
Varanasi: ज्ञानवापी परिसर स्थित श्रृंगार गौरी के नियमित दर्शन-पूजन के मामले पर जिला जज अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की अपील खारिज करते हुए कहा कि मामला सुनने योग्य है. वाराणसी जिला जज अदालत ने हिंदू पक्ष की अपील स्वीकार कर ली है. मामले में अब अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी. कोर्ट में फैसले के दौरान मुस्लिम पक्ष मौजूद नहीं था. आपको बता दें कि नागरिक प्रक्रिया संहिता सीपीसी के आदेश 7 नियम 11 के तहत ये केस सुनने योग्य है या नहीं, इसी पर कोर्ट में सुनवाई चल रही थी. पिछली सुनवाई में मुस्लिम पक्ष ने दलीलें दी थीं. जिला जज अजय कृष्ण ने 24 अगस्त को इस मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया था.
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वाराणसी के श्रृंगार गौरी-ज्ञानवापी मस्जिद मामले में जिला जज अजय कृष्ण विश्वेश की कोर्ट ने सोमवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि कोर्ट श्रृंगार गौरी में पूजा के अधिकार की मांग को लेकर दायर याचिका को सुनवाई के योग्य मानता है. आपको बता दें कि हिंदू पक्ष की ओर से ज्ञानवापी परिसर में स्थित श्रृंगार गौरी समेत अन्य धार्मिक स्थलों पर नियमित पूजा अर्चना करने की अनुमति दिए जाने की मांग की गई थी. वहीं, मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में पोषणीय नहीं होने की दलील देते हुए इस केस को खारिज करने की मांग की थी. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 07 नियम 11 के तहत इस मामले में सुनवाई हो सकती है. कोर्ट को आज यही फैसला करना था कि यह याचिका सुनने योग्य है या फिर नहीं. कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि ज्ञानवापी केस सुनवाई के योग्य है. इस केस पर सुनवाई न करने के लिए बार-बार मुस्लिम पक्ष की ओर से उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम यानी Places of worship (special provisions) act 1991 का हवाला दिया जा रहा था.
क्या है प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट?
इस कानून को 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार के समय बनाया गया था. इस कानून के तहत 15 अगस्त् 1947 से पहले मौजूद किसी भी धर्म की उपासना स्थल को किसी दूसरे धर्म के उपासना स्थल में नहीं बदला जा सकता. इस कानून में कहा गया कि अगर कोई ऐसा करता है तो उसे जेल भेजा जा सकता है. कानून के मुताबिक आजादी के समय जो धार्मिक स्थल जैसा था वैसा ही रहेगा. कानून में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति इन धार्मिक स्थलों में किसी भी तरह का ढांचागत बदलाव नहीं कर सकता है. इसका मतलब न तो इन्हें तोड़ा जा सकता है और ना ही नया निर्माण किया जा सकता है. कानून में यह भी लिखा है कि अगर ये सिद्ध भी हो जाए कि वर्तमान धार्मिक स्थल को इतिहास में किसी दूसरे धार्मिक स्थल को तोड़कर बनाया गया था, तो भी उसके वर्तमान स्वरूप को बदला नहीं जा सकता है. इसके अलावा धार्मिक स्थल को किसी दूरे पंथ से स्थल में भी नहीं बदला जाएगा. हालांकि, इस कानून के दायरे से अयोध्या विवाद को दूर रखा गया. इसके पीछे तर्क दिया गया कि यह मामला अंग्रेजों के समय से कोर्ट में था. ऐसे में इसे इस कानून से अलग रखा जाएगा.




