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#EconomicSlowDown राज्य सरकार पर लगभग 1000 करोड़ का बिल पेंडिंग, मनरेगा मजदूरों के भी पैसे नहीं दे पा रही सरकार

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Kumar Gaurav

Ranchi: देश के साथ झारखंड की भी अर्थव्यवस्था चरमरायी हुई है. यूं कहें कि कर्ज में डूबी हुई है. झारखंड के बजट के आकार का राज्य का कर्ज हो गया है. ऐसा कहा जा सकता है कि 100 रुपये खर्च करने की योजना बनाने वाले पर 100 रुपये से अधिक का कर्ज हो गया है. खराब अर्थ व्यवस्था के कारण बिल, सैलरी, मानदेय और मजदूरी जैसी जरुरी चीजों का भुगतान सरकार नहीं कर पा रही है.

सरकार पर लगभग 1119 करोड़ से अधिक का बकाया है. सिर्फ मनरेगा मजदूरों के 119.56 करोड़ रुपये का भुगतान सरकार नहीं कर सकी है. वहीं राज्य में चल रहे विभिन्न प्रोजेक्ट के ठेकेदारों और आपूर्तिकर्ताओं के लगभग 1000 करोड़ का बकाया हैं. इसके अलावा राज्य सरकार ने सरकारी काम कर रहे 2 लाख से अधिक लोगों के मानदेय का भुगतान भी नहीं किया है.

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राज्य सरकार की वित्तीय हालत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2019-20 के लिए सरकार ने जहां 85429 करोड़ रुपये का बजट लाया था. वहीं मार्च 2019 तक सरकार पर 85234 रुपये कर्ज का अनुमान लगाया गया है.

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मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों का 119.56 करोड़ बकाया

राज्य सरकार ने मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों के 119.56 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं किया है. राज्य सरकार पर मनरेगा के अनस्कील्ड मजदूरों का 6 करोड़ 90 लाख से अधिक बकाया है. वहीं सेमीस्कील्ड मजदूरों के 3 करोड़ 29 लाख 45 हजार रुपये का भुगतान नहीं किया गया है.

इसके अलावा मनरेगा के मैटेरियल कॉस्ट का 109 करोड़ बकाया है. सबसे अधिक गढ़वा और गिरडीह जिला के मजदूरों का बकाया है. मनरेगा के फाइनेंशियल रिपोर्ट कार्ड के अनुसार कुल 123.30 करोड़ बकाया है, जिसमें से 3.74 करोड़ टैक्स है. बकाया टैक्स को हटाकर हमने मजदूरों के 119 करोड़ का अपने रिपोर्ट में दिखाया है.

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प्रदेश के आपूर्तिकर्ताओं का लगभग 1000 करोड से अधिक का बकाया

सरकारी प्रोजेक्ट में आपूर्तिकर्ताओं द्वारा हर माह लगभग 60 करोड़ के बालू, 50 करोड़ के चिप्स और लगभग 100 करोड़ के ईंट की सप्लाई की जाती है. इसका अनुपात 4:3:1 (चार कड़ाही बालू. तीन कड़ाही चिप्स और एक कड़ाही सीमेंट) माना गया है.

दूसरी वजह यह भी है कि बार-बार प्रोजेक्ट के डिजाइन और डीपीआर में बदलाव होने के कारण प्रोजेक्ट कॉस्ट बढ़ जाता है. ठेकेदार को समय पर पैसा नहीं मिलने के कारण आपूर्तिकर्ताओं का भी भुगतान लंबित हो जाता है. प्रदेश में आपूर्तिकर्ताओं का लगभग 1000 करोड़ रुपये से भी अधिक का भुगतान लंबित है.

एक दर्जन से भी अधिक प्रोजेक्ट्स का बढ़ गया कॉस्ट

रांची में पहले चरण में सीवरेज-ड्रेनेज के लिए 360 करोड़ का कार्यादेश कानपुर की कंपनी ज्योति बिल्डटेक को मिला था. कंपनी को रांची नगर निगम की तरफ से इस काम के लिए 54 करोड़ रुपये का अग्रिम और चार करोड़ के बिल भुगतान भी किया गया.

18 महीने के अंदर न तो प्रोजेक्ट पूरा हुआ और न ही काम आगे बढ़ा. अब कंपनी कह रही है कि प्रोजेक्ट कॉस्ट 8 फीसदी और बढ़ाया जाये, साथ ही मियाद भी बढ़ाई जाये. इसी तरह एक दर्जन से भी अधिक प्रोजेक्ट्स का कॉस्ट बढ़ गया है. इस कारण भी आपूर्तिकर्ताओं का भुगतान लंबित है.

पथ विभाग में चल रहा है 5000 करोड़ का प्रोजेक्ट

पथ विभाग में फिलहाल लगभग 5000 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट 26 डिवीजन में चल रहा है. ठेकेदार को हर माह 250 से 300 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा रहा है. विभाग के अनुसार आपूर्तिकर्ताओं के भुगतान लंबित होने के जिम्मेवार ठेकेदार ही हैं.

विभाग का कहना है कि समय पर ठेकेदारों का भुगतान कर दिया जाता है, लेकिन ठेकेदार उस पैसे को किसी और प्रोजेक्ट में लगा देते हैं. इस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. इसके लिए पूरी तरह से ठेकेदार ही जिम्मेवार हैं.

एक नजरः सरकार का लेखोजोखा

–      लोक ऋण- 3760.56 करोड़

–      कर्ज व उधार- 1543 करोड़

–      पूंजीगत खर्च- 12305.59 करोड़

–      राजस्व खर्च- 62744.44 करोड़

किस विभाग में कुल कितने का प्रोजेक्ट

–      कृषि- 26500 करोड़

–      भवन- 57100 करोड़

–      ऊर्जा- 340000 करोड़

–      वन एवं पर्यावरण- 41000 करोड़

–      स्वास्थ्य- 260000 करोड़

–      उद्योग व खान- 42500 करोड़

–      पथ- 400000 करोड़

–      ग्रामीण विकास- 650000 करोड़

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