिसके सुप्रीमो हमेशा गरीब-प्रताड़ितों के साथ खड़े रहने की बात करते हैं. लोगों के अधिकार, सम्मान के लिए आंदोलन की बात करते हैं. महिला सम्मान, महिला सशक्तिकरण जैसे भारी-भरकम शब्दों के इस्तेमाल से भी ये नेताजी परहेज नहीं करते.

लेकिन आखिर ऐसी क्या बात थी कि उनकी अपनी ही पार्टी में एक महिला प्रताड़ित होने की शिकायत करती है. और इस मामले में पार्टी सुप्रीमो की नैतिकता को जागने में एक-दो नहीं बल्कि 37 दिन लग जाते हैं. इशारा तो आप समझ ही रहे होंगे…

बात हो रही है झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की. वही पूर्व सीएम साहब, जिन्होंने नैतिक मूल्यों की दुहाई देते हुए बीजेपी छोड़ अलग पार्टी जेवीएम बनायी. खुद को झारखंड की दबी-कुचली जनता की आवाज बताया.

लेकिन अफसोस, जब बात अपनी पार्टी की बात आयी, तो इनकी नैतिकता शायद कहीं गुम हो गयी थी. पूरे मामले पर बाबूलाल मरांडी की प्रतिक्रिया पर सवाल उठना लाजमी है. क्योंकि ये कोई छोटा-मोटा मसला नहीं है, बल्कि एक महिला के सम्मान से जुड़ी बात है.

घटनाक्रम को देखें तो रिंकी झा (जो खुद भी जेवीएम से जुड़ी थी और प्रवक्ता थी) ने अपनी शिकायत में कहा कि 20 अप्रैल की रात देवघर में जेवीएम के केंद्रीय महासचिव और बाबूलाल के करीबी प्रदीप यादव ने उसके साथ दुष्कर्म की कोशिश की. किसी तरह से उस महिला ने अपनी आबरू बचाई.

घटना के चंद घंटों बाद ही यानी 21 अप्रैल की सुबह-सुबह रिंकी ने सबसे पहले पार्टी अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी को इस पूरी घटना की जानकारी दी. जाहिर है, इस मुश्किल वक्त में अगर उसे बाबूलाल याद आये थे, जो उसे उम्मीद रही होगी कि पूर्व सीएम साहब उसकी मदद जरूर करेंगे. उसे न्याय मिलेगा.

लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. व्हाट्सएप के जरिये मामले की जानकारी देने के बाद रिंकी ने कई बार उनसे फोन पर बात करने की कोशिश की. लेकिन बात नहीं हो पायी.

इतना ही नहीं, पार्टी की ओर से मामले की जांच को लेकर कोई अंदरूनी कमेटी तक नहीं बनायी गयी. अगर दूसरे शब्दों में कहे तो महिला के आरोपों पर पार्टी ने कोई ध्यान ही नहीं दिया.

मामला गरमाया, राजनीति भी खूब हुई. लोकसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच एक पल को लगा कि इस पूरे प्रकरण को लेकर गोड्डा सीट से प्रदीप यादव की दावेदारी खतरे में आ जायेगी. पार्टी उन्हें बाहर का रास्ता दिखायेगी. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं.

SMILE

बाबूलाल जी ने तो ऐसी चुप्पी साधी मानो कुछ हुआ ही ना हो, उन्हें कुछ पता ही ना हो. एकबार फिर पार्टी प्रमुख प्रदीप यादव को संरक्षण देते नजर आये. मालूम हो कि ये वहीं प्रदीप यादव हैं जिनके कारण जेवीएम के कई बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ दी. लेकिन हर बार बाबूलाल प्रदीप यादव का बचाव करते नजर आये.

इस बार तो हद हो गयी. क्योंकि ऐसे संगीन और संवेदनशील मामले में बाबूलाल की चुप्पी, प्रदीप यादव के निर्दोष होने की मौन स्वीकृति से कम नहीं थी.

शायद जेवीएम सुप्रीमो के लिए चुनावी लड़ाई, एक महिला की अस्मिता से अधिक मायने रखती थी. इसलिए तो घटना के 36-37 दिनों तक यूं खामोश रहे मानो कानों में तेल डाल रखा हो. चुनावी शोर के अलावा कुछ सुनायी ही नहीं दे रहा हो.

खैर, चुनाव भी हो गये और उनकी उम्मीद के विपरीत नतीजे भी सामने आ गये. कोडरमा सीट पर बाबूलाल को करारी हार का सामना करना पड़ा, वहीं गोड्डा सीट से प्रदीप यादव की शिकस्त भी हुई.

बीजेपी की प्रचंड जीत और झारखंड में जेवीएम समेत महागठबंधन की करारी हार के बाद आत्ममंथन का दौर शुरू हुआ. तब कहीं जाकर बाबूलाल मरांडी की रिंकी प्रकरण पर नींद टूटी.

उन्हें मिली शिकायत के 37 दिनों बाद पार्टी प्रवक्ता के जरिये उन्होंने प्रदीप यादव को नैतिकता का वो पाठ याद दिलाया, जिसे शायद वो खुद ही चुनावी संग्राम के बीच भूल बैठे थे.

खैर, इस नैतिकता पाठ का प्रदीप यादव पर तुरंत असर हुआ. शाम को बाबूलाल ने नसीहत दी, रात तक गोड्डा से प्रत्याशी रहे प्रदीप यादव का जमीर कुछ ऐसा जागा कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया. यानी मामले की जांच पूरी होने तक वो पार्टी के केंद्रीय महासचिव नहीं रहेंगे.

हालांकि, लोग और मीडिया सभी इसे नैतिकता के आधार पर उठाया गया कदम बता रहे हैं. लेकिन जिस तरह से चुनाव में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा है  और बाबूलाल मरांडी की अपनी राजनीतिक साख पर सवाल उठे है, वैसे में ये कदम भी महज डैमेज कंट्रोल के लिए उठाये गये एक कदम से ज्यादा कुछ नहीं लगता.

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