Opinion

देश में गहराता #EconomicCrisis और सरकार का बेपरवाह रवैया

Faisal Anurag

गहराते आर्थिक संकट के प्रति सरकार का रवैया बेपरवाह है. सरकार यह दिखा रही है कि देश का आर्थिक ग्रोथ के आंकड़ों से चितिंत नहीं हैं. इकोनॉमिक फ्रंट के तमाम आंकड़ों के संकेत के खिलाफ सरकार अपने खर्चों को लगातार बढ़ा रही है. एक ओर देश में अनेक तरह के सामाजिक सवाल खड़े हो रहे हैं. वहीं दूसरी ओर लोगों की तकलीफ को काल्पनिक बताया जा रहा है. मोटर वेहिकल एक्ट के कारण लोगों की कराह सुनायी दे रही है. लेकिन गडकरी बता रहे हैं कि सिविक और ट्रैफिक सेंस के लिए यह जरूरी है. पूरे देश को नोटबंदी के बाद एकबार फिर परेशानी में देखा जा सकता है.

वे ही राज्य इससे मुक्त हैं, जहां की सरकारों ने केंद्र के इस फैसले को अपने राज्यों में लागू नहीं करने का निर्णय लिया है. जब लोगों की आमदनी घट रही है और बाजार में त्योहारों के आगमन के बावजूद उदासी है, तब इस तरह का क्रूर वक्तव्य गैरजिम्मेदारी का ही परिचायक है.

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सवाल उठता है कि सरकार बाजार और इंडस्ट्री को भरोसा क्यों नहीं दिला पा रही है कि आर्थिक गतिरोध का यह दौर क्षणिक है. सरकार समर्थक इस पूरे संकट को वैश्विक कारणों का असर बता रहे हैं.

मोदी सरकार हकीकतों को नजरअंदाज करती है

वे भूल जा रहे हैं कि इस समय दुनिया के कुछ देशों में आर्थिक कमजोरी तो है, लेकिन जिस तरह की मंदी भारत में है, वह बिलकुल अलग है. एक जानकार अमेरिका और चीन के व्यापार युद्ध के असर के तौर पर इस मंदी को रेखांकित कर रहे हैं, वे भूल रहे हैं कि यह व्यापार संकट भारत जैसे देशों के लिए बड़ा अवसर है और भारत चाहे तो इस संकट के बीच अपने विकास दर को बेहद तेजी प्रदान कर सकता है. सिंगापुर जैसे छोटे देशों ने इस संकट का लाभ उठाया है.

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उनके आर्थिक आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं. भारत का संकट यह भी है कि मोदी सरकार देश की पहली ऐसी सरकार है जो हकीकतों को नजरअंदाज करती है और उसे किसी भी तरह स्वीकार नहीं करती है, इसका नतीजा निकलता है कि अपनी जगह हालात बने रहे हैं और सरकार ऐसे मुद्दों की ओर लोगों का ध्यान भटका देती है.

बाजार का संकट जिन सरकारी नीतियों का परिणाम है, उसे दूर करने की दिशा में बेरूखी अब भी बनी हुई है. सरकार पांच ट्रिलियन इकोनॉमी बनाने का प्रचार जोर-शोर से कर तो रही है. लेकिन यह भूल जाती है कि भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से अब सातवें स्थान पर खिसक गया है.

 दिशाहीनता पर अब इंडस्ट्री दबे स्वर से सवाल उठा रही है

बजट की दिशाहीनता पर भी अब इंडस्ट्री दबे स्वर से सवाल उठा रहा है. वाहन निर्माण करने वाली कंपनियों ने चेतावनी दी है कि केवल आटोमोबिल इंडस्टी से 10 लाख नौकरियों पर गंभरीर खतरा है. यह सियाम के सालाना सम्मेलन में कही गयी है, इसके साथ ही अब जक जा चुकी नौकरियों का आंकड़ा भी सियाम ने पेश किया है. सियाम में बोलते हुए टाटा मोटर्स प्रबंध निदेशक गुंटेर बुश्चेक ने कहा कि जल्द ही वाहन उद्योग के विकास की गाथा ढह सकती है.

उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री के विकास की कहानी की त्रासदी के समान है. सियाम के सम्मेलन ने दबे स्वर से ही सही अपना दर्द  बयां कर दिया है. इस सम्मेलन में यहां तक कहा गया कि सरकार के उपाय नाकाफी हैं और इस उद्योग के संकट की तुलना में बेहद नगण्य हैं.

न्यूज प्लेटफार्म की एक खबर है, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के डेटा के मुताबिक, अगस्त में 8 प्रतिशत बेरोजगारी दर पिछले तीन सालों में सर्वाधिक रही.

सीएमआईई ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जुलाई में 7 से 8 प्रतिशत के मुकाबले अगस्त में साप्ताहिक बेरोजगारी दर 8 से 9 प्रतिशत के बीच रही. वहीं एजेंसी ने बताया है कि सितंबर 2016 के बाद से बेरोजगारी की यह दर सर्वाधिक है.

सीएमआईई के मुताबिक, अगस्त 2019 में शहरी क्षेत्र में बेरोजगारी दर 9 -10 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्र में 7 प्रतिशत रही. एजेंसी ने बताया कि पिछले साल अगस्त के मुकाबले इस बार अगस्त में ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार में दो प्रतिशत की वृद्धि हुई है, अगस्त 2019 तक ग्रामीण क्षेत्र के रोजगार में साल दर साल 2.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई, वहीं शहरी क्षेत्र में इसमें 0.2 प्रतिशत की दर से कमी हुई.

बेरोजगारी दर के एक मुख्य घटक के रूप में जानी जाने वाली श्रम भागीदारी दर बहुत धीमी गति से आगे बढ़ी है. रिपोर्ट का कहना है कि नोटबंदी और जीएसटी से इसके ऊपर जो नकारात्मक प्रभाव पड़ा था.

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